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कोरोना: 'जब हम संक्रमित परिवारों को खाना पहुँचाते हैं, तो वो हाथ जोड़ शुक्रिया कहते हैं"
- Author, राहुल गायकवाड
- पदनाम, बीबीसी मराठी
"कई मरीज़ गांव के इलाकों से आए हैं, कई मामलों में तो पूरा परिवार कोरोना से संक्रमित है. उन्हें खाना खिलाने वाला कोई नहीं है. इसलिए जब हम उन्हें टिफ़िन देते हैं, वो हाथ जोड़कर हमें शुक्रिया कहते हैं. हमें संतुष्ति मिलती है कि हम समाज के लिए कुछ अच्छा कर रहे हैं."
अक्षय मोरे अपनी पहल के बारे में बात करते हुए ये कहते हैं. वो कोरोना संक्रमित मरीज़ों और बूढ़े लोगों को नासिक में मुफ़्त में खाना पहुंचा रहे हैं.
कोरोना वायरस की दूसरी लहर पहले से अधिक ख़तरनाक है. संक्रमितों की संख्या लगातार बढ़ रही है. कुछ मामलों में परिवार से सभी सदस्य संक्रमित हैं. इसलिए अक्षय समेत कई युवा महाराष्ट्र के कई इलाकों में ज़रूरतमंदों को फ़्री टिफ़िन सर्विस दे रहे हैं.
पुणे में आकांक्षा सादेकर और मुंबई में बालचंद्र जाधव ने भी ऐसी ही पहल शुरू की है. अक्षय, आकांक्षा और बालचंद्र अलग-अलग शहरों में काम कर रहे हैं, लेकिन उनकी कोशिश एक ही है- ज़रूरतमंद लोगों तक खाना पहुंचाना.
अक्षय एक दवा कंपनी के मार्केटिंग विभाग में काम करते हैं. नासिक में जब कोरोना संक्रमितों की संख्या बढ़ने लगी तो कई मरीज़ों के लिए खाने का इंतज़ाम मुश्किल हो गया.
नासिक के अलावा आसपास के गांवों से भी कई मरीज़ ज़िला अस्पताल आने लगे. उनके रिश्तेदारों के लिए उनतक खाना पहुंचाना मुश्किल हो रहा था. तक अक्षय और उनकी पत्नी ने मिलकर खाना पहुंचाने का काम शुरू किया.
वो अब हर दिन क़रीब 100 लोगों को खाना पहुँचाते हैं. सारा खर्च अक्षय ख़ुद उठाते हैं. पहले हुए लॉकडाउन में भी अक्षय और उनके दोस्तों ने गांव जा रहे मज़दूरों तक खाना पहुंचाकर मदद की थी.
'जब तक मुमकिन होगा, करते रहेंगे'
अक्षय कहते हैं, "महामारी के दौरान कई लोगों तक खाना नहीं पहुंच पा रहा था, हमें लगा कि उनकी मदद करनी चाहिए. मैंने इस बारे में अपनी पत्नी से बात की और वो तुरंत राज़ी हो गईं. उसके बाद हमने इस सर्विस की शुरुआत की. हमारी कोशिश है, मजबूरी में फंसे लोगों की मदद करना. हो सकता है कल मैं किसी ऐसी ही मुसीबत में फंस जाऊं, इसलिए जबतक मुमकिन होगा, मैं ये काम करता रहूंगा."
अक्षय के रिश्तेदार भी उनके इस काम की तारीफ़ कर रहे हैं. लोग गांव में रहने रहने उनके माता पिता फ़ोन कर बता रहे हैं कि उनका बेटा शानदार काम कर रहा है.
आकांक्षा ने अपनी पढ़ाई ब्रिटेन से की है और पिछले पांच सालों के भारत में रह रही हैं. उन्होंने अपनी दोस्त रौनिता के साथ मिलकर छह अप्रैल से टिफ़िन पहुंचाने का काम शुरू किया, अबतक वो 1200 से अधिक लोगों की मदद कर चुकीं हैं.
वो कहती हैं, "हम उन्हें टिफ़िन पहुंचाते हैं जिनको बहुत ज़्यादा ज़रूरत है. हम अस्पताल में भर्ती और या घर पर अकेले रह रहे कोरोना संक्रमितों को टिफ़िन पहुंचाते हैं. हम एंबुलेस के ड्राइवर और बस-स्टॉप पर रह रहे लोगों को भी टिफ़िन देते हैं."
"कई दूसरे लोग भी टिफ़िन की मांग कर रहे हैं. कई लोग हैं जो खाने के लिए पैसे देने में सक्षम हैं, ऐसे लोगों को हम आसपास के मेस का नंबर दे देते हैं."
बालचंद्र जाधव मुंबई के परेल, शिवडी और वडाला इलाकों में घर पर अकेले रह रहे संक्रमितों को खाना पहुंचा रहे हैं. उन्होंने ये काम तब शुरू किया था जब पिछले लॉकडाउन में उन्हें बिज़नेस में नुकसान उठाना पड़ा था. वो कहते हैं, "जहां चाह है, वहां राह है."
जब लोगों को घर पर रह रहे कोरोना संक्रमितों को खाना पहुंचाने में डर लग रहा था, तब बालचंद्र ने उन्हें टिफ़िन पहुंचाने का काम शुरू किया. उन्होंने इसके बारे में व्हाट्सएप के माध्यम से सभी को जानकारी दी.
कई लोग उन्हें टिफ़िन के लिए लगातार फ़ोन करते रहते हैं. अभी वो अपनी टीम की मदद 35 से 40 मरीज़ों तक रोज़ाना दो वक़्त का खाना पहुंचा रहे हैं
वो कहते हैं, "अच्छा लगता है कि हम मुसीबत में लोगों की मदद कर पा रहे हैं. जब हम लोगों तक टिफ़िन पहुंचाते हैं, तो वो हाथ जोड़कर हमारा शुक्रिया अदा करते हैं. दूसरे लोगों को भी मदद के लिए आगे आना चाहिए."
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