मालेगांव के मुसलमान बर्थ सर्टिफ़िकेट की लाइनों में क्यों लगने लगे

    • Author, मयूरेश कोण्णूर
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

नाशिक ज़िले में हम मालेगांव नगर निगम के सामने से गुज़र रही एक सड़क पर खड़े हैं. यह जगह एक पुराने क़िले के पास है. रोज़मर्रा का शोर-शराबा अभी अपने शबाब पर नहीं है, लेकिन जन्म-मृत्यु पंजीकरण का पर्चा बांटने वाली उस खिड़की के बाहर एक लंबी कतार लग चुकी है.

कुछ लोगों की भीड़ बगल वाली गली में भी है. लोग छोटे-छोटे समूहों में एजेंटों के पास खड़े हैं. ये एजेंट उन्हें फ़ॉर्म भरने में मदद कर रहे हैं. जो लोग हाथों में काग़ज़ लिए खड़े हैं, उनके चेहरे पर तनाव साफ़ नज़र आ रहा है.

पता चलता है कि यहां जितने लोग खड़े हैं उनमें से ज़्यादातर मुसलमान हैं. मालेगांव मुस्लिम बहुल आबादी वाला इलाक़ा है. शहर की लगभग आधी फ़ीसदी आबादी मुस्लिम है. तो ऐसे में बहुत आश्चर्य नहीं है कि क़तार में खड़े ज़्यादातर लोग मुसलमान ही हैं.

लेकिन चौंकाने और सोचने के लिए मजबूर करने वाली बात ये है कि ये लोग पिछले चार महीने से इसी तरह क़तारों में खड़े होते आ रहे हैं.

सितंबर महीने से लेकर अभी तक मालेगांव निगम को जन्म प्रमाण पत्र के क़रीब 50 हज़ार से ज़्यादा आवेदन प्राप्त हो चुके हैं. इसका एक बहुत बड़ा कारण ये है कि जिस वक़्त से सीएए और एनआरसी को लेकर बात और चर्चा शुरू हुई है, मुसलमान समुदाय चिंता में है.

नागरिकता संशोधन क़ानून 11 दिसंबर को लोकसभा में पास भी हो चुका है और 20 दिसंबर से यह पूरे देश में लागू भी हो चुका है. लेकिन इससे पहले कि यह बिल के रूप में सदन में जाता और क़ानून बनता, चर्चा शुरू हो चुकी थी.

विपक्षी दलों का कहना था कि ये क़ानून मुस्लिम विरोधी है. वहीं असम में एनआरसी को लेकर भड़की हिंसा ने भी माहौल को उकसाने का काम किया.

ऐसी स्थिति में सितंबर महीने से लेकर अभी तक मालेगांव निगम के बाहर हर रोज़, जन्म प्रमाण पत्र पाने के लिए ऐसी ही कतारें लगती आ रही हैं.

मालेगांव निगम के कमिश्नर का कहना है "अमूमन पिछले चार महीनों से हर रोज़ कॉर्पोरेशन के बाहर इसी तरह लंबी-लंबी कतारें लगती हैं. इस दौरान हमें 50 हज़ार से भी ज़्यादा आवेदन मिले हैं. आमतौर पर ऐसी स्थिति नहीं होती है लेकिन पिछले चार महीने से हम हर रोज़ यही हाल देख रहे हैं और इस बात में कोई दो राय ही नहीं है कि ये सब सीएए और एनआरसी की वजह से है."

क्या है डर

मुस्लिम समुदाय को डर है कि उन्हें हर सूरत में अपने काग़ज़ात, जन्म प्रमाण पत्र, स्थान प्रमाण पत्र तैयार रखने होंगे. वे अपने प्रमाण पत्र तो जुटा ही रहे हैं और साथ ही अपने बड़े-बुज़ुर्गों, पुरखों और बच्चों के भी प्रमाण पत्र जमा कर रहे हैं. जैसा कि स्कूल छोड़ने के काग़ज में जगह का नाम...वो हर छोटे से छोटा दस्तावेज़ जमा कर लेना चाहते हैं. वे जन्म प्रमाण पत्र पाने के लिए लगे हुए हैं.

पहले उन्हें निगम ऑफ़िस में आवेदन भरना होता है ताकि उन्हें पता चल सके कि उनका जन्म पंजीकृत है या नहीं. अगर उनका पंजीकरण नहीं है तो उन्हें कोर्ट में एफ़िडेविट जमा करना होगा. उन्हें अख़बार में घोषणा छपवानी होगी और यह सुनिश्चित करना होगा कि किसी को इस पर आपत्ति ना हो.

ये सारी प्रक्रिया पूरी करने के बाद उन्हें एक बार फिर जन्म प्रमाण पत्र के लिए आवेदन करना होगा. बहुत से लोग इन प्रक्रियाओं में बहुत पहले से लग गए हैं क्योंकि उन्हें डर है कि उनसे कभी भी दस्तावेज़ मांगे जा सकते हैं.

हम रेहानाबी मुनसब ख़ान से मिले, जो कतार में थीं. वो मालेगांव की गांधीनगर कॉलोनी में रहती हैं और मज़दूरी करती हैं. उन्होंने अपने और अपने ससुर के जन्म प्रमाण पत्र के लिए आवेदन किया है. सालों से उन्हें इन दस्तावेज़ की कभी भी ज़रूरत नहीं पड़ी तो आज उन्हें इसकी ज़रूरत क्यों आन पड़ी?

यह पूछने पर वो कहती हैं, " यह सारी जद्दोजहद एनआरसी के लिए है. लोग ऐसा ही बता रहे हैं. हमने लोगों से सुना है कि ऐसा करना है और यही सुनकर हम भी ये सबकुछ कर रहे हैं. हमें यहां नहीं आना होता और ना तो हमें कोर्ट ही जाना पड़ता अगर एनआरसी नहीं लाया जाता तो."

लेकिन सरकार तो कह रही है कि एनआरसी को लेकर बात ही नहीं हुई है और ना ही कोई बात ही अभी तक तय हुई है, तो ऐसे में आप इन काग़ज़ों को पाने के लिए इतनी मेहनत क्यों कर रही हैं?"

हमारे इस सवाल के जवाब में वो कहती हैं, "अगर सरकार यह कह रही है तो लोग इतने डरे हुए क्यों हैं? अगर कल एनआरसी को लाया गया तो? भले ही वो आज ये कह रहे हैं कि ऐसा कुछ नहीं हो रहा है लेकिन क्या होगा अगर वो इसे कल लागू कर देंगे? उस समय आप क्या कहेंगे?"

अनवर हुसैन यहां पिछले 15 सालों से काम कर रहे हैं. वो यहां लोगों के आवेदन पत्र भरने और सर्टिफ़िकेट देने का काम करते हैं.

वो कहते हैं, "लोग एनआरसी से डरे हुए हैं. लोग टीवी देख रहे हैं और व्हाट्सऐप पर भी उनके पास कुछ ना कुछ आ ही रहा है. वो टीवी पर देख ही रहे हैं कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृहमंत्री अमित शाह की बातों में समानता नहीं है. लोगों में भय का माहौल है और वो यही सब देख-देखकर डर जा रहे हैं और यहां भागे आ रहे हैं. मेरे इतने साल के अनुभव में मैंने इस तरह की भीड़ पहले कभी नहीं देखी."

लोगों में दुविधा

सीएए और एनआरसी को लेकर पूरे देश में जगह-जगह प्रदर्शन हो रहे हैं. कुछ प्रांतों में प्रदर्शनों ने बेहद हिंसक रूप भी ले लिया. केंद्र सरकार सीएए को लेकर लगातार अपने स्पष्टीकरण दे रही है कि इससे भारत के नागरिकों को डरने की कोई ज़रूरत नहीं है.

एक रैली में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि कैबिनेट ने एनआरसी को लेकर कोई चर्चा नहीं की है. लेकिन केंद्रीय गृहमंत्री अमित शाह ने संसद में बहस के दौरान कहा कि एनआरसी पूरे देश में लागू की जाएगी. ऐसे में लोगों के मन में दुविधा है.

कुछ लोगों ने अपने नाम सुधारने के लिए आवेदन किया है. उन्हें ऐसा लगता है कि उनका नाम कहीं कुछ और है और कहीं कुछ और. डर है कि कहीं इस वजह से उनका नाम एनआरसी से हटा ना दिया जाए.

शकील अहमद जानी बेग़ एक पूर्व कॉर्पोरेटर हैं. वो कहते हैं, "हम यहां पिछली कई पुश्तों से रह रहे हैं. लेकिन असम से जिस तरह की ख़बरें आईं उसके बाद से हम लोग तनाव में आ गए. हमने समाचारों में देखा और पढ़ा कि अगर नाम को लेकर ज़रा सी भी चूक है तो उन्हें एनआरसी से निकाल दिया जाएगा. लोग डरे हुए हैं कि कहीं उनके साथ ऐसा कुछ ना हो जाए. ऐसे में वो सबकुछ जांच लेना चाहते हैं."

कैसा इलाक़ा है मालेगांव

मालेगांव में हैंडलूम और टेक्सटाइल इंडस्ट्री की भरमार है. कई मुस्लिम परिवार ये काम यहां सालों से करते आ रहे हैं. बहुत से लोग और कामगर हैं जो यहां उत्तर से आकर बस गए हैं. वे अब बहुत परेशान हैं.

बहुत से लोग सामने आकर बात करने में डरते हैं. हालांकि, मालेगांव में सीएए और एनआरसी को लेकर बहुत बड़े प्रदर्शन तो नहीं हुए हैं लेकिन लोगों में डर है. बहुत से लोगों का कहना है कि साल 1969 में मालगांव में आई बाढ़ में उनका सबकुछ बह गया और उसी के साथ काग़ज़ात भी.

मालेगांव राजनीतिक परिदृश्य से हमेशा ही संवेदनशील इलाक़ा रहा है. यह दंगों और बम विस्फोट के लिए चर्चा में रहा था. लेकिन हाल के दिनों में भविष्य को लेकर उपजे डर और पूरी जानकारी ना होने से यहां के लोग परेशान हैं. जब तक यह दुविधा दूर नहीं होती, लगता नहीं कि कतारें छोटी होंगी.

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