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बिहार में एनडीए सहयोगी जेडीयू और लोजपा आमने-सामने क्यों हैं
- Author, सीटू तिवारी
- पदनाम, पटना से बीबीसी हिन्दी के लिए
कोरोना काल में बिहार में जेडीयू और बीजेपी सरकारी कामकाज को 'अच्छा और संवेदनशील' होने का दावा कर रही है. लेकिन ठीक उसी वक़्त एनडीए का तीसरा दल लोक जनशक्ति पार्टी अपना अलग राग अलाप रही है.
लोक जनशक्ति पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष चिराग पासवान ने हालिया दिनों में बिहार सरकार के कामकाज पर गंभीर सवाल उठाए हैं. ये सवाल सिर्फ कोरोना और बाढ़ को लेकर सरकार के कामकाज पर ही नहीं है, बल्कि सुशांत सिंह राजपूत, प्रवासी मज़दूरों, भ्रष्टाचार, विकास कार्य के मुद्दे पर भी लोजपा ने सरकार को घेरा है.
ऐसे में ये सवाल उठना लाजमी है कि बिहार में एनडीए के भीतर जेडीयू और लोजपा के आमने-सामने आने की वजह क्या है? साथ ही ये भी कि चिराग पासवान आख़िर चाहते क्या हैं?
नाराज़गी जाहिर करते रहे हैं चिराग
चिराग पासवान ने जून महीने में प्रवासी म़जदूरों के मुद्दे को लेकर राज्य सरकार को घेरा था. उन्होंने सरकार को नसीहत देते हुए कहा था कि प्रवासियों की समस्या का बेहतर तरीक़े से निपटारा हो सकता था.
16 जुलाई को उन्होंने 264 करोड़ की लागत से बने पुल का एक हिस्सा ध्वस्त होने को लेकर ट्वीट किया. उन्होंने लिखा था, "इस तरह की घटनाएं जनता की नज़र में ज़ीरो करप्शन पर सवाल उठाती हैं. इसके लिए लोजपा मांग करती है कि उच्चस्तरीय जांच कर जल्द दोषियों पर कड़ी कार्यवाही की जाएं."
जुलाई माह में उन्होंने नालंदा मेडिकल कॉलेज अस्पताल से ग़ायब हुए शेखपुरा के रंजीत कुमार की तलाश के लिए भी एक पत्र लिखा था. जुलाई में ही सुशांत सिंह राजपूत की मौत पर उन्होंने कहा कि, "मुख्यमंत्री की खामोशी निराश करती है."
अब चिराग पासवान बाढ़ और कोरोना टेस्टिंग को लेकर बिहार सरकार पर सवाल खड़ कर रहे हैं. इससे पहले केन्द्रीय खाद्य आपूर्ति मंत्री राम विलास पासवान और बिहार के खाद्य आपूर्ति मंत्री मदन सहनी के बीच भी राशन को लेकर तनातनी हुई थी.
'कालिदास हैं चिराग'
बिहार सरकार की लगातार हो रही आलोचनाओं के चलते जेडीयू की तरफ से सांसद राजीव रंजन सिंह (ललन सिंह) ने मोर्चा संभाला और उन्होंने चिराग पासवान की तुलना 'कालिदास' से कर डाली.
उन्होंने कहा, "चिराग उसी डाल को काट रहे हैं जिस पर बैठे हैं. प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने सामान्य संदर्भों में राज्यों को जांच की संख्या बढ़ाने की सलाह थी. चिराग ने पीएम की बात को किस रूप में समझा, ये तो उनकी क्षमता पर निर्भर करता है."
लोजपा प्रवक्ता अशरफ अंसारी ने इस तुलना पर पलटवार करते हुए बीबीसी से कहा कि, "प्रधानमंत्री के ट्वीट के समर्थन पर ललन सिंह जी को तकलीफ हुई है. उन्होंने ये तुलना करके टेस्टिंग मामले में प्रधानमंत्री का अपमान किया है."
वहीं जेडीयू प्रवक्ता राजीव रंजन ने बीबीसी से बहुत सधे हुए शब्दों में कहा, "मुझे लगता है चिराग पासवान जी को ज़रूर इस बात का ध्यान रखना चाहिए कि इस गठबंधन ने 2019 मे बिहार में विपक्ष का पूरी तरह सफाया कर दिया था. और उससे भी बेहतर नतीजों की तरफ बिहार बढ़ता हुआ दिख रहा है. इसलिए बिहार के लोगों की भावनाओं का सम्मान एक कार्यकर्ता के साथ-साथ बड़े नेताओं को भी करना चाहिए."
दरअसल जेडीयू के लिए एक मुश्किल ये भी है कि चिराग को लोजपा की तरफ से बिहार के मुख्यमंत्री के तौर पर प्रोजेक्ट किया जा रहा है. उनके पिता और लोजपा के संस्थापक राम विलास पासवान ने कहा है कि उनके बेटे चिराग पासवान में मुख्यमंत्री बनने की क्षमता है. उनका कहना है कि पार्टी का सारा मामला चिराग ही देख रहे हैं, "वो और संसदीय बोर्ड जो भी फ़ैसला लेगा, हम उसके साथ में है."
बिहार में मुख्यमंत्री पद के चेहरे के लिए हालिया वक़्त में बीजेपी और जदयू में तनातनी रही है. हाल के दिनों में बीजेपी के कई नेता ये दोहराते रहे हैं कि जब बीजेपी का कद बढ़ा है तो मुख्यमंत्री उन्हीं की पार्टी का होना चाहिए. हालांकि अब तक इन बयानों पर पार्टी आलाकमान वक़्त-वक़्त पर ये कहकर लगाम लगाता रहा है कि 'बिहार में मुख्यमंत्री का चेहरा नीतीश कुमार ही होंगे.'
बीजेपी ने साधी चुप्पी
हालांकि बिहार में ख़ुद को गाहे-बगाहे 'बड़े भाई' की नई भूमिका में देखने का दावा करने वाली बीजेपी इस पूरे मुद्दे पर मौन है.
बिहार बीजेपी प्रवक्ता प्रेम रंजन पटेल ने बीबीसी से कहा, "दोनों के बीच चल रहा वाकयुध्द कोई बड़ी चिंता का विषय नहीं है. राजनीति में ये सब चलता रहता है. तीनों पार्टियां जब साथ बैठेंगी तो ये सारी बातें ख़त्म हो जाएगीं."
लेकिन जानकारों की मानें तो बीजेपी का ये मौन, लोजपा के लिए एक तरह से सहमति है. चुनाव कराने को लेकर जहां बीजेपी का स्टैंड साफ नहीं है. वहीं वो लोजपा के ज़रिए चुनाव टालने की मांग को आगे बढ़ा रही है.
साफ़ है कि बीजेपी अभी वेट और वॉच करना चाहती है. उपमुख्यमंत्री सुशील कुमार मोदी कह चुके है, "बिहार के विधानसभा चुनाव कब और कैसे होंगे, इसका फैसला चुनाव आयोग को करना है."
माना जा रहा है कि राष्ट्रपति शासन में यदि चुनाव होता है तो ये बीजेपी के लिए बेहतर स्थिति होगी. बीजेपी इस टकराव के ज़रिए नीतीश कुमार की नेतृत्व वाली छवि को भी घेरने में लगी है, जिससे उनकी स्थिति कमज़ोर हो जाए.
लड़ाई अपने-अपने अस्तित्व की है
बिहार की राजनीति को नज़दीक से देखने वाले जानकारों के मुताबिक़ जेडीयू और लोजपा के बीच चल रहा ये वाकयुध्द राजनीति में अपने-अपने अस्तित्व को लेकर है.
जेडीयू-बीजेपी ने आख़िरी बार बिहार विधानसभा चुनाव में साल 2010 में एक साथ लड़ा था. उस वक़्त बीजेपी ने 102 और जेडीयू ने 141 सीट पर चुनाव लड़ा था. जेडीयू चाहती है कि आगामी चुनाव में बीजेपी अपने हिस्से में से लोजपा को सीटें दें. लोजपा 43 सीट पर अपना दावा कर चुकी है.
जेडीयू के साथ मुश्किल ये है कि अगर वो कम सीटों पर चुनाव लड़े और कम सीटों पर उसकी जीत दर्ज हो, तो कहीं ना कहीं ये नीतीश कुमार के मुख्यमंत्री के चेहरे के तौर पर प्रोजेक्शन के लिए धक्का साबित होगा. जो हो सकता है कि जेडीयू में टूट भी ला सकती है.
वरिष्ठ पत्रकार सुरूर अहमद एक और महत्वपूर्ण बात की तरफ इशारा करते हैं. वो कहते हैं कि रामविलास पासवान मोदी मंत्रीमंडल में सबसे उम्रदाराज़ मंत्री हैं, "रामविलास पासवान अगले साल 75 साल के हो रहे हैं. उनकी उम्र का वास्ता देकर उन्हें हटाया जा सकता है. ऐसे में लोजपा सिर्फ सांसदों की पार्टी केन्द्र में रह जाएगी. पार्टी की कोशिश है कि चिराग को कोई पद दिलाया जाए और उनके पॉलीटिकल करियर को दिशा मिले."
जेडीयू - लोजपा
लोजपा का गठन साल 2000 में राम विलास पासवान ने किया था. मुख्य रूप से दलित आधार वाली इस पार्टी ने एक वक़्त अल्पसंख्यकों के बीच कुछ अर्से के लिए उस वक्त अपनी जगह बनाई थी जब मुसलमान मुख्यमंत्री बनाने की मांग को लेकर राजद के साथ जाने से उसने इनकार कर दिया था. गौरतलब है कि बिहार में दलित जातियों को तक़रीबन 15 फ़ीसदी और मुसलमानों को तक़रीबन 16 फीसदी वोट शेयर है.
'पासवान' जो कि दलितों की उपजाति है उसे नीतीश कुमार की सरकार ने कई सालों तक, अपनी सरकार द्वारा बनाई हुई महादलित श्रेणी में शामिल नहीं किया. नीतीश कुमार ने दलितों की 21 उपजातियों के विकास के लिए 'महादलित' श्रेणी बनाई थी जिसमें पासवान को साल 2018 में शामिल किया गया.
इस वक़्त बिहार विधानसभा में लोजपा के दो विधायक और लोकसभा में 6 सांसद हैं. मीडिया के गलियारों में ये ख़बर आम है कि जेडीयू के कई नेता बीजेपी आलाकमान के संपर्क में है.
बिहार में चल रही इस उठापटक का एक संकेत ये भी है नीतीश का नेतृत्व पहले की तरह 'सर्वमान्य और सर्वाधिकार सुरक्षित' वाली स्थिति में नहीं रहा.
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