महाराष्ट्र का पंढरपुर वारी : 'मासिक धर्म प्रकृति ने ही दिया है...'

    • Author, मानसी देशपांडे
    • पदनाम, बीबीसी मराठी, पंढरपुर से

मासिक धर्म और धर्म का मुद्दा विभिन्न समाजों, जातियों और धर्मस्थलों में हमेशा से विवादास्पद रहा है. कई बार ये विवाद देश के सर्वोच्च न्यायालय तक भी पहुंचा है.

लेकिन महाराष्ट्र के पंढरपुर में चलने वाली करीब 21 दिन की यात्रा अपवाद है. इस साल 21 जून से शुरू होकर ये यात्रा 12 जुलाई को समाप्त हुई.

इस यात्रा में वारकरी संप्रदाय के मानने वाले भगवान विष्णु के अवतार विठ्ठल की पूजा अर्चना के लिए पंढरपुर स्थित मंदिर तक यात्रा करते हैं. यह यात्रा तुकाराम महाराज के देहू स्थित मंदिर से शुरू होती है.

21 दिनों तक चलने वाली इस यात्रा में हमने यह पता लगाने की कोशिश की है कि पैदल चलने वाली महिलाएं मासिक धर्म के बारे में क्या सोचती हैं.

वैसे मासिक धर्म का पहलू 'वारी की यात्रा' के दौरान अहम नहीं रहता है. वारकरी महिलाओं का मानना है कि यह प्रकृति का ही एक हिस्सा है.

महाराष्ट्र में वारकरी भक्ति सम्प्रदाय का इतिहास 10 शताब्दी यानी एक हजार साल पुराना है. वारकरी महिलाओं की भागीदारी के अलावा इस यात्रा में महिला संतों का भी अहम योगदान है.

इन संतों की रचनाएँ केवल विठ्ठल-रखुमाई भक्ति का रसपूर्ण और गूढ़ वर्णन नहीं हैं. इन संतों ने छुआछूत, शोषण, दमनकारी रीति-रिवाजों, परंपराओं और जातिगत भेदभाव को भी मुद्दा बनाया है.

वारकरी संप्रदाय का आचरण

अभंग 'अवघा रंग एक झाला' की रचना करने वाली संत सोयराबाई एक अन्य अभंग में कहती हैं, 'अगर मासिक धर्म को अशुद्धि समझा जाए तो दुनिया में किसी भी देह की उत्पत्ति नहीं हो सकती. इस अशुद्धि से ही सबका जन्म हुआ है. '

हमने यह देखने की कोशिश की है कि वारकरी संतों का यह विचार आचरण में लागू होता है या नहीं.

बीते सप्ताह एक सुबह बीबीसी की मराठी टीम सोलापुर ज़िले के अकलुज के पास पहुंची. संत तुकाराम की पालकी में कुछ वारकरी ताली बजाते हुए आगे बढ़ रहे थे.

कुछ अपने सिर पर रखे बैग को संतुलित करते हुए तेजी से चल रहे थे. कुछ कलश खुले मैदानों में बिखरे हुए थे. इसमें एक और तस्वीर देखने को मिली.

अकलुज के पास एक टैंकर खड़ा था. वहां कुछ वारकरी महिलाएं कपड़े धो रही थीं. कुछ बुजुर्ग वारकरी महिलाएं साड़ी को बरक़रार रखते हुए अपने शरीर पर पानी डाल कर नहा रही थीं और टैंकर की ओट में ही अपने कपड़े बदल रही थीं.

श्रमिकों की आदत होती है कि वे जहां भी होते हैं, जुगाड़ करके अपना काम पूरा करते हैं.

कुछ सवाल मेरे मन में आए. जैसे कि जितनी आसानी से पुरुष इसे कर सकते हैं, क्या यह महिलाओं के लिए उतना ही आसान होता है? और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अगर उनके पीरियड्स बीच में आ गए तो महिलाएं क्या करेंगी?

अगर जल्दी से नहाना है तो सैनिटरी पैड कैसे बदलें?

क्या महिलाओं के लिए घर जैसी स्वच्छता को बनाए रखना संभव होगा? यदि वारी आने पर उन्हें माहवारी आ जाती है तो इसके प्रति उनका दृष्टिकोण क्या होगा? मासिक धर्म को यहाँ 'आभासी' के रूप में भी देखा जाता है?

वारी में चलते समय...

मैंने वारी से पंढरपुर की रिपोर्ट करते हुए इन सवालों के जवाब पाने की कोशिश करने का फ़ैसला किया. मासिक धर्म वाली महिलाओं को बात करने में शर्म आती थी. कुछ लोगों ने अपनी अवधि के बाद यानी रजोनिवृत्ति के बाद वारी में भाग लिया.

पुणे जिले की जयमाला बच्चन, जिन्होंने देहू से तुकाराम महाराज की पालकी में भाग लिया, ने अपने पालकी के अनुभव के बारे में खुलकर बात की.

उन्होंने कहा, "महिलाएं पैड का इस्तेमाल करती हैं. उन्हें कपड़े या काग़ज़ में लपेटती हैं. वारी में चलते समय उन्हें कोई शारीरिक दर्द नहीं होता है. पंढरपुर जाने में बहुत उत्साह और आनंद होता है. ऐसा लगता है जैसे नाच-गाना चल रहा हो."

उनसे पूछा गया कि कई घरों में मासिक धर्म के दौरान महिलाओं के रसोई या पूजा घर में जाने में प्रतिबंध होता है, वे घर में अलग-अलग रहते हैं या घर में उनकी आवाजाही सीमित होती है.

तो वारी में तस्वीर क्या है?

इस पर जयमाला बच्चन ने कहा, "सब कुछ पांडुरंग के चरणों में है. वे प्रथाएं बहुत पहले से चली आ रही हैं. कुछ देवी-देवताओं को जाने की अनुमति नहीं है, लेकिन जो लोग जाते हैं वो कड़ी मेहनत करते हैं. चार दिनों का आराम भी मिलता है."

"यदि आप इसे इस तरह देखते हैं, तो यह प्राण पवित्र है. लेकिन पारंपरिक परंपरा के अनुसार आपको घर पर ही रहना होगा. लेकिन वारी में, इसे ऐसा नहीं माना जाता है. आप पांडुरंग के चरणों में भी विलीन हो जाते हैं. पर उस समय, महत्वपूर्ण नहीं माना जाता है."

यवतमाल ज़िले के एक पालकी में भाग लेने वाली शोभाताई से उनके मासिक धर्म के बारे में जब पूछा तो उन्होंने कहा, ''कुछ महिलाएं एक महीने पहले ही अपना गांव छोड़ देते हैं. लेकिन ऐसी स्थिति हो और अगर कोई धार्मिक आयोजन हो तो सीधे वहां न जाएं.''

लेकिन अर्चना कदम ने इस पर कुछ और ही राय जाहिर की.

'मुझे कोई समस्या नहीं थी'

उन्होंने कहा, "वारी में, मासिक धर्म आने से पहले, हमारे सभी देवता चले गए थे. इसलिए मुझे कोई समस्या नहीं थी. यदि अवधि भी आती है, तो कोई इसे दूर से देखना चाहता है. महिलाएं इसे गोडघर का फूल कहती हैं. दुनिया में इसे वाइटल कहा जाता है. लेकिन यहां ऐसा कुछ नहीं है. यह प्रकृति से ही आता है. यह भगवान द्वारा दिया गया है. यह महिलाओं के लिए आवश्यक है. सब कुछ तो उसी से है."

एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि कुछ महिलाओं को मासिक धर्म के दौरान शारीरिक परेशानी का अनुभव होता है. यह एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति में भी भिन्न हो सकता है. लेकिन आमतौर पर महिलाओं को शरीर में दर्द, पेट दर्द, टांगों में दर्द महसूस होता है, तो क्या ऐसी स्थिति में महिलाएं पैदल ही अपना सफ़र जारी रखती हैं?

इस पर अर्चना क़दम कहती हैं, "मुझे ऐसी कोई समस्या नहीं है. लेकिन चलने की वजह से मेरे पैरों में चोट लग गई. मैं उसके लिए सिर्फ़ गोलियां लायीं थीं. लेकिन मैं उसे भी नहीं खाती. कभी-कभी मुझे एसिडिटी हो जाती है. मुझे दोबारा गोलियां खानी पड़ती हैं. मैं चलती रहती हूं. चलने से कहीं ज़्यादा ख़ून बह रहा था. लेकिन मुझे भी खुशी हुई."

"मेरा मासिक धर्म 4 तारीख को था. चलने के कारण 28 तारीख को आया और चला गया. मैं अपने साथ पैड लेकर आयी थी. इसलिए मुझे कोई परेशानी नहीं हुई. सड़क पर होने के कारण मुझे भी ऐसी ही स्थिति का सामना करना पड़ा. अब कैसे हो सकता है अगर मैं कपड़े का उपयोग करती हूं तो मैं इसे घर पर धोती हूं. अब लड़कियां केवल पैड का उपयोग करती हैं, इसे बदला जा सकता है."

"हम लोगों को कोई उपयुक्त जगह मिलता तो हम इसे बदल लेते. फिर जब हमें स्नान करने के लिए जगह मिलती, तो हम स्नान करते थे. यह यहां घर जैसा नहीं है. आप पुरुषों से ऐसा नहीं कह सकते. तो हम महिलाएं एक दूसरे की मदद करते हैं."

इन महिलाओं को लगा कि वारी में मासिक धर्म से जुड़े सामाजिक और धार्मिक बंधन थोड़े ढीले पड़ रहे हैं.

नि:शुल्क सैनिटरी पैड

अकलुज में ग्राम पंचायतों व स्वयं सहायता समूहों के माध्यम से नि:शुल्क सैनिटरी पैड भी बांटे गए. मासिक धर्म स्वच्छता के बारे में भी लोगों को ज़ागरूक किया गया.

लेकिन जब सैनिटरी पैड प्रचलन में नहीं थे तो महिलाएं यात्रा में क्या करती थीं?

मैंने यह सवाल कमालबाई जागदे से पूछा था, जो नासिक ज़िले के निफाड तालुक से एक डिंडी यानी पालकी लेकर आई थीं. उन्होंने कहा कि तब भी महिलाएं आती थीं और पीरियड्स आने पर ऐसी ही स्थितियों का सामना करती थीं.

उन्होंने कहा, "उस समय, हम कपड़े पहनते थे. हम चलते रहते थे चाहे कुछ भी हो. हम कपड़े धोते थे और उन्हें सुखाते थे जहाँ लंच ब्रेक होता था. लंच ब्रेक तीन घंटे के लिए होता था। हम यह सुनिश्चित करते थे कि कपड़े इस दौरान सूख जाते थे. हम घर में जितने सूखे कपड़े इस्तेमाल कर सकते थे, रख लेते थे. जब धुले हुए कपड़े जल्दी नहीं सूखते थे तो इसका इस्तेमाल किया जाता था."

कमला बाई ने कहा, "आजकल लड़कियां पैड का इस्तेमाल करती हैं. अब भी, कई मासिक धर्म वाली महिलाएं यात्रा में शामिल हैं. अगर मासिक धर्म के दौरान बारिश होती है, तब हमें ध्यान रखना पड़ता था कि यह गीला न हो. हम बारिश में टाट को ढकते हैं और फिर हमें इसे सुखाते भी हैं."

नासिक जिले की 70 वर्षीय महिला सिंधुताई शेगे ने कहा कि अगर उन्हें वारी में मासिक धर्म होता था, तो वह पालकी के पास नहीं जाती थी.

उन्होंने कहा, "जब मासिक धर्म आता है, तो पादुकाओं के पास नहीं जाना चाहिए. मैं भी ऐसा ही करती थी. आप घर की तरह पूरी तरह से अलग नहीं बैठ सकते, लेकिन हम पादुकाओं के पास नहीं जाते थे. हमारे घर मे मासिक धर्म के समय तो सब महिलाएं अलग बैठती है."

इसी पालकी की एक बुजुर्ग दादी ने बताया कि मेनोपॉज के बाद वह वारी आने लगी थी.

लेकिन कुल मिलाकर देखा गया कि महिलाएं ऐसी सावधानियां बरतती हैं जिससे मासिक धर्म में कोई गड़बड़ी न हो. वे आमतौर पर यह नहीं सोचती हैं कि मासिक धर्म के चलते उन्होंने यात्रा रोक देनी चाहिए या नहीं करनी चाहिए.

महिलाओं को अक्सर मासिक धर्म को रोकने के लिए गोलियां लेते भी देखा जाता है.

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