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अभी के हालात की तुलना आपातकाल से नहीं हो सकती: एन राम
द हिंदू ग्रुप के निदेशक एन राम ने कहा है कि वर्तमान समय की तुलना आपातकाल से नहीं की जानी चाहिए.
उन्होंने कहा कि "अभी ऐसी जगहें हैं जहाँ कोई भी कड़ी राय दे सकता है और दमनकारी शक्तियों से लड़ सकता है."
ये बात उन्होंने "पत्रकारिता और सिनेमा का अपराधीकरण" विषय पर आयोजित लाइव लॉ के वेबिनार में कही.
एन राम ने कहा कि क़ानून का असमान अमल करना और न्यायपालिका, एक से अधिक मौकों पर, मीडिया की आज़ादी की रक्षा करने में नाकाम रही है.
"हाल के दिनों में कई पत्रकारों की गिरफ़्तारी और उन पर आपराधिक मामलों को दर्ज करना, हमारे संविधान की अपूर्ण पंक्तियों को उजागर और चौड़ा कर चुका है."
वे कहते हैं, "क़ानून में कई फॉल्ट लाइनें हैं, जिसका सत्ता अपनी चालाकी से इस्तेमाल करता है और ये न्यायपालिका की विफलता पर्याप्त रूप से संरक्षित करने में विफल रहते हैं."
"एक समय था, जब विकासशील देशों के बीच मीडिया की आज़ादी के मामले में भारत एक महत्वपूर्ण स्थिति में था. लेकिन यह 40 साल पहले था. हम आपातकाल के काले अध्याय से बाहर आए थे."
उन्होंने कहा, "राजनीतिक वैज्ञानिक रॉबिन जैफ्री ने भारतीय भाषा प्रेस से जुड़े एक पुस्तक में इसे भारत में समाचार पत्र क्रांति कहा है. आज, अगर मुझे यह दावा करना हो कि हम 40 साल पहले जैसी महत्वपूर्ण स्थिति में हैं तो मुझ पर फ़ेक न्यूज़ फ़ैलाने का आरोप लगाया जाएगा."
एन राम ने कहा, "आज के समय को बढ़ाचढ़ा कर आपातकाल जैसा बताने के लोभ में नहीं पड़ना चाहिए. मैं यह नहीं कहूंगा कि यह आपातकाल की तरह है. यह एक ग़लती होगी. मैं आपातकाल में रह चुका हूँ, तब पूरी तरह से सेंसरशिप थी, पत्रकार हिरासत में लिए गए थे. जल्दबाज़ी में किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुँचें. अब भी कई ऐसी जगहें हैं जहाँ आप अपने सशक्त विचार को व्यक्त कर सकते हैं, सरकार के कामों की कड़ी निंदा कर सकते हैं, न्यायपालिका की, पुलिस की आलोचना कर सकते हैं."
इस दौरान उन्होंने स्टैंड अप कॉमेडियन मुनव्वर फ़ारूक़ी की गिरफ़्तारी की बात उठाते हुए कहा कि "इससे प्रेस को मिली आज़ादी की कलई खुल गई है. लेकिन अब भी बहुत गुंजाइश हैं जहाँ हम मनमानी, दमनकारी और ऐसी कार्रवाइयों के ख़िलाफ़ लड़ सकते हैं."
इस दौरान एन राम ने कुछ टीवी चैनल के बारे में कहा कि "हमें उनकी निंदा करनी चाहिए. मैंने कुछ अंग्रेज़ी के चैनल देखे हैं और वे दुनिया के सबसे बेकार चैनलों में से हैं. जिस टीवी चैनल से भी ये 'हेट स्पीच' आया है यह एक बड़ी समस्या है. हमें इस पर कुछ करना चाहिए."
"केवल बोलने की आज़ादी पर हमला नहीं है"
इसी वेबिनार में वरिष्ठ अधिवक्ता अखिल सिब्बल ने कहा कि पत्रकारों पर जो हमले हो रहे हैं, सिनेमा के लोगों पर जिस तरह के हमले किए जा रहे हैं यह बिल्कुल ही अलग तरह का है. और जो फॉल्ट लाइन इसने बाहर किए हैं वो क़ानून सम्मत नहीं हैं.
''वैसे क़ानून को लागू करने की जो समस्या है वो दशकों से है. लेकिन अभी जो दिख रहा है वह कुछ अधिक भयावह है. यह केवल हमारे बोलने की आज़ादी के अधिकार पर हमला नहीं है बल्कि बोलने की आज़ादी की अहमियत पर हमला करने के लिए कहीं बड़ा नैरेटिव रचा गया है.''
सिब्बल ने कहा, "हम भले ही आपातकाल की स्थिति में नहीं पहुँचे हों, लेकिन निश्चित रूप से हम इसकी राह पर हैं. जो हम देख रहे हैं वो हमें गहरे स्तर पर सचेत करता है और हमें इसे यूं ही ख़ारिज नहीं करना चाहिए जैसे कि यह कुछ समय के लिए आई झपकी है, बल्कि इसे देखें कि ये क्या है."
इस वेबिनार में शामिल पटकथा लेखिका ज्योति कपूर ने कहा, "जब कोई एक सेलिब्रिटी मुद्दा उठाएगा तो उसे धमकियाँ दी जाएंगी तो वह वापस बैठ जाएगा. तो किसी मुद्दे पर यहाँ लोगों को एक साथ मिलकर आवाज़ उठानी चाहिए. लेकिन जब वक़्त आता है तो इस इंडस्ट्री से आवाज़ नहीं आती है जो कि मुझे लगता है कि उन्हें साथ आ कर बोलना चाहिए."
इस दौरान ज्योति कपूर ने कहा कि तांडव पर विवाद के बाद पटकथा लेखक असुरक्षित थे.
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