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राजस्थानः अशोक गहलोत का संकट समाप्त या सचिन पायलट की पिक्चर बाक़ी?
- Author, अपूर्व कृष्ण
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
राजस्थान में राजनीति के जादूगर अशोक गहलोत ने एक बार फिर अपना जादू दिखा दिया, आँकड़े आज उनके साथ दिखाई दे रहे हैं. 200 सीटों वाली विधानसभा में वो 121 विधायकों के समर्थन का दावा कर रहे हैं, यानी ये कह रहे हैं कि बहुमत के लिए जो 101 सीटें चाहिए, उससे उनके पास 20 सीटें ज़्यादा हैं.
तो क्या उनकी सरकार के सिर से संकट समाप्त गया है? या अभी पिक्चर बाक़ी है?
क्या फिर इस पिक्चर में राज्यपाल, स्पीकर, संविधान की दुहाई और सुप्रीम कोर्ट के दरवाज़े पर दस्तक वाला पुराना सीन दोहराया जाएगा?
और क्या बाग़ी विधायकों को अयोग्य घोषित कर दिया गया तो उससे समीकरण बदलेगा?
इन सवालों को टटोलने से पहले आँकड़े समझना ज़रूरी है, कि किसके पास कितनी सीटें हैं, किसके साथ कौन है.
अंकगणित - किसके ख़ेमे में कौन?
2018 में हुए चुनाव और 2019 में हुए उपचुनाव के बाद 200 सीटों वाली विधानसभा का गणित कुछ ऐसा है.
कांग्रेस ने 2018 में 99 सीटें जीती थीं, 2019 के उपचुनाव में 1 - यानी उसके पास अपनी 100 सीटें हैं.
कांग्रेस के साथ हैं - राष्ट्रीय लोकतांत्रिक दल का 1 विधायक, जो मंत्री है, और बहुजन समाज पार्टी के 6 विधायक. यानी इन्हें मिलाकर कांग्रेस के पास हुए 107 विधायक.
इनके अलावा 13 निर्दलीय विधायक कांग्रेस के साथ रहे हैं. इन्हें मिलाकर हुए 120.
इनके अलावा 2-2 सीटें सीपीआई(एम) और भारतीय ट्राइबल पार्टी के पास हैं. इनमें सीपीएम के एक विधायक ने राज्यसभा चुनाव में कांग्रेस के पक्ष में वोट दिया था. तो इन्हें मिलाकर ये संख्या बैठती है 121 जिसका दावा अशोक गहलोत ने किया है.
बीजेपी ने 2018 में 72 सीटें जीती थीं, 2019 के उपचुनाव में 1 - उसके पास अपनी 73 सीटें हैं.
बीजेपी के साथ ये पार्टी है - राष्ट्रीय लोकतांत्रिक पार्टी जिसके 3 विधायक हैं. यानी बीजेपी की छतरी तले कुल 76 विधायक हैं.
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सचिन के साथ कितने, क्या जा सकती है सीट?
सचिन पायलट के साथ कितने विधायक हैं, ये अभी भी स्पष्ट नहीं है. ये संख्या 20 से 30 के बीच घूम रही है, और इनमें कांग्रेस के भी विधायक ही नहीं, निर्दलीय भी गिने जा रहे हैं.
ध्यान रहे कि दल-बदल क़ानून के तहत अगर दो तिहाई से कम विधायक पाला बदलते हैं तो उनकी सदस्यता समाप्त की जा सकती है.
सदस्यता एक और वजह से जा सकती है, वो है पार्टी विरोधी गतिविधियों के आधार पर, जिसे दलबदल ठहराया जा सकता है.
संविधान की 10वीं अनुसूची, जिसे दलबदल विरोधी क़ानून कहा जाता है, उसके तहत अभी कांग्रेस सरकार बाग़ी सुर अपनाने वाले विधायकों के ख़िलाफ़ स्पीकर को शिकायत कर सकती है, इसके बाद स्पीकर उनसे स्पष्टीकरण मांगेंगे और संतुष्ट ना होने की सूरत में उन्हें निलंबित किया जा सकता है, या निष्कासित किया जा सकता है यानी फिर वो विधायक नहीं रहेंगे.
तो ऐसे में तो कांग्रेस के विधायकों की संख्या कम हो जाएगी? बहुमत का आँकड़ा भी नीचे आ जाएगा. फिर अगर शक्ति परीक्षण हुआ तो बीजेपी का पलड़ा भारी हो सकता है, क्योंकि उनके विधायकों की संख्या तो पहले जैसी रहेगी?
इस सवाल पर वरिष्ठ पत्रकार प्रदीप कौशल कहते हैं, "ऐसा होता नहीं, ये पार्टियाँ बड़ी चतुराई से काम करती हैं, वो कुछ लोगों को ही निकालती हैं, वो सबको क्यों निकालेंगी? वो निकालेंगी भी तो कुछ चुने हुए लोगों को. फिर लोग डरते भी हैं, कि अगर सीट गई तो दोबारा चुनाव लड़ना होगा. ऐसे में कुछ लोगों के विरूद्ध कार्रवाई होगी, तो कुछ लोग पलट भी सकते हैं."
प्रदीप कौशल ध्यान दिलाते हैं कि अभी बीजेपी ने भी बहुमत परीक्षण करवाए जाने की माँग नहीं की है, इसलिए अशोक गहलोत निकालेंगे भी तो कुछ लोगों को निकालेंगे जिससे संख्या बहुत नीचे नहीं आए और विरोधी पक्ष की धार कम हो जाए क्योंकि अभी संख्या उनके पक्ष में दिखाई देती है.
बदल सकतें हैं आँकड़े?
जानकार बताते हैं कि आँकड़ो के चक्कर में उलझना, इसे बहुत तूल देना बेमानी है, क्योंकि ये समस्या संख्या की नहीं, राजनीति की है, जो अब बदल चुकी है.
वरिष्ठ पत्रकार रशीद किदवई कहते हैं कि पहले मान्यता थी कि कोई व्यक्ति अगर एक विचारधारा का है तो दूसरी विचारधारा में नहीं जाता, या अगर कोई विधायक बनता है तो वो विधायकी खोना नहीं चाहता, लेकिन कर्नाटक और मध्य प्रदेश में देखा गया कि एक-डेढ़ साल में भी विधायक अपनी सदस्यता खोने को तैयार रहते हैं.
रशीद कहते हैं, "आँकड़े अभी अशोक गहलोत के समर्थन में दिख रहे हैं, उन्होंने उसे पेश भी किया है, लेकिन अगर हम अपने देश की पिछले चार-पाँच साल की राजनीति को देखें तो कोई भी राजनीतिक संकट होता है, ख़ासतौर से ग़ैर-भाजपा शासित प्रदेशों में, तो ये आँकड़े बहुत तेज़ी से बदलते हैं. ये दुर्भाग्यपूर्ण है, लेकिन ये देखा गया है कि पिछले कुछ सालों से हर बड़े राज्य में 20-30 विधायक ऐसे होते हैं, जिनकी राजनीतिक आस्था या निष्ठा उतनी मज़बूत नहीं होती जितनी कि वेस्टमिंस्टर मॉडल पर आधारित लोकतांत्रिक व्यवस्था में होनी चाहिए. इसलिए नंबर पर ध्यान ना दें क्योंकि नंबर बहुत तेज़ी से बदल सकते हैं."
राजस्थान के सियासी संकट में एक बात जिसे सारे राजनीतिक प्रेक्षकों ने लक्ष्य किया, वो है भारतीय जनता पार्टी की चुप्पी, या ऐसा कहें कि उत्साह की कमी. जानकार बताते हैं कि खेल अभी समाप्त नहीं समझा जाना चाहिए, और उसका ताज़ा उदाहरण मध्य प्रदेश है.
रशीद याद दिलाते हैं, "मध्य प्रदेश में भी बहुत तेज़ी से स्थिति बदली. मार्च की शुरूआत में वहाँ जब बग़ावत हुई थी तो कमलनाथ ने ठीक वैसे ही सब संभाल लिया था जैसे अशोक गहलोत ने संभाला है, लेकिन जब शक्ति परीक्षण की बात आई तो कमलनाथ पीछे हट गए."
राज्यपाल, स्पीकर, अदालत तक जाएगा मामला?
राज्यों में राजनीतिक संकटों के दौरान अक्सर देखा गया है कि राज्यपाल की भूमिका की चर्चा होती है, कि वो किसे सरकार बनाने के लिए बुलाते हैं.
स्पीकर की भूमिका की चर्चा होती है, कि वो सरकारों को विश्वास मत हासिल करने के लिए कहते हैं कि नहीं, इसके लिए कितने दिन देते हैं.
अदालत की भी बात उठती है, जहाँ राज्यपाल या स्पीकर के फ़ैसले को संविधान पर ख़तरा बताकर गुहार लगाई जाती है.
लेकिन जानकार कहते हैं कि ये सारी बातें अब बेमानी हो चुकी हैं क्योंकि निष्पक्षता का मापदंड ही नहीं बचा.
राज्यपालों की भूमिका तो इंदिरा गांधी के ही दौर में स्याह हो गई जब जम्मू-कश्मीर, आंध्र प्रदेश, हरियाणा जैसे राज्यों में सरकारें देखते-देखते इधर से उधर हो गईं.
वहीं स्पीकर से भले ही निष्पक्षता की अपेक्षा की जाती है, लेकिन वास्तविकता ये है कि वो भी सदन का एक सदस्य होता है, जिसे पाँच साल बाद फिर चुनावी मैदान में उतरना होता है, ऐसे में उसके ग़ैर राजनीतिक होने की संभावना बहुत मज़बूत नहीं रह जाती.
रहा सवाल अदालत का, तो अदालत क़ानूनी दायरे में काम करती है और जानकार कहते हैं कि राजनीतिक संकटों में समस्या राजनीतिक होती है जिसमें अदालत ज़्यादा कुछ नहीं कर सकती.
रशीद किदवई कहते हैं कि आगे जाकर अगर ये मामला राज्यपाल के पास पहुँचता है तो भी ऐसा नहीं होगा कि राज्यपाल कलराज मिश्र संविधान की धज्जियाँ उड़ा देंगे, यदि उनके पास ये मामला गया, तो ऐसा होगा कि सारी परिस्थितियाँ ही उसी हिसाब से बन जाएँगी.
वो कहते हैं कि तंत्र का सदुपयोग-दुरूपयोग होता है और खुलकर होगा, कर्नाटक-मध्य प्रदेश में हम देख चुके हैं.
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