पुलवामा कांड: जवानों के परिजन आज भी हादसे की जाँच की आस में बैठे हैं

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- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
पिछले साल की शुरुआत में, जब देश में आम चुनावों की दुंदुभि बजने ही वाली थी, जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में सीआरपीएफ़ के एक क़ाफ़िले पर हुए चरमपंथी हमले ने देश भर को हिलाकर रख दिया.
14 फ़रवरी को 2019 को दिन में हुए इस हमले में चालीस जवानों की मौत हो गई जिनमें से 12 जवान उत्तर प्रदेश से थे.
सरकार ने मारे गए जवानों के परिजनों के प्रति संवेदना के साथ-साथ दरियादिली भी दिखाई. परिवार वालों को आर्थिक मदद के अलावा नौकरी देने की भी घोषणा हुई, स्मारक बनाने और सड़क का नाम जवानों के नाम पर करने की भी बातें हुईं लेकिन ये तमाम घोषणाएं आज भी ज़मीन पर नहीं उतर पाई हैं.
जवानों के परिजनों की यह शिकायत तो है ही कि सरकारी घोषणाएं अब तक पूरी न हो सकीं, लेकिन उन्हें सबसे ज़्यादा तकलीफ़ इस बात की है कि लगातार मांग करते रहने के बावजूद, इस घटना की कोई जाँच नहीं हुई.
उन्नाव में कोतवाली क्षेत्र के लोकनगर मोहल्ले के रहने वाले अजीत कुमार आज़ाद सीआरपीएफ़ की बटालियन 115 में तैनात थे. 14 फ़रवरी को वो भी उस क़ाफ़िले में शामिल थे, जिस पर चरमपंथी हमला हुआ था. अजीत कुमार उस हमले में मारे गए थे.
एक दिन पहले ही उनकी अपने परिवार वालों से बात हुई थी और तब उन्होंने बताया था कि बटालियन सुरक्षित जगह भेजी जा रही है.

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अजीत कुमार की पत्नी मीना गौतम को राजस्व विभाग में नौकरी मिल गई और सरकार की ओर से घोषित पचीस लाख रुपये भी मिल गए लेकिन न तो स्मारक बना, न सड़क का नामकरण हुआ और न ही उनकी सबसे अहम मांग मानी गई.
अजीत कुमार के भाई रंजीत आज़ाद कहते हैं, "तमाम घोषणाएं अधूरी हैं. उसके बाद कोई हाल लेने तक नहीं आया. हमें इन सबसे कोई शिकायत नहीं है लेकिन हमें कष्ट सिर्फ़ इस बात का है कि जिस हमले में देश के चालीस जवान मार दिए गए हों, सरकार ने ये जानने की भी कोशिश नहीं की कि ये हमला कैसे हुआ, किसने किया और क्यों किया?"

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रंजीत कहते हैं कि कुछ दिनों तक वो लोग दूसरे जवानों के परिजनों के साथ मिलकर अपनी इस मांग को उठाते रहे लेकिन जब कोई कार्रवाई नहीं हुई और कहीं सुनवाई नहीं हुई तो शांत हो गए.
कन्नौज के रहने वाले प्रदीप यादव भी इस हमले में मारे गए थे. उनकी पत्नी नीरजा की भी शिकायत है कि सरकार ने हमले की जाँच क्यों नहीं कराई?
नीरजा कहती हैं, "नौकरी तो मिल गई लेकिन छोटे बच्चों को छोड़कर रोज़ डेढ़ सौ किमी जाना पड़ता है. स्मारक बनाने की घोषणा हुई थी लेकिन अब तक कुछ नहीं बना. सरकार ने पैसे और नौकरी देकर अपना पीछा छुड़ा लिया. अब किसी को भी हमारे बारे में जानने की फ़ुरसत नहीं."

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प्रयागराज ज़िले में मेजा के रहने वाले महेश यादव भी इस हमले में मारे गए थे.
उनके पिता राजकुमार बेहद निराशा के साथ कहते हैं, "शहीद के नाम पर राजनीति तो की गई लेकिन परिवार के लिए जो भी वादे किए गए, वे एक साल बाद भी पूरे नहीं हो पाए. बहू को नौकरी भी नहीं मिली और न ही छोटे बेटे को नौकरी मिल पाई."
ज़िले के अधिकारियों से जब इस बारे में बात की गई तो उन्हें इसकी कोई जानकारी नहीं थी. लेकिन उन्नाव के ज़िलाधिकारी देवेंद्र पांडेय कहते हैं कि सरकारी वादे पूरे कर दिए गए हैं.
उनके मुताबिक़, "सरकार की ओर से घोषित आर्थिक मदद और नौकरी की व्यवस्था तत्काल करा दी गई थी. इसके अलावा भी जो मदद हो सकती थी, वो की गई थी. लेकिन यदि कुछ कमी रह गई होगी तो ज़रूर पूरी की जाएगी."

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उन्नाव में अजीत कुमार आज़ाद के परिजन आज भी इस बात को मानने को तैयार नहीं हैं कि पुलवामा की घटना कोई चरमपंथी हमला था.
रंजीत कहते हैं, "इतनी सुरक्षित जगह पर इतना विस्फोटक लेकर कोई चला जा रहा है, ये किसकी ख़ामी है? ख़ुफ़िया विभाग की ख़ामी है, प्रशासन की है, सरकार की है, जिसकी भी हो ये जानने का हक़ तो हमें भी है और देश को भी है. आख़िर क्यों नहीं ये जाँच सीबीआई या किसी अन्य एजेंसी को सौंपी जा रही है? हम लोग मांग करते-करते थक गए और अब तो नाउम्मीद भी हो चुके हैं."
सीआरपीएफ़ की 115 बटालियन के सिपाही अजीत कुमार अपने पाँच भाइयों में सबसे बड़े थे. उनके एक और भाई सेना में हैं जबकि एक भाई पुलिस में हैं.
अजीत की पत्नी मीना गौतम को राज्य सरकार ने क्लर्क की नौकरी दे दी है लेकिन मीना गौतम को अभी भी सरकार से शिकायत है.
वो कहती हैं, "हमारा तो सब कुछ छिन गया है. मुआवज़े से हम क्या कर लेंगे और कितना कर लेंगे? लेकिन ये हमारी समस्या है. हम तो चाहते हैं कि पुलवामा में जो ग़लती हुई है, वो लोगों के सामने आए ताकि दोबारा वो ग़लती न हो. फिर से बिना किसी वजह के जवान न मारे जाएं. हमारे पति दुश्मनों से लड़ते हुए मारे जाते तो हमें कितना गर्व होता?"

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पुलवामा हमले की जाँच की मांग सिर्फ़ अजीत कुमार का ही परिवार नहीं कर रहा है बल्कि इस हमले में मारे गए दूसरे जवानों के परिवार भी जाँच की मांग करते रहे हैं.
शामली ज़िले के प्रदीप कुमार और मैनपुरी के राम वकील भी इस हमले में मारे गए थे और उनके परिवार वाले भी घटना की जाँच चाहते हैं.
राम वकील की पत्नी गीता देवी फ़ोन पर बातचीत में कहती हैं, "सरकार इस हमले के सबूत सार्वजनिक करे और पुलवामा की घटना की भी जाँच हो कि कड़ी सुरक्षा के बावजूद ये कैसे हो गया? हमें आश्चर्य है कि अब तक जाँच के मामले में सरकार चुप क्यों है?"

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