वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार मंगलेश डबराल का निधन

मंगलेश डबराल

इमेज स्रोत, Mangalesh Dabral

वरिष्ठ कवि एवं पत्रकार मंगलेश डबराल का बुधवार को निधन हो गया है. वे 72 साल के थे और कोरोना से संक्रमित थे. साहित्यकार आनंद स्वरूप वर्मा ने बीबीसी को बताया कि मंगलेश डबराल ने दिल्ली के एम्स अस्पताल में बुधवार देर शाम आख़िरी सांस ली.

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित कवि-लेखक मंगलेश डबराल समकालीन हिंदी के चर्चित कवियों में शुमार थे. उनके निधन पर साहित्य जगत से जुड़े कई लोगों ने अपनी संवेदनाएं जताई हैं.

पहाड़ पर लालटेन, घर का रास्ता, हम जो देखते हैं, आवाज़ भी एक जगह है और नये युग में शत्रु- मंगलेश डबराल के 5 काव्य संग्रह हैं.

मंगलेश डबराल ने कविता, डायरी, गद्य, अनुवाद, संपादन, पत्रकारिता और पटकथा लेखन जैसी साहित्य की विविध विधाओं में अपना हाथ आज़माया.

उन्होंने नागार्जुन, निर्मल वर्मा, महाश्वेता देवी, यूआर अनंतमूर्ति, कुर्रतुल ऐन हैदर और गुरुदयाल सिंह पर केंद्रित वृत्त चित्रों का पटकथा लेखन भी किया.

14 मई 1948 को उत्तराखंड के टिहरी गढ़वाल के काफलपानी गांव में जन्में मंगलेश डबराल ने देहरादून से अध्ययन के बाद दिल्ली में हिन्दी पैट्रियट और प्रतिपक्ष के लिए काम किया. वे मध्यप्रदेश कला परिषद्, भारत भवन, जनसत्ता, समय सहारा और नेशनल बुक ट्रस्ट से भी संबद्ध रहे.

छोड़िए YouTube पोस्ट
Google YouTube सामग्री की इजाज़त?

इस लेख में Google YouTube से मिली सामग्री शामिल है. कुछ भी लोड होने से पहले हम आपकी इजाज़त मांगते हैं क्योंकि उनमें कुकीज़ और दूसरी तकनीकों का इस्तेमाल किया गया हो सकता है. आप स्वीकार करने से पहले Google YouTube cookie policy और को पढ़ना चाहेंगे. इस सामग्री को देखने के लिए 'अनुमति देंऔर जारी रखें' को चुनें.

चेतावनी: तीसरे पक्ष की सामग्री में विज्ञापन हो सकते हैं.

पोस्ट YouTube समाप्त

मंगलेश डबराल

इमेज स्रोत, Mangalesh Dabral

एक नज़र मंगलेश डबलराल की लेखनी पर.

'घर शांत है'

धूप दीवारों को धीरे धीरे गर्म कर रही है

आसपास एक धीमी आँच है

बिस्तर पर एक गेंद पड़ी है

किताबें चुपचाप हैं

हालाँकि उनमें कई तरह की विपदाएँ बंद हैं

मैं अधजगा हूँ और अधसोया हूँ

अधसोया हूँ और अधजगा हूँ

बाहर से आती आवाजों में

किसी के रोने की आवाज नहीं है

किसी के धमकाने या डरने की आवाज नहीं है

न कोई प्रार्थना कर रहा है

न कोई भीख माँग रहा है

और मेरे भीतर जरा भी मैल नहीं है

बल्कि एक खाली जगह है

जहाँ कोई रह सकता है

और मैं लाचार नहीं हूँ

इस समय बल्कि भरा हुआ हूँ

एक जरूरी वेदना से

और मुझे याद आ रहा है बचपन का घर

जिसके आँगन में औंधा पड़ा

मैं पीठ पर धूप सेंकता था

मैं दुनिया से कुछ नहीं माँग रहा हूँ

मैं जी सकता हूँ

गिलहरी गेंद या घास जैसा कोई जीवन

मुझे चिंता नहीं

कब कोई झटका हिलाकर

ढहा देगा इस शांत घर को.

मंगलेश डबराल

इमेज स्रोत, Mangalesh Dabral

हत्यारों का घोषणा पत्र

हम जानते हैं कि हम कितने कुटिल और धूर्त हैं

हम जानते हैं कि हम कितने झूठ बोलते आए हैं.

हम जानते हैं कि हमने कितनी हत्याएँ की हैं

कितनों को बेवजह मारा-पीटा है, सताया है

औरतों और बच्चों को भी हमने नहीं बख़्शा

जब लोग रोते-बिलखते थे हम उनके घरों को लूटते थे

चलता रहा हमारा खेल परदे पर और परदे के पीछे भी

हमसे ज़्यादा कोई नहीं जानता हमारे कारनामों का कच्चा-चिट्ठा

इसीलिए हमें उनकी परवाह नहीं

जो जानते हैं हमारी असलियत

हम जानते हैं कि हमारा खेल इस पर टिका है

कि बहुत से लोग हैं जो हमारे बारे में बहुत कम जानते हैं

या बिलकुल नहीं जानते

और बहुत से लोग हैं जो जानते हैं

कि हम जो भी करते हैं, अच्छा करते हैं

वे ख़ुद भी यही करना चाहते हैं.

मंगलेश डबराल

इमेज स्रोत, Mangalesh Dabral

मीडिया विमर्श

उन दिनों जब देश में एक नई तरह का बँटवारा हो रहा था

काला और काला और सफ़ेद और सफ़ेद हो रहा था

एक तरफ लोग खाने और पीने को जीवन का अन्तिम उद्देश्य मान रहे थे

दूसरी तरफ भूख से तड़पते लोगों की तादाद बढ़ रही थी

उदारीकरण की शुरूआत में जब निजी सम्पत्ति और ऊँची इमारतों के निर्माता

राष्ट्र निर्माता का सम्मान पा रहे थे

दूसरी तरफ ग़रीब जहाँ भी सर छुपाते वहाँ से खदेड़ दिए जाते थे

देश के एक बड़े और ताक़तवर अख़बार ने तय किया

कि उसके पहले पन्ने पर सिर्फ़ उनकी ख़बर छपेगी जो खाते और पीते हैं

ऐसी स्वादिष्ट ख़बरें जो सुबह की चाय को बदज़ायका न करें

इस तरह अख़बार के मुखपृष्ठ पर

कारों, जूतों, कपड़ों, कम्प्यूटरों, मोबाइलों, फ़ैशन परेडों, डीलरों, डिजाइनरों

मीडियाशाहों, शराबपतियों, चुटकी बजाकर अमीर बनने वालों ने प्रवेश किया

एक उद्योगपति ने फ़रमाया बहुत हुआ ग़रीबी का रोना-धोना

आइए अब हम अमीरी बढ़ाएँ

देश एक विराट मेज़ की तरह फैला हुआ था जिस पर

एक अन्तहीन कॉकटेल पार्टी जारी थी

समाज में जो कुछ दुर्दशा में था

उसे अख़बार के भीतरी पन्नों पर फेंक दिया गया

रोग शोक दुर्घटना बाढ़ अकाल भुखमरी बढ़ते विकलांग ख़ून के धब्बे

अख़बारी कूड़ेदान में डाल दिए गए

किसान आत्महत्या करते थे भीतरी पन्नों के किसी कोने पर

आदिवासियों के घर उजाड़े जाते थे किसी हाशिए पर

ऐसे ही जश्नी माहौल के बीच एक दिन

अख़बार के बूढ़े मालिक ने अपनी कोठी में आख़िरी साँस ली

जिसकी बीमारी की सूचना अख़बार बहुत दिनों से दाबे था

उसके बेटों को भी बूढ़े मालिक का जाना बहुत नहीं अखरा

क्योंकि उसकी पूँजी की तरह उसके विचार भी पुराने हो चुके थे

और फिर एक युग का अन्त एक नए युग का आरम्भ भी होता है

अगर संकट था तो सिर्फ़ यही कि मृत्यु की ख़बर कैसी कहाँ पर छापी जाए

आख़िर तय हुआ कि मालिक का स्वर्गवास पहले पन्ने की सुर्खी होगी

ग्राहक की सुबह की चाय कसैली करने के सिवा चारा कोई और नहीं था

इस तरह एक दिन ख़ुशी की सब ख़बरें भीतर के पन्नों पर पँहुच गईं

कपड़े, जूते, घड़ियों, मोबाइल, फ़ैशन परेड सब हाशियों पर चले गए

अख़बार शोक से भर गया

नए युग की आवारा पूँजी ने अपनी परिपाटी को तोड़ दिया

और एक दिन के लिए पूँजी और मुनाफ़े पर मौत की जीत हुई.

तानाशाह

''तानाशाहों को अपने पूर्वजों के जीवन का अध्ययन नहीं करना पड़ता. वे उनकी पुरानी तस्वीरों को जेब में नहीं रखते या उनके दिल का एक्स-रे नहीं देखते. यह स्वत:स्फूर्त तरीके से होता है कि हवा में बन्दूक की तरह उठे उनके हाथ या बँधी हुई मुठ्ठी के साथ पिस्तौल की नोक की तरह उठी हुई अँगुली से कुछ पुराने तानाशाहों की याद आ जाती है या एक काली गुफ़ा जैसा खुला हुआ उनका मुँह इतिहास में किसी ऐसे ही खुले हुए मुँह की नकल बन जाता है. वे अपनी आँखों में काफ़ी कोमलता और मासूमियत लाने की कोशिश करते हैं लेकिन क्रूरता एक झिल्ली को भेदती हुई बाहर आती है और इतिहास की सबसे क्रूर आँखों में तब्दील हो जाती है. तानाशाह मुस्कराते हैं, भाषण देते हैं और भरोसा दिलाने की कोशिश करते हैं कि वे मनुष्य हैं, लेकिन इस कोशिश में उनकी भंगिमाएँ जिन प्राणियों से मिलती-जुलती हैं, वे मनुष्य नहीं होते. तानाशाह सुन्दर दिखने की कोशिश करते हैं, आकर्षक कपड़े पहनते हैं, बार-बार सज-धज बदलते हैं, लेकिन यह सब अन्तत: तानाशाहों का मेकअप बनकर रह जाता है. इतिहास में कई बार तानाशाहों का अन्त हो चुका है, लेकिन इससे उन पर कोई फ़र्क नहीं पड़ता क्योंकि उन्हें लगता है वे पहली बार हुए हैं.''

(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)