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कोरोना आरोग्य निधि और तब्लीग़ी जमात को लेकर असम में क्यों उठा विवाद?
- Author, दिलीप कुमार शर्मा
- पदनाम, गुवाहाटी से बीबीसी हिंदी के लिए
असम में फैल रहे कोरोना वायरस से निपटने के लिए कई लोग असम आरोग्य निधि में डोनेशन देकर सरकार की मदद कर रहे हैं.
असम सरकार के स्वास्थ्य मंत्री हिमंत बिस्वा सरमा लगातार डोनेशन देने वाले ऐसे लोगों की तस्वीरें अपने ट्वीटर अकांउट पर साझा कर उनका आभार व्यक्त कर रहें है.
लेकिन इस बीच असम आरोग्य निधि में डोनेशन देने वाले फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के कुछ सदस्यों द्वारा मंत्री सरमा को लिखी गई एक चिट्ठी ने विवाद खड़ा कर दिया है.
फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल का काम किसी भी व्यक्ति की नागरिकता की जांच करना होता है. असम में इस समय 300 फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल चल रहें है.
दरअसल असम में बीते साल 19 लाख से अधिक लोगों को नागरिक सूची अर्थात एनआरसी से बाहर कर दिया गया था अब इन सभी लोगों को अपनी नागरिकता फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के समक्ष साबित करनी होगी.
गृह विभाग की एक जानकारी के अनुसार, असम में शुरू में 11 अवैध प्रवासी निर्धारण न्यायाधिकरण (आईएमडीटी) थे. लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने साल 2005 में अवैध प्रवासियों (न्यायाधिकरणों द्वारा निर्धारण) अधिनियम, 1983 यानी आईएमडीटी क़ानून को रद्द कर दिया था जिसके बाद इन्हें फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल में बदल दिया गया.
यह एक अर्द्धन्यायिक व्यवस्था है जिसमें मेंबर-जज को नियुक्त किया जाता है. पहले इन फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल में रिटार्यड जजों की नियुक्ति होती थी लेकिन अब सात साल के अनुभव वाले वकीलों को मेंबर बनाया गया है जिसके चलते फॉरेनर्स ट्राइब्यूनल के कामकाज पर लगातार सवाल उठ रहें हैं.
फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के कुल 12 सदस्यों और कुछ कर्मचारियों ने असम आरोग्य निधि में कुल मिलाकर 62 हजार 999 रुपये दान किए थे.
इस दौरान बाक्सा फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के मेंबर कमलेश कुमार गुप्ता ने सभी सदस्यों और कर्मचारियों की तरफ से स्वास्थ्य मंत्री सरमा को कोरोना वायरस महामारी के लिए मदद स्वरूप दान देने को लेकर 7 अप्रेल को एक पत्र लिखा. इस पत्र में उल्लेख अनुसार मंत्री को यह पत्र प्रदेश के अतिरिक्त महाधिवक्ता देबजीत सैकिया के ज़रिए भेजा गया.
यहां तक तो सबकुछ ठीक था लेकिन कमलेश कुमार गुप्ता के हस्ताक्षर वाले इस पत्र में नीचे की तरफ लिखा गया था,"हमारी आपसे एकमात्र प्रार्थना है कि तब्लीग़ी जमात के उल्लंघनकर्ता सदस्यों, जिहादी और जाहिल को इस डोनेशन का फ़ायदा न दिया जाए."
तब्लीग़ी जमात के सुर्खियों में होने की वजह दिल्ली में आयोजित एक कार्यक्रम है जिसके बाद देश भर में कोविड -19 के कई मामले सामने आए. वैसे तो तब्लीग़ी जमात का मामला सामने आने के बाद ख़ासकर सोशल मीडिया में काफी सांप्रदायिक बयानबाजी देखने को मिली थी लेकिन फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल जैसी संस्था के ज़िम्मेदार लोगों की तरफ से सरकार को सीधे इस तरह सांप्रदायिक बात लिखने की किसी ने उम्मीद नहीं की थी.
गुवाहाटी हाई कोर्ट के वरिष्ठ वकिल हाफ़िज रसीद अहमद चौधरी कहते हैं,"मैंने लेटर पढ़ा है. फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के मेंबरों ने पत्र में जिस भाषा का उपयोग किया है उससे मुसलमानों के प्रति उनकी सोच कापता चलता है. कोरोना वायरस से हम देर-सवेर निपट लेंगे लेकिन ये जो सांप्रदायिक वायरस है ये समाज के लिए बहुत ख़तरनाक है. यही लोग ट्रिब्यूनल में बैठकर मुसलमानों की नागरिकता का फ़ैसला लेते है. इन लोगों से न्याय की उम्मीद कैसे की जा सकती है, जो खुलेआम सांप्रदायिक बात कर रहें है."
वो कहते है,"ऐसे लोगों के ख़िलाफ़ सरकार को कार्रवाई करने की जरूरत है.इन सभी लोगों का बैकग्राउंड कानून से जुड़ा हुआ है और यही लोग नहीं जानते की संविधान के अनुच्छेद 21 में यह लिखा हुआ है कि किसी भी व्यक्ति को कानून द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार अपने जीवन या व्यक्तिगत स्वतंत्रता से वंचित नहीं किया जाएगा. इसके अलावा डोनेशन में शर्त लगाना क़ानूनी अपराध है."
राज्य की सत्ता संभाल रही बीजेपी मानती है कि इस तरह की सांप्रदायिक बातों से पार्टी द्वारा सभी समुदाय के लिए किए जा रहें अच्छे कार्यों पर बुरा असर पड़ता है.
असम प्रदेश बीजेपी के उपाध्यक्ष विजय कुमार गुप्ता ने बीबीसी से कहा,"इस तरह के कमेंट को उचित नहीं कहा जा सकता. अभी समूचे विश्व में कोरोना जैसी महामारी फैली हुई है और यह बीमारी किसी भाषा या विशेष समुदाय के लिए नहीं है. हम सबको मिलकर इस महामारी से निपटना है.ऐसे समय में हम सबको मानवता के लिए काम करना है."
क्या आपकी पार्टी ऐसे लोगों के खिलाफ सरकारी कार्रवाई करेगी ताकि दूसरे लोग संकट की इस घड़ी में इस तरह का बयान देने से दूर रहेंगे?
इस सवाल का जवाब देते हुए बीजेपी नेता कहते है,"निश्चित तौर पर मैं इस बात को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं के समक्ष रखूंगा. हमारे प्रधानमंत्री ने बारबार सभी पक्षों को सांप्रदायिक बातों से दूर रहने के लिए कहा है. लिहाजा यह बात पार्टी के सभी नेताओं के संज्ञान में लाएंगे. साथ ही यह सुनिश्चित करेंगे की समाज में किसी भी वर्ग, भाषा और समुदाय के साथ कोई भेदभाव व्यवहार न हो."
दरअसल मीडिया में फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के मेंबरों द्वारा लिखा गया यह पत्र लीक होने के बाद कई संगठनों ने इसकी कड़ी आलोचना की है.
ऑल असम अल्पसंख्यक छात्र संघ के मुख्य सलाहकार अजीजुर रहमान कहते है, "केंद्र और राज्य सरकार कोरोना वायरस के ख़िलाफ़ जो व्यवस्था कर रही है उससे हम बहुत खुश है. लेकिन इस तरह के कुछ लोग ऐसी सांप्रदायिक बयानबाजी कर एक तरह से सरकार के प्रयासों को ही नुकसान पहुंचा रहें है.सरकार को यह देखना होगा कि ऐसे लोग फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल में बैठकर कितने निर्दोषों के साथ अन्याय कर रहें है."
जिस लेटर को लेकर यह विवाद हुआ है उस पर दस्तखत करने वाले बाक्सा फॉरेनर्स ट्रिब्यूनल के मेंबर कमलेश कुमार गुप्ता ने बीबीसी से कहा,"हमने उस लेटर को वापस ले लिया है. वह पत्र मंत्री जी तक पहुंचा ही नहीं है.उस लेटर पर मेरे सिग्नेचर है लेकिन मैंने उस पत्र को वापस ले लिया है. मैं कोई सांप्रदायिक व्यक्ति नहीं हूं और न ही बनना चाहता हूं. मैं एक सामान्य भारतीय नागरिक हूं. अगर फिर भी किसी को उस लेटर के लिए ठेस पहुंची है तो मैं क्षमा मांगता हूं. इससे ज्यादा मुझे कुछ नहीं कहना."
क़ानून के जानकारों का कहना है कि यह न्यायिक अधिकारी के आदर्श आचार संहिता का उल्लंघन है. इस संदर्भ में गुवाहाटी उच्च न्यायालय निश्चित रूप से मामले की संज्ञान लेगा और गलत एफटी मेंबर और कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई भी हो सकती है.
असम में अब तक कोविड 19 से संक्रमित कुल 29 मामले सामने आए है जिनमें से 28 मरीजों का संपर्क नई दिल्ली निजामुद्दीन के तब्लीग़ी जमात से रहा है. इस बीच एक मरीज की मौत हो गई है.
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