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कोरोना का वो मरीज़ जो ख़ुद अस्पताल भर्ती होने गया
- Author, रविशंकर लिंगुटला
- पदनाम, बीबीसी तेलुगू सेवा
ब्रिटेन से भारत लौटे अखिल एनामशेट्टी का हैदराबाद के गांधी हॉस्पिटल के आइसोलेशन वार्ड में पिछले 12 दिन से इलाज कर चल रहा है.
पेशे से वकील अखिल कोरोना पॉजिटिव पाए गए थे.
ब्रिटेन से भारत आने तक अखिल ने तमाम सावधानियां बरतीं और एक ज़िम्मेदार नागरिक होने का परिचय दिया.
ब्रिटेन से भारत लौटने के बाद वो स्वेच्छा से अपना टेस्ट कराने अस्पताल चले गए थे, हालांकि उनमें कोरोना के कोई लक्षण नहीं दिख रहे थे.
मार्च में भारत आने के बाद वह सावधानी बरतते हुए अपने परिवार और दोस्तों से भी नहीं मिले.
अखिल यूनिवर्सिटी ऑफ एडिनबरा में ह्यूमन राइट्स में पोस्ट ग्रेजुएशन कर रहे हैं.
अखिल ने अपना अनुभव बीबीसी के साथ साझा किया है. कैसे वह भारत आए. क्यों उन्होंने टेस्ट कराने की सोची और आइसोलेशन वार्ड में कैसा माहौल है. मेडिकल सर्विसेज की क्वालिटी कैसी है.
कोरोना के ख़िलाफ़ जंग जैसे कई सवालों पर उन्होंने बात की है. आगे पढ़िए अखिल की दास्तां उन्हीं के शब्दों में...
ब्रिटेन सरकार ने शुरुआत में नहीं उठाए क़दम
कोरोना वायरस से निपटने के लिए ब्रिटेन ने शुरुआत में हर्ड इम्युनिटी का तरीक़ा अपनाने का फैसला किया.
इसके चलते उन्होंने ज़्यादा से ज़्यादा लोगों में संक्रमण फैलने दिया ताकि लोगों में ख़ुद ही इस वायरस के ख़िलाफ़ नैचुरल इम्युनिटी पैदा हो जाए.
सरकार ने क्लबों, स्टेडियम, विश्वविद्यालयों और लोगों के बड़े पैमाने पर इकट्ठा होने वाली जगहों को बंद नहीं किया.
सरकार के इस अप्रोच की आलोचना हुई. साथ ही हालात जब ख़राब होने लगे तो सरकार ने लॉकडाउन करने की दिशा में क़दम उठाए.
हम यह सोच रहे थे कि क्या यूके में रहा जाए या वापस भारत लौट जाया जाए.
इसी बीच भारत सरकार ने 16 मार्च को ऐलान कर दिया कि वह 18 मार्च से यूके और यूरोप से आने वाली फ्लाइट्स को भारत में लैंड नहीं होने देगी.
इससे हम सभी में बेचैनी पैदा हो गई.
हड़बड़ाहट में बुक की भारत आने की फ्लाइट
हमने तत्काल टिकट बुक किए. अगले दिन यानी 17 मार्च की मेरी टिकट थी जो लंदन के हीथ्रो एयरपोर्ट से मुंबई होते हुए हैदराबाद आनी थी.
मुझे यह नहीं पता था कि मैं संक्रमण का शिकार हो चुका हूं या नहीं. लेकिन, मैंने एहतियात बरतनी शुरू कर दी थी.
टिकट बुक करते वक्त ही मैंने अपने होमटाउन तेलंगाना के वारंगल में अपने पैरेंट्स को बता दिया था कि मैं टेस्ट होने से पहले उनसे नहीं मिलूंगा.
मैंने उन्हें कह दिया था कि वे मुझे लेने हैदराबाद न आएं. साथ ही मुंबई में मैंने अपने दोस्तों को कह दिया कि वे मुझसे मिलने एयरपोर्ट न आएं.
मैंने कोविड-19 के बारे में काफ़ी पढ़ लिया था और मैं हर ज़रूरी सावधानी बरत रहा था.
घर नहीं बल्कि होटल चुना
मैं 19 मार्च को तड़के हैदराबाद पहुंच गया. मेरे गले में हल्की खराश थी और मैं हैदराबाद के राजीव गांधी इंटरनेशनल एयरपोर्ट (आरजीआईए) पर मौजूद हेल्थ डेस्क पर पहुंच गया.
मैंने उन्हें अपनी ट्रैवल हिस्ट्री बताई और अपने लक्षणों के बारे में जानकारी दी.
उन्होंने मुझे बताया मेरा क्वारंटीन में जाना ज़रूरी नहीं है और मुझे सुबह गांधी हॉस्पिटल जाना चाहिए.
अगली सुबह हॉस्पिटल जाने तक मैं होटल में रुका और वहां मैंने सभी तरह की सतर्कता बरती. यहां तक कि मैंने रूम बॉय को भी अपने कमरे में नहीं आने दिया.
टेस्ट रिपोर्ट से हुई हैरत
मैंने टेस्ट कराया और अगले दिन उसकी रिपोर्ट आई. मैं यह देखकर हैरत में था कि मेरी रिपोर्ट पॉजिटिव थी.
मैं और मेरे पेरेंट्स पढ़े-लिखे हैं और हमें कोरोना के बारे में पहले से ही कुछ जानकारी थी. इस वजह से हम डरे नहीं.
हालांकि, मुझे बाक़ी कोई तकलीफ़ नहीं हो रही थी, लेकिन मुझे कुछ दफ़ा सांस लेने में दिक्कत हुई.
हॉस्पिटल का माहौल
गांधी हॉस्पिटल के आइसोलेशन वार्ड में माहौल आपको डराएगा नहीं. यहां काफ़ी सफ़ाई है. मेरे वार्ड में पर्याप्त रोशनी और वेंटिलेशन है. इससे मैं एक्टिव रह पाता हूं.
हर दिन बेडशीट और हज़मट सूट बदला जा रहा है. हमें पैकेज्ड वॉटर मिल रहा है और पैक्ड फूड ही ब्रेकफास्ट, लंच और डिनर में मिलता है.
डॉक्टर ब्रेकफास्ट के बाद हमें देखने आते हैं.
असली हीरो
जिन लोगों से अस्पताल में मैं रोज़ मिलता हूं उनसे मेरी दोस्ती हो गई है.
मैं यह जानकर दुखी हुआ कि जितना भी स्टाफ यहां रखा गया है वह सब आउटसोर्स कर रखा गया है और उन्हें केवल आठ हज़ार रुपए मिलते हैं. यही लोग आज के असली हीरो हैं.
खल रही है दोस्तों और परिवार की कमी
यह सच है कि मैं परिवार और दोस्तों को मिस कर रहा हूं. भारत में होते हुए भी अपने परिवार से न मिल पाना मुश्किल भरा है. लेकिन, हम कुछ कर नहीं सकते. मैं मोबाइल से उनके टच में रहता हूं.
सनसनी फैलाना सही नहीं
मुझे यह कहने में कोई संकोच नहीं है कि मीडिया इस मामले में कुछ ग़ैर-ज़िम्मेदार रही है. मीडिया तथ्यों और जागरूकता के मुक़ाबले सनसनी फैलाने में ज़्यादा लगी है.
सोशल मीडिया भी एक समस्या है. फ़ेक न्यूज़ और अफ़वाहें चल रही हैं. लोगों को केवल प्रामाणिक जरियों पर ही भरोसा करना चाहिए.
हॉस्पिटल में मुझे यह भी पता चला है कि कई मरीज़ पहले घर चले गए. परिवार के साथ कुछ वक्त बिताया और फिर टेस्टिंग के लिए अस्पताल आ गए. कुछ लोग तो बड़े जमावड़ों में भी शरीक हुए.
इस अप्रोच से समाज में पैनिक फैल गया है और अधिकारियों को लोगों को ढूंढ-ढूंढकर टेस्ट करना पड़ रहा है. बेहतर जागरूकता और ज़िम्मेदारी भरे व्यवहार से इन चीज़ों से बचा जा सकता है.
थर्मल स्क्रीनिंग पर्याप्त नहीं
एयरपोर्ट पर होने वाली थर्मल स्क्रीनिंग पर्याप्त नहीं है. कई लोगों को लगता है कि स्क्रीनिंग से वायरस का पता चल जाता है. ऐसा नहीं है.
केवल टेस्ट से ही इसका पता चलता है. कई बार मरीजों में लक्षण दिखाई नहीं देते. मेरे मामले में भी ऐसा ही हुआ.
सरकार को यह सुनिश्चित करना चाहिए था कि बाहर से आने वाले हर शख्स की पूरी तरह से टेस्टिंग हो. उन्हें देश में एंट्री केवल तभी मिलनी चाहिए जबकि वे वायरस से संक्रमित न हों.
इससे आसानी से चेन को तोड़ा जा सकता है. लोगों को भी ज़िम्मेदारी भरा व्यवहार करना चाहिए.
शर्मिंदा न हों
अगर आपको संक्रमण हो जाता है तो इसमें शर्मिंदा होने की कोई बात नहीं है.
अगर आपको संक्रमण के लक्षण दिखाई देते हैं तो सबसे बढ़िया चीज़ यह है कि आप जाएं टेस्ट कराएं और जल्द से जल्द एडमिट हो जाएं.
इस तरह से आप कई ज़िंदगियां बचा सकते हैं. यह आपके परिवार, पड़ोस, समाज और मानवता के लिए अच्छा है.
साथ ही लोगों को भी कोविड-19 के मरीज़ों पर लांछन नहीं लगाना चाहिए. लोगों को इन मरीज़ों के साथ भेदभाव नहीं करना चाहिए.
डिस्चार्ज
पेशेंट रिकवर हो चुका है इसका ऐलान करने से पहले 48 घंटों में दो बार उसका टेस्ट रिजल्ट नेगेटिव आना ज़रूरी है. यह चीज़ हमारे हाथ में नहीं है.
तेलंगाना में अभी तक केवल एक मरीज़ रिकवर हुआ है. मुझे लगता है कि मैं भी जल्द ही सामान्य हो जाऊंगा.
घर पर रहिए. सुरक्षित रहिए. हम इससे जल्द ही बाहर आ जाएंगे.
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