कोरोना मामलों की सूचनाएं देने में क्यों कतरा रही है मोदी सरकार

    • Author, अनंत प्रकाश
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले लोगों की कुल संख्या एक लाख अठारह हज़ार के पार पहुंच गई है.

ये ख़बर लिखे जाने तक मरने वालों की संख्या 3583 हो चुकी है.

इसके साथ ही सरकार के मुताबिक़, 48534 लोग इस वायरस से संक्रमित होने के बाद ठीक हो चुके हैं.

बीते 24 घंटों में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या में 6,088 अंकों की बढ़ोतरी हुई है और 148 लोगों की मौत हो चुकी है.

लेकिन अगर एक पत्रकार ये जानना चाहे कि इन 132 लोगों में से कितने लोग डायबिटीज़ से पीड़ित थे तो शायद उसके लिए ये आसान नहीं होगा क्योंकि सरकार ने सूचनाएं देने के माध्यम प्रेस कॉन्फ्रेंस को प्रतिदिन आयोजित करना बंद कर दिया है.

ये वही समय है जब लगभग दो महीने बाद लॉकडाउन खुलना शुरू हुआ है.

लोगों ने कम संख्या में ही सही लेकिन ऑफ़िस जाना शुरू किया है.

ऐसे में लोगों के मन में कई सवाल उठ रहे हैं कि सरकार किस तरह टेस्टिंग कर रही है, कितने लोग ठीक हो चुके हैं, ठीक होना क्या होता है, कितने लोग वेंटिलेटर का इस्तेमाल कर रहे हैं, मरने वालों की संख्या को लेकर अलग-अलग ख़बरें क्यों आ रही हैं और संक्रमण की रफ़्तार थमी है या बढ़ी है.

ऐसे सवालों की फेहरस्ती लंबी है लेकिन इनमें एक सवाल ये भी है कि आख़िर सरकार सवालों के जवाब देने से कतराती हुई क्यों दिख रही है.

सरकार ने सुना कम, बोला ज़्यादा?

दुनिया भर में कोरोना वायरस से जुड़ी जानकारी देने के लिए विभिन्न देशों के प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति पत्रकारों का सामना कर रहे हैं.

लेकिन भारत में बीते दो महीनों में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह ने एक भी प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं की है.

सामान्यत: पेशे से डॉक्टर रहे स्वास्थ्य मंत्री डॉ. हर्षवर्धन स्वास्थ्य मामलों से जुड़ी प्रेस वार्ताओं में शामिल होते रहे हैं.

लेकिन कोरोना वायरस के मामले में वह भी स्वास्थ्य मंत्रालय की रोज़ाना ब्रीफ़िंग में शामिल नहीं हुए.

इन सभी सार्वजनिक पद पर बैठे लोगों की ग़ैर-मौजूदगी में स्वास्थ्य मंत्रालय के संयुक्त सचिव लव अग्रवाल 50 से ज़्यादा बार प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हो चुके हैं.

कुछ दिनों पहले 11 मई को ये सिलसिला भी रुक गया. प्रेस कॉन्फ्रेंस होना बंद हो गई.

बीते बुधवार लव अग्रवाल आख़िरी बार कोरोना वायरस के मसले पर सामने आए लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में कोरोना वायरस के मुद्दे को 15 मिनट से ज़्यादा समय नहीं मिला.

फ़िलहाल कोरोना वायरस से जुड़ी आधिकारिक सूचनाएं सरकारी वेबसाइटों और आधिकारिक ट्विटर हैंडल से हासिल की जा सकती है.

ऐसे में सवाल उठता है कि क्या ये वो समय था जब पत्रकारों को अपने सवालों के जवाब तलाशने के लिए लव अग्रवाल और पुण्य सलिला श्रीवास्तव से मानसिक कसरत करनी चाहिए थी.

कुछ पत्रकारों ने तो यहां तक कहा है कि जब स्वास्थ्य मंत्रालय को सवालों के जवाब नहीं देने होते हैं तो लॉकडाउन में पत्रकारों को प्रेस कॉन्फ्रेंस में आने का न्यौता क्यों दिया जाता है.

विवादों का जन्म

लव अग्रवाल के नेतृत्व में आयोजित की जाने वाली ये प्रेस कॉन्फ्रेंस विवादों में तब आई जब कथित रूप से कुछ पत्रकारों को इसमें शामिल होने से रोक दिया गया.

सोशल मीडिया पर कुछ पत्रकारों ने इसे लेकर विरोध भी जताया. इसके बाद पत्रकारों ने सवालों के जवाब नहीं मिलने की बात सोशल मीडिया में रखी.

कई पत्रकारों ने लिखा कि प्रेस कॉन्फ्रेंस में सवाल पूछने का मौक़ा नहीं मिलता है.

इसी बीच आईसीएमआर की ओर से आंकड़े जारी होना बंद हो गए.

इसके बाद एक ऐसा वक़्त भी आया कि जब स्वास्थ्य मंत्रालय की इस प्रेस ब्रीफिंग में आईसीएमआर के वैज्ञानिकों का दिखना बंद हो गया. ये समय 24 अप्रैल था जब पहली बार आईसीएमआर के अधिकारी प्रेस ब्रीफिंग में शामिल नहीं हुए.

एक ऐसे समय जब अफ़वाहों का बाज़ार गर्म हो तब आईसीएमआर के संक्रामक रोग के विशेषज्ञ अधिकारियों के ब्रीफिंग में उपस्थित न होने पर आपत्ति जताई गई.

सोशल मीडिया पर सार्वजनिक स्वास्थ्य से जुड़े मुद्दों पर काम करने वाले विशेषज्ञों ने इस पर आपत्ति जताई.

कोरोना वायरस से परेशान हुई सरकार?

अंग्रेज़ी अख़बार लाइव मिंट में 23 अप्रैल 2020 को प्रकाशित एक ख़बर के मुताबिक़, आईसीएमआर के महानिदेशक बलराम भार्गव ने कोरोना वायरस कर्व के फ्लैटेन होने यानी संक्रमण की रफ़्तार में स्थिरता आने की बात कही थी.

लेकिन 23 अप्रैल के ठीक एक महीने बाद भी लगातार मामले आना जारी हैं. और यही नहीं कर्व लगातार बढ़ता जा रहा है.

प्रति दिन के लिहाज़ से देखा जाए तो 15 मई के बाद से कोरोना वायरस से संक्रमित होने वाले लोगों की संख्या में प्रति दिन नए मामले 3 हज़ार से बढ़कर अब औसतन छह हज़ार के करीब हो गए हैं. हालांकि ये भी कहा जा रहा है कि ऐसा टेस्टिंग बढ़ने की वजह से हुआ है.

आख़िर क्यों ज़रूरी है प्रेस कॉन्फ्रेंस

बीते बुधवार आईसीएमआर के अधिकारी और स्वास्थ्य मंत्रालय के अधिकारी एक लंबे समय बाद प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए.

लेकिन इस प्रेस कॉन्फ्रेंस में भी आईसीएमआर की ओर से आए संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ डॉ. रमन गंगाखेडकर को ज़्यादा समय नहीं मिला.

लगभग तीन दशकों से भारत में विज्ञान और स्वास्थ्य के क्षेत्र में रिपोर्टिंग कर रहे पल्लव बागला इसे सही नहीं मानते हैं.

वो कहते हैं, "स्वास्थ्य मंत्रालय की प्रेस ब्रीफिंग में संक्रामक रोगों के विशेषज्ञ डॉ. गंगाखेडकर उपस्थित रहा करते थे जो कि ठीक था. लेकिन फिर वो भी बंद हो गया. कल बुधवार को जब वह प्रेस कॉन्फ्रेंस में शामिल हुए तो उन्होंने मुश्किल से 24-25 शब्द बोले होंगे. मेरा अनुभव ये कहता है कि अगर आपको इसे क़ाबू करना है तो जनता को जानकारी देनी पड़ेगी."

"अगर जनता में डर के माहौल को कम करने के उद्देश्य से रोज़ प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं करने का फ़ैसला किया गया तो एक बार ये स्वीकार किया जा सकता है. लेकिन अगर आप सिर्फ़ इसलिए प्रेस कॉन्फ्रेंस नहीं कर रहे हैं कि भारत में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की संख्या बढ़ रही है तो ये सही बात नहीं है."

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