कोरोना वैक्सीन: विदेशों से टीका क्यों नहीं मंगवा पा रहीं राज्य सरकारें?

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- Author, मयूरेश कोन्नूर
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
महाराष्ट्र और दूसरे राज्यों समेत पूरे देश में कोरोना महामारी को रोकने के लिए चलाया जा रहा टीकाकरण अभियान अब धीमा पड़ गया है.
राज्यों को 'ग्लोबल टेंडर' जारी कर, दूसरे देशों से वैक्सीन हासिल करने की जो उम्मीद बंधी थी, वो भी अब धुंधली नज़र आ रही है.
केंद्र सरकार ने पिछले महीने ही राज्यों को 18 साल से 44 साल तक की आयु के सभी लोगों को वैक्सीन देने की अनुमति दी थी. इसके अलावा सभी राज्यों को फ़ार्मा कंपनियों से सीधे तौर पर वैक्सीन खरीदने की अनुमति भी दी जा चुकी है.
लिहाज़ा राज्य सरकारें वैक्सीन के लिए विदेशी दवा निर्माता कंपनियों से भी बात कर सकती हैं.
इस बीच कई राज्यों ने 'ग्लोबल टेंडर' जारी कर, अपने प्रदेश की जनता के लिए वैक्सीन हासिल करने की बात भी कही, लेकिन अब तक दिल्ली को छोड़ कर किसी और प्रदेश को इसमें सफलता नहीं मिली है.
बुधवार को दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने बताया कि रूसी कंपनी राज्य सरकार को स्पूतनिक वैक्सीन की सप्लाई करने के लिए राज़ी हो गई है. उन्होंने बताया कि कितने डोज़ कंपनी दे सकती है इसे लेकर फिलहाल चर्चा जारी है.
बहुत सी दवा निर्माता कंपनियों ने या तो राज्यों द्वारा निकाले गए ग्लोबल टेंडर का कोई जवाब नहीं दिया, या फिर साफ़ तौर पर ये कहा कि वैक्सीन बेचने के लिए केंद्र सरकार से ही समझौता किया जा सकता है, राज्य सरकारों से नहीं. इसलिए अब कई राज्यों ने केंद्र सरकार से यह अपील की है कि वो वैक्सीन के लिए ग्लोबल टेंडर जारी करे और राज्यों को वैक्सीन दे.
इस बारे में केंद्र सरकार की क्या रणनीति है, इसे लेकर फ़िलहाल कोई स्पष्टता नहीं है. लेकिन दवा निर्माता कंपनियों को दूसरे देशों की माँग भी पूरी करनी है.
ऐसे में क्या भारत सरकार टीकाकरण के अपने लक्ष्य को प्राप्त कर पायेगी, यह एक बड़ा सवाल है?

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'वैक्सीन पर सिर्फ़ केंद्र सरकार से बात'
भारत में अब तक दस से ज़्यादा राज्य कोरोना वैक्सीन के लिए 'ग्लोबल टेंडर' जारी कर चुके हैं. महाराष्ट्र, उत्तर प्रदेश, पंजाब, गोवा, तमिलनाडु, केरल, कर्नाटक, दिल्ली और पश्चिम बंगाल इनमें शामिल हैं. लेकिन इनमें से किसी को भी सकारात्मक जवाब नहीं मिला.
हाल ही में पंजाब सरकार ने यह बताया कि उन्होंने कई विदेशी दवा निर्माता कंपनियों से बात करने की कोशिश की, लेकिन सिर्फ़ एक कंपनी (मॉडर्ना) ने उन्हें जवाब दिया. मॉडर्ना ने कहा कि वो पंजाब सरकार नहीं, बल्कि केंद्र सरकार से ही वैक्सीन पर बात करेगी.
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पंजाब में टीकाकरण अभियान के नोडल अफ़सर विकास गर्ग ने पंजाब सरकार की तरफ़ से यह बयान जारी किया कि अमरिंदर सिंह की सरकार ने स्पूतनिक, फ़ाइज़र, मॉडर्ना के अलावा जॉनसन एंड जॉनसन से सीधा संपर्क किया था. लेकिन सिर्फ़ मॉडर्ना का जवाब आया और उन्होंने भी अपनी नीतियों का हवाला देते हुए हमें सीधे तौर पर वैक्सीन की आपूर्ति से मना कर दिया.
दिल्ली सरकार को भी अंतरराष्ट्रीय दवा निर्माताओं से ऐसा ही जवाब मिला. सोमवार को दिल्ली के उप-मुख्यमंत्री मनीष सिसोदिया ने प्रेस से बातचीत में कहा कि जब उनकी सरकार ने वैक्सीन निर्माता कंपनियों से संपर्क करने की कोशिश की, तो इन कंपनियों ने राज्य सरकारों के साथ किसी भी तरीके की बातचीत से इनकार कर दिया.

सिसोदिया ने कहा, "हमें वैक्सीन निर्माता कंपनियों ने बताया कि वो केंद्र सरकार के साथ बातचीत कर रहे हैं और सीधा राज्य सरकार को वो वैक्सीन सप्लाई नहीं कर सकते. केंद्र हमें ग्लोबल टेंडर की अनुमति तो दे रहा है, पर सच्चाई ये है कि वो इन कंपनियों के साथ अलग से सौदेबाज़ी भी कर रहा है."
"हमें कहा गया कि हम भारतीय वैक्सीन निर्माताओं से अलग से वैक्सीन ख़रीद लें, पर केंद्र सरकार ने उनको भी अपने नियंत्रण में रखा हुआ है. केंद्र सरकार ने इस बात पर नियंत्रण लगाया हुआ है कि हम किसी निजी कंपनी से कितनी वैक्सीन खरीद सकते हैं. हम केंद्र सरकार से सिर्फ़ यह कहना चाहते हैं कि हमारे यहाँ हालात चिंताजनक हैं और उन्हें इस मुसीबत का सामना करने के लिए कुछ गंभीरता दिखानी चाहिए."
महाराष्ट्र सरकार ने भी कोरोना वैक्सीन की पाँच करोड़ डोज़ के लिए एक ग्लोबल टेंडर निकाला था, जिसका उन्हें कोई जवाब नहीं मिला. प्रदेश के स्वास्थ्य मंत्री राजेश टोपे ने मंगलवार को प्रेस से बातचीत में कहा कि राज्य सरकार को अपने ग्लोबल टेंडर पर कोई जवाब नहीं मिला.
उन्होंने कहा, "हम केंद्र सरकार से यह उम्मीद करते हैं कि वो वैक्सीन के निर्यात को लेकर एक राष्ट्रीय नीति बनाये. अगर राज्य सरकारें अपने सूबे के 18 से 44 वर्ष के लोगों को वैक्सीन लगवाने के लिए ज़िम्मेदार हैं, तो हम केंद्र सरकार को इसकी क़ीमत अदा करने के लिए तैयार हैं, मगर हमें एक समान नीति की ज़रूरत है. हमने यह बात केंद्र सरकार को कई बार बैठकों में बताई है और लिखकर भी दी है."
पश्चिम बंगाल और केरल की सरकार ने भी केंद्र से यही गुज़ारिश की है.

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वैक्सीन के लिए स्थानीय निकायों की कोशिश
जहाँ राज्य सरकारें यह शिक़ायत कर रही हैं कि उनके ग्लोबल टेंडर को कोई जवाब नहीं मिला, वहीं मुंबई की बीएमसी ने 12 मई को एक करोड़ कोरोना वैक्सीन का टेंडर अलग से निकाला था.
बीएमसी के इस टेंडर का हालांकि किसी अंतरराष्ट्रीय वैक्सीन निर्माता ने जवाब नहीं दिया, लेकिन आठ दवा वितरकों ने इस टेंडर के जवाब में बीएमसी से संपर्क किया है. इनमें से सात प्रस्ताव रूसी वैक्सीन स्पूतनिक के लिए हैं, जबकि एक एस्ट्राज़ेनेका या फ़ाइज़र वैक्सीन के लिए आया है.
एक प्रेस नोट जारी कर बीएमसी ने कहा कि इससे संबंधित क़ाग़ज़ी कार्यवाही अभी चल रही है. लेकिन इस बात की पड़ताल करनी भी ज़रूरी है कि इसमें कंपनियों या दवा वितरकों का कोई निजी मुनाफ़ा तो नहीं है. बीएमसी फ़िलहाल वैक्सीन की संभावित क़ीमतों और वितरण की व्यवस्था को लेकर स्थिति का जायज़ा ले रहा है, ताकि सब कुछ सुचारू ढंग से हो.
बीएमसी के अनुसार, वो चार अलग-अलग दवा वितरकों से वैक्सीन लेने की जगह इस बात की संभावना भी तलाश रहे हैं कि सीधे रूसी सरकार से ही संपर्क किया जाये.
मुंबई के बीएमसी की तरह, पुणे के नगर निगम परिषद ने भी ग्लोबल टेंडर निकालने का फ़ैसला किया है. बताया गया है कि यह टेंडर अपने आख़िरी चरण में है.
इसके अलावा पुणे नगर निगम परिषद ने सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया से भी सीधे तौर पर वैक्सीन ख़रीदने की कोशिश की, मगर कंपनी ने उन्हें वैक्सीन देने से इनकार कर दिया.
पुणे स्थित सीरम इंस्टीट्यूट ऑफ़ इंडिया एस्ट्राजेनेका-ऑक्सफ़र्ड द्वारा विकसित की गई कोविशील्ड वैक्सीन बना रहा है.
भारत सरकार की मौजूदा नीति के अनुसार, वैक्सीन सिर्फ़ केंद्र सरकार, राज्य सरकार और निजी अस्पतालों को ही दी जा सकती है. पुणे के मेयर ने केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्री डॉक्टर हर्षवर्धन यह लिखित अपील की है कि पुणे नगर निगम को सीधे सीरम इंस्टीट्यूट से वैक्सीन ख़रीदने दी जाये.
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केंद्र सरकार क्या कर सकती है?
राज्य सरकारें पर्याप्त मात्रा में वैक्सीन उपलब्ध ना होने की वजह से केंद्र सरकार की नीतियों की आलोचना कर रही हैं. हालांकि, इस समस्या को सुलझाने के लिए सबकी नज़रें केंद्र सरकार पर ही हैं.
केंद्र सरकार ने यह दावा किया है कि इस साल के अंत तक वैक्सीन की कम से कम 218 करोड़ डोज़ भारत में उपलब्ध होंगी. पर यह कोई नहीं जानता कि यह कैसे संभव हो पायेगा और इसके लिए कैसी नीतियाँ बनाई जायेंगी.
राज्य सरकारें केंद्र से ग्लोबल टेंडर निकालने के लिए कह रही हैं, पर क्या इस क़दम से भी केंद्र का यह लक्ष्य पूरा हो पायेगा?
सोमवार को केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी लव अग्रवाल ने एक प्रेस वार्ता में कहा "चाहे मॉर्डना हो या फ़ाइज़र, हम इनके लिए केंद्र सरकार के स्तर पर योजना बना रहे हैं. दोनों ही कंपनियों के पास अपनी क्षमता से ज़्यादा वैक्सीन बनाने के ऑर्डर हैं. इसलिए भारत को वैक्सीन की कितनी आपूर्ति मिलती है, यह इस बात पर निर्भर करेगा कि इन कंपनियों के पास भंडारण की क्षमता कितनी है?"
"ये कंपनियाँ इस बात की सूचना केंद्र सरकार को देंगी और फिर हम राज्य सरकारों तक इन टीकों को पहुँचाने के सारे इंतज़ाम करेंगे."
भारत सरकार लगातार वैक्सीन निर्माता कंपनियों से डील करने की कोशिश कर रही है. जबकि अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोपीय संघ ने इन कंपनियों के साथ अपने देशों में टीकाकरण अभियान चलाने से पहले ही समझौता कर लिया था.
भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर फ़िलहाल अमेरिका के दौरे पर हैं. यह उम्मीद की जा रही है कि इस दौरान वे अमेरिका के वैक्सीन निर्माताओं से मुलाक़ात करेंगे. फ़िलहाल सब की उम्मीदें इन संभावित मुलाक़ातों पर टिकी हुई हैं.
अगर राज्य सरकारों के ग्लोबल टेंडर के द्वारा वैक्सीन खरीदने की योजनाओं पर कोई सकारात्मक क़दम नहीं उठता, तो भारतीय लोगों को कोरोना की वैक्सीन के लिए फ़िलहाल इंतज़ार ही करना होगा.
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