जम्मू-कश्मीर: जीसी मुर्मू का उप राज्यपाल पद से अचानक इस्तीफ़ा क्यों?

    • Author, माजिद जहांगीर
    • पदनाम, श्रीनगर से, बीबीसी हिंदी के लिए

बुधवार को केंद्र शाषित प्रदेश जम्मू-कश्मीर के लेफ्टिनेंट गवर्नर जीसी मुर्मू ने धारा 370 हटाए जाने की पहली बरसी पर इस्तीफ़ा देकर हैरान कर दिया.

बुधवार शाम से ही उनके इस्तीफ़े और उनकी जगह किसी और की नियुक्ति की अटकलें लगनी शुरू हो गयी थीं

गुरुवार सुबह राष्ट्रपति भवन से उनके इस्तीफ़े और पूर्व केंद्रीय मंत्री और बीजेपी नेता मनोज सिन्हा के नए लेफ्टिनेंट गवर्नर नियुक्त किये जाने की विज्ञप्ति भी आ गयी.

पिछले साल धारा 370 को निष्प्रभावी किये जाने के बाद, 31 अक्टूबर को गिरीश चंद्र मुर्मू को केंद्र शाषित प्रदेश जम्मू-कश्मीर का लेफ्टिनेंट गवर्नर बनाया गया था.

अचानक इस्तीफ़ा क्यों दिया?

कश्मीर में राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं की मुर्मू का इस्तीफ़ा और उनको दिल्ली वापस बुलाने का मक़सद कश्मीर के ख़राब हालात को पटरी पर वापस लाना और कश्मीर में राजनैतिक अमल को शुरू करना है.

श्रीनगर में पॉलिटकल साइंस के प्रोफ़ेसर नूर अहमद बाबा ने बीबीसी को बताया कि मुर्मू अपने सीमित कार्यकाल के दौरान लोकप्रिय नहीं हो सके और घाटी के हालात सुधारने के लिए कुछ ख़ास क़दम नहीं उठा पाए.

उन्होंने बताया, "मुर्मू के हटाये जाने की वजह तो नहीं मालूम लेकिन इतना ज़रूर है कि वह शायद विकास के काम उतने नहीं कर पाये जितने कि उम्मीद थी. एक साल बाद भी ज़मीन पर तरक़्क़ी कम दिख रही है. राज्य में सियासतदान तमाम मुश्किलों से दो चार हैं और लोगों में इस बात को लेकर काफ़ी ग़ुस्सा है. शायद यही वजह है कि केंद्र, घाटी में ज़मीनी हालात बदलने की गरज़ से, कुछ नया करना चाह रहा है.'

उनका कहना है कि नौकरशाहों की सियासी समझ सीमित होती है लेकिन पहली बरसी पर उनका इस्तीफ़ा देना, ज़मीन पर हालात न बदलने की बात स्वीकारने जैसा है.

शायद यही वजह है कि मुर्मू की जगह एक राजनीतिज्ञ को यहाँ भेजा जा रहा है.

कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ा

कश्मीर टाइम्स की कार्यकारी संपादक और राजनीतिक विश्लेषक अनुराधा भसीन कहती हैं कि मुर्मू की जगह कोई दूसरा व्यक्ति होता तब भी एक साल में कोई ख़ास फ़र्क़ नहीं पड़ता क्योंकि सत्ता और लोगों के बीच खाई काफ़ी गहरी है

अनुराधा भसीन ने बीबीसी को बताया, "उनका कार्यकाल कोई ख़ास नहीं रहा. जम्मू-कश्मीर में 4जी इन्टरनेट के बारे में उनका बयान विवादास्पद ज़रूर रहा. लेकिन हो सकता है कि उनका यह बयान निजी हो'

जम्मू-कश्मीर में पिछले कई महीनों से 4जी इंटरनेट बंद पड़ा है. सुप्रीम कोर्ट में इसकी सुनवाई चल रही है.

अनुराधा भसीन का कहना है मुर्मू से पहले सत्यपाल मलिक राज्यपाल थे लेकिन तब हालात अलग थे क्योंकि तब यह एक पूर्ण राज्य था. मलिक सियासी मुद्दों पर खुलकर बात करते थे लेकिन मुर्मू नौकरशाही के ताने बाने में उलझ कर रह गए थे. इसलिए उनकी लोकप्रियता काम होती गयी. वह केंद्र को राज्य के बारे में कोई सलाह देने के स्थिति में नहीं रहते थे.

श्रीनगर के एक अन्य विश्लेषक तारिक़ अली मीर का भी मानना है की मुर्मू तो बस केंद्र जो कहता था, कर देते थे.

तारिक़ अली मीर ने बीबीसी से बातचीत मैं कहा, "जीसी मुर्मू ज़मीन से जुड़े हुए व्यक्ति नहीं थे. कश्मीर जैसी संवेदनशील जगह की उन्हें कोई समझ नहीं थी. वह एक सरकारी नौकर की तरह अपनी नौकरी कर रहे थे. यहाँ की समस्या सुलझाने के लिए उन्होंने कोई व्यक्तिगत कोशिश नहीं की.

मुर्मू को जम्मू-कश्मीर में राज्य के बाहर से वहां जाकर बसे लोगों को डोमिसाइल सर्टिफिकेट जारी करने के लिए भी जाना जायेगा. लेकिन जानकार कहते हैं कि इसमें भी वह गृह मंत्रालय के आदेश का पालन कर रहे थे.

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