राजस्थान की 97 वर्षीय महिला सरपंच जो कभी स्कूल भी नहीं गईं

    • Author, मोहर सिंह मीणा
    • पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए, राजस्थान के पुरानाबास गांव से

राजस्थान के सीकर ज़िले में नीमकाथाना ब्लॉक की पुरानाबास ग्राम पंचायत इन दिनों ख़ासी चर्चा में है. यहां 97 वर्षीय विद्या देवी पहली बार सरपंच चुनी गई हैं. विद्या देवी स्कूल तक नहीं गईं. लेकिन महिला शिक्षा को बढ़ावा देने की बात करती हैं.

26 जनवरी को सरपंच पद की शपथ लेते ही विद्या देवी अब तक सम्पन्न हुए राजस्थान के तीन चरण के पंचायती राज चुनाव में सबसे उम्रदराज़ सरपंच बन गईं.

चेहरे पर झुर्रियां, सिर के आधे बाल झड़े हुए, अपनी कमज़ोर नज़रों के लिए चश्मा लगाए हल्का सा झुककर चलती हुई विद्या देवी बोलीं, "अटल सेवा केंद्र आधा मील तो होगा ही. इतनी दूर जा कर वापस आती हूं. इतनी हिम्मत कि नीमकाथाना भी जा सकती हूं. म्हारी काया निरोगी है. वो मेरा नरेंदर... क्या करें, भगवान की मर्जी है. बस आंखों पर असर पड़ गया अब तो."

इतना कहते ही कुछ देर ख़ामोश हो गईं 97 साल की उम्रदराज सरपंच विद्या देवी. चुनाव से चार दिन पहले ही उनके बेटे नरेंदर का निधन हो गया था.

मलेशिया में महातिर मोहम्मद के नाम 92 की उम्र में सबसे उम्रदराज़ प्रधानमंत्री बनने का रिकॉर्ड है. हालांकि अब 94 की उम्र में इसी महीने इस्तीफ़ा दे दिया है. अपनी उम्र को लेकर हो हमेशा चर्चा में रहे लेकिन विद्या देवी तो उनसे भी कहीं अधिक उम्र में सरपंच बनीं.

विद्या देवी ने इस वर्ष पहली फ़रवरी को अपना 98वां जन्मदिन मनाया है.

उम्र के इस पड़ाव तक का सफ़र तय करना जहां कई लोगों को नसीब नहीं होता वहीं विद्या देवी इस उम्र में देश की लोकतांत्रिक प्रणाली में जन प्रतिनिधि बनने का गौरव हासिल किया है. पुरानाबास के गांववालों ने उन्हें अपना सरपंच चुनकर उनसे विकास की उम्मीद जताई है.

शपथ लेने के बाद ही विद्या देवी लोगों से किए अपने वादों को पूरा करने में जुट गईं. गांव में सफ़ाई अभियान चलाया, जिसके गवाही यहां की सड़कें देती हैं.

वे कहती हैं, "गांव के लोगों ने मुझसे कहा, आपको कचड़ा ही मिला उठाने के लिए. मैं उन्हें कहती कि मोदी भी तो उठाते हैं कचरा. पिछले दो सरपंचों के कार्यकाल को याद कर वे कहती हैं कि 10 साल में पहली दफ़ा तो वो आदमी सरपंच बना, फिर उनकी पत्नी सरपंच बन गई. लेकिन गांव का कचड़ा किसी ने नहीं उठाया."

विद्या देवी झुन्झुनू के जागीरदार परिवार में जन्मीं और खेती किसानी के माहौल में बड़ी हुईं. 1923 के दौर में बालिका शिक्षा को महत्व नहीं दिए जाने के चलते विद्या देवी ख़ुद तो कभी स्कूल नहीं गईं लेकिन गांव में बच्चों को पढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास का वादा करती हैं. वे कहतीं हैं, "तब लड़कियों को कोई नहीं पढ़ाते थे लेकिन अब तो बच्चे ख़ूब पढ़ रहे हैं."

खुद कभी स्कूल नहीं जाने वाली विद्या देवी के बारे में ग्रामीण कहते हैं कि इस उम्र में भी वो ग्रामीण महिलाओं से शिक्षा के बारे में बातें करती हैं.

इस उम्र में थकान नहीं होती क्या? इस सवाल पर बड़े उत्साह से वो कहती हैं, "कोई बीमारी नहीं है, निरोगी काया है. अब तो नरेंदर के जाने के बाद आंखों पर असर पड़ गया है."

वे भारी मन से अपने बेटे को नरेंदर को याद करती हैं और उनकी आंखें डबडबा जाती हैं.

17 जनवरी 2020 को सरपंच पद के लिए पुरानाबास ग्राम पंचायत में मतदान होना था. 13 जनवरी को जयपुर में उनके बेटे नरेंदर का निधन हो गया. तब गांव में प्रचार कर रहीं विद्या देवी परिवार के साथ जयपुर पहुंच गईं.

उनके बेटे अश्विनी कुमार कृष्णियां कहते हैं, "परिवार के जयपुर जाते ही गांव में सरपंच पद उम्मीदवार विद्या देवी के आईसीयू में भर्ती होने की अफ़वाह फैल गई. लेकिन लोगों ने उनपर भरोसा जताया और वो 270 वोटों से जीत हासिल करने में कामयाब रहीं."

ससुराल में सत्ता और सेना का अनुभव

शेखावाटी क्षेत्र के झुन्झुनू ज़िले के किसान परिवार से ब्याह कर वो सीकर ज़िले की पुरानाबास गांव में आईं. यहां उन्होंने अपने सुसर सुबेदार सेडूराम की सरपंची का अनुभव देखा. विद्या देवी के बेटे अश्विनी कुमार कहते हैं कि दादाजी उस समय आठ गांवों के सरपंच हुआ करते थे. ग्रामीणों की हर समस्या के लिए वो हमेशा तैयार रहते थे.

नीमकाथाना ब्लॉक विकास अधिकारी राजूराम का कहना है, इससे पहले उतनी उम्र की महिला को सरपंच बनते नहीं देखा. इस क्षेत्र में ही नहीं, बल्कि मैंने अपने कार्यकाल में भी इस उम्र की महिला को सरंपच बनते नहीं देखा.

सामान्य हो रही बातों में एकाएक विद्या देवी जोशीली आवाज में कहती हैं, मेरे ससुर ने जो नाम कमाया, वही नाम मैं भी कमाना चाहती हूं.

राजनीति का अनुभव और आत्मविश्वास उनकी आंखों में साफ़ झलक रहा था. वे फिर कहती हैं कि और मेरा आदमी मेजर साहब भी 55 साल पहले निर्विरोध सरपंच बने थे. उन्होंने गांव के बंद रास्ते खुलवाए.

पुरानाबास गांव के ही रहने वाले 63 साल के मोहर सिंह नीमकाथाना में प्राइवेट नौकरी करते हैं. वह कहते हैं कि सरपंच बनते ही विद्या देवी ने ख़ुद के पैसे से गांव में सफ़ाई कराई.

मोहर सिंह का कहना है कि गांव में पीने के पानी में फ्लोराइड ज़्यादा है. विद्या देवी ने पानी के लिए भी व्यवस्था करने के लिए कहा है. हमें तो उम्मीद है पानी की सुविधा वह करा देंगी.

ज़िन्दगी में कभी सरपंच बनने के बारे में सोचा था, हंसकर बोलीं, मैंने तो कभी नहीं सोचा लेकिन मेरा यह पोता है न मोंटू, इसने कहा दादी खड़ी हो जाओ और गांववालों ने जिता दिया.

फिर हाथों को फैला कर धीमी आवाज़ में बोलीं, "मैं तो यही चाहती हूं कि सब गांववाला का भला चाहती हूं.

विद्या देवी के पति सेना में मेजर थे. उस दौरान विद्या देवी का गढ़वाल, महू, दिल्ली सहित देश में कई जगह रहना हुआ. वे हंसते हुए बोलीं, "जब मेजर साहब दिल्ली में थे, तब राष्ट्रपति भवन जाना हुआ. सभी अफसरों को बुलाया गया था तो वहां पहली बार गई थी."

50 साल पहले पुरानाबास गांव से निकल कर 7 किलोमीटर दूर नीमकाथाना जा बसे कैलाश मीना एक सामाजिक कार्यकर्ता हैं.

वो कहते हैं कि विद्या देवी के परिवार में राजनीति और सेना का माहौल रहा है. 50 साल पहले इस गांव में मृत्युभोज के ख़िलाफ़ आवाज़ उठी. नई पुरानी पीढ़ी के सामंजस्य के लिए पुराने लोग नए विचारों से सोचते हैं.

आत्मनिर्भर

विद्या देवी सरपंच का चुनाव जीतने के बाद का एक वाक्या सुनाती हैं. वे मुस्कुराते हुए कहती हैं, "जब सरपंच बनी तो पुलिस वाले जीप में बिठाकर घर छोड़ने ला रहे थे. तब वो बोले आओ माताजी जीप में बिठा दें. तो मैं हंसकर बोलीं मुझे क्यों बिठाओगे, मैं ख़ुद ही बैठ जाउंगी."

पहले विद्या देवी के दिनचर्या में सुबह चार बजे उठना होता था. वे बच्चे को गोद में लेकर चक्की पीसा करतीं. पानी का कुआं दूर था, वहां से पानी लाया करती थीं. दो मटके सिर पे रख सीढ़ियां चढ़कर आना पड़ता था.

पुराने दिनों को याद करते हुए सिर उठाकर वे कहती हैं, पहले बहुत मेहनत से काम करती थी. अपने हाथों पर हाथ मारते हुए कहती हैं, अब तो थोड़ी कमज़ोर हो गई हूं.

जेएनयू दिल्ली के एसोसिएट प्रोफेसर गंगासहाय मीणा कहते हैं, "97 साल की उम्रदराज़ महिला का चुना जाना राजनीति में अधिकतम आयु सीमा को तो गौण कर देता है. वे कहते हैं कि वो जितना गांव को समझती होंगी, शायद ही कोई और उतना समझता होगा. यह गर्व की बात है कि इस उम्र के किसी व्यक्ति को ग्रामीणों ने चुना, वो भी महिला. मुझे पूरी उम्मीद है कि पंचायत के विकास में अपने अनुभव का लाभ देने में वो कामयाब होंगी."

पुरानाबास ग्राम पंचायत के बांकली गांव के किसान मूलचंद कहते हैं, "97 साल की उम्र में इतना सक्रिय किसी को नहीं देखा. विद्या देवी हमेशा बुजुर्गों की पेंशन, गांव की सफ़ाई, बच्चों की पढ़ाई के लिए काम करने की बात करती हैं."

मूलचंद ख़ुद 70 साल के हैं और 2000 से 2005 तक यहां उपसरपंच रह चुके हैं. वे कहते हैं, "इनके विचार अच्छे हैं. काम करेंगी."

वहीं विद्या देवी कहती हैं, "ऐसा काम करना है कि मरने के बाद भी लोग याद करें."

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