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अमेरिका, ब्रिटेन के मुक़ाबले भारत सरकार ने वैक्सीन कंपनियों की मदद पर कितना ख़र्च किया?
- Author, कीर्ति दुबे
- पदनाम, बीबीसी, संवाददाता
भारत में 21 जून से सभी 18 साल की आयु से ऊपर लोगों को सरकार फ्री वैक्सीन मुहैया कराएगी. सात जून को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राष्ट्र के नाम संबोधन में ये ऐलान किया.
इसके साथ ही प्रधानमंत्री ने वैक्सीन को लेकर सरकार की उपलब्धियों को गिनाते हुए एक बड़ा दावा भी कर दिया. उन्होंने कहा, ''भारत में वैक्सीन बनाने वाली कंपनियों को सरकार ने हर तरह से सपोर्ट किया. वैक्सीन निर्माताओं को वैक्सीन रिसर्च और डेवेलपमेंट के लिए ज़रूरी फ़ंड दिया गया.''
बीबीसी ने इस दावे की पड़ताल की साथ ही ये भी समझने की कोशिश की कि भारत ने कोरोना वायरस की वैक्सीन को लेकर रिसर्च में कितना ख़र्च किया है और अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश जहाँ वैक्सीन बनाई गई हैं वहाँ वैक़्सीन के रिसर्च और डेवलपमेंट में सरकारों ने कितना सहयोग किया है. साथ ही इन देशों के मुकाबले भारत कहाँ ठहरता है.
सबसे पहले बात प्रधानमंत्री के दावे की करते हैं जिसमें उन्होंने भारतीय वैक्सीन निर्माताओं को रिसर्च-डेवलपमेंट के लिए करोड़ों रूपये देने की बात कही है.
इस साल मई की शुरुआत में केंद्र सरकार ने 218 पेज का हलफ़नामा दायर कर खुद सुप्रीम कोर्ट के बताया था कि केंद्र की ओर से कोरोना की वैक्सीन के रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए एक रुपया भी फ़ंड के तौर पर नहीं दिया गया है. हालांकि दोनों वैक्सीन के क्लीनिकल ट्रायल के लिए ज़रूरी सरकारी मदद दी गई है.
कोविशील्ड के लिए मोदी सरकार से कितनी मदद?
कोविशील्ड वैक्सीन दरअसल ऑक्सफ़ोर्ड यूनिवर्सिटी और ब्रितानी-स्वीडिश कंपनी एस्ट्राज़ेनेका की कोरोना वैक्सीन का भारतीय वर्जन है.
इस वैक्सीन का उत्पादन भारत में पुणे का सीरम इंस्टीट्यूट कर रहा है. सरकारी दस्तावेज़ कहते हैं कि इस वैक्सीन की 1600 लोगों पर की गई ब्रिज़िंग स्टडी को आईसीएमआर ने सपोर्ट किया था.
इसके अलावा आईसीएमआर ने कोविशील्ड के इम्यून रिस्पॉन्स की स्टडी की थी. कुल मिलाकर कर जो ख़र्च कोविशील्ड पर किया गया वह रक़म थी 11 करोड़ रुपये. इसके अलावा सीरम इंस्टीट्यूट को भी कोई आर्थिक मदद नहीं दी गई है.
कोवैक्सीन पर मोदी सरकार ने कितना खर्च किया?
आईसीएमआर और भारत बायोटेक ने कोवैक्सीन को पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप यानी पीपीई मॉडल के तहत तैयार किया है.
आईसीएमआर और भारत बायोटेक के बीच हुए समझौते में यह तय किया गया ही वैक्सीन की नेट ब्रिकी पर पांच फ़ीसदी की रॉयलटी आईसीएमआर को जाएगी.
आईसीएमआर ने भारत बायोटेक लिमिटेड को कोवैक्सीन बनाने के लिए कोई फंड या मदद नहीं दी लेकिन इस वैक्सीन के तीनों क्लीनिकल ट्रायल का खर्च आईसीएमआर ने उठाया. इनमें 22 शहरों के 25,800 लोगों को शामिल किया गया था.
वायरस के आईसोलेशन, बल्क प्रोडक्शन और कैरेक्टराइजेशन, प्री क्लिनिकल स्टडी और कोवैक्सीन कितनी प्रभावी है इसके निर्धारण से जुड़े काम आईसीएमआर ने किए. कुल मिलाकर सरकार ने कौवैक्सीन पर करीब 35 करोड़ ख़र्च किए हैं.
इसके अलावा भारत सरकार के ऑर्डर की बात करें तो मई के पहले सप्ताह तक भारत सरकार ने 11 करोड़ कोविशील्ड की डोज़ और 25 करोड़ कोवैक्सीन की डोज़ ख़रीदी थी.
यानी कुल मिला कर दोनों वैक्सीन बनाने में कुल 46 करोड़ का ख़र्चा भारत सरकार ने किया.
अमेरिका का ऑपरेशन वॉर्प स्पीड
अब आइए बात दुनिया के बाकी देशों की करते हैं.
मुख्यतः जिन वैक्सीन का निर्माण अमेरिका और ब्रिटेन में किया गया है उसी का दुनिया के ज़्यादातर देश इस्तेमाल कर रहे हैं. इनमें शामिल है अमेरिका की वैक्सीन मॉडर्ना और फ़ाइज़र और ब्रिटेन-यूरोपीय यूनियन की वैक्सीन ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका .अमेरिका और ब्रिटेन की सरकरों ने वैक्सीन के रिसर्च और डेवलपमेंट पर कितना ख़र्च किया ये समझने के लिए हमने कुछ दस्तावेज़ों का अध्ययन किया.
अमेरिका में कोरोना की वैक्सीन के लिए प्रशासन ने ऑपरेशन वॉर्प स्पीड चलाया और इसमें 1800 करोड़ अमेरिकी डॉलर का फ़ंड वैक्सीन पर ख़र्च किया गया है.
16 अप्रैल को मॉडर्ना को अमेरिकी स्वास्थ्य मंत्रालय ने कोरोना की mRNA वैक्सीन को विकसित करने के काम मे तेज़ी लाने के 43 करोड़ डॉलर का फंड दिया था इसके बाद कंपनी को ट्रायल से लेकर प्रोडक्शन में अमेरिकी स्वास्थ्य विभाग की ओर से अलग-अलग फंड मिलता रहा है.
वहीं अमेरिकी फॉर्मा कंपनी फ़ाइज़र और बायोएनटेक ने अमेरिकी प्रशासन से वैक्सीन के डेवलपमेंट पर कोई फ़ंड नहीं लिया. लेकिन 21 जुलाई को फ़ाइज़र और अमेरिकी सरकार के बीच वैक्सीन की आपूर्ति को लेकर पहला सौदा हुआ. जिसके 10 करोड़ डोज़ के मैन्युफैक्चरिंग के लिए अमेरिका के स्वास्थ्य विभाग ने 1.9 अरब डॉलर का भुगतान कंपनी को किया. ये फ़ाइज़र और सरकार के बीच हुई पहली डील थी. अब तक कंपनी और अमेरिकी प्रशासन के बीच कुल तीन डील हो चुकी हैं.
एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन पर ब्रिटेन का कितना ख़र्च?
ऑक्सफ़ोर्ड - एस्ट्राज़ेनेका की कोविड-19 वैक्सीन को चिंपैंजी एडेनोवायरस बेस्ड वैक्सीन तकनीक से बनाया गया है. इस तकनीक पर लगभग 20 सालों के रिसर्च और डेवलपमेंट चल रहा था. इस दौरान इस रिसर्च के लिए सिर्फ़ ब्रिटेन ने ही नहीं बल्कि यूरोपीय यूनियन और कुछ चैरिटी संस्थाओं ने भी अनुदान दिया है.
लेकिन कुछ शोधकर्ताओं ने हाल ही में एक फ्रीडम ऑफ़ इंफॉर्मेशन यानी ब्रिटेन के सूचना के अधिकार के तहत ये जानकारी हासिल की कि जनवरी 2020 से ब्रिटेन के स्वास्थ्य विभाग ने इस वैक्सीन के रिसर्च और डेवलपमेंट के लिए 10 करोड़ 42 लाख पाउंड का फंड दिया है.
कुल मिलाकर ऑक्सफोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका वैक्सीन के रिसर्च में 97 फ़ीसद तक का फ़ंड ब्रिटेन और यूरोपीय यूनियन की ओर से दिया गया है. लेकिन ये रक़म कितनी है, इसकी सटीक जानकारी नहीं मिल पाई है.
एक अहम बात ये है कि भारत में ख़ुद के रिसर्च से बनाई गई वैक्सीन सिर्फ़ कोवैक्सीन है, जिसे पूरी तरह से स्वदेशी कहा जा सकता है. लेकिन कोवीशील्ड जिसका उत्पादन सीरम इंस्टीट्यूट कर रहा है वह भारत की तकनीक नहीं है बल्कि ब्रिटेन के ऑक्सफ़ोर्ड-एस्ट्राज़ेनेका की तकनीक से बनाई गई वैक्सीन है.
भारत सरकार ने कोवैक्सीन और कोविशील्ड के ट्रायल पर अलग-अलग स्टेज पर 46 करोड़ रुपये ख़र्च किए. अमेरिका और ब्रिटेन सरकार ने अपनी वैक्सीन पर जितना ख़र्च किया उसके मुक़ाबले ये रकम काफ़ी कम है.
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