तो क्या अब ख़त्म हो जाएगा अनलिमिटेड कॉल का दौर?

भारत में टेलीकॉम कंपनी

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भारत के टेलीकॉम बाज़ार में तीन-चार साल पहले तक लगभग 10 कंपनियां मौजूद थीं. इनके बीच अच्छी प्रतिद्वंद्विता थी जिसके चलते सस्ते टैरिफ़ प्लान ग्राहकों को मिलते थे, उन्हें कई आकर्षक ऑफ़र चुनने को मिल जाते थे.

लेकिन जब रिलायंस जैसे बड़ी कंपनी ने जियो को बाज़ार में उतारा तो उन्होंने बहुत आक्रामक तरीक़े से अपना प्रचार किया. उन्होंने बाकी सभी कंपनियों के मुक़ाबले अपने प्लान को सबसे ज़्यादा सस्ता रखा. लोग उनकी ओर आकर्षित होते चले गए और बाकी कंपनियों का साथ छूटता चला गया.

इन तीन चार साल में जियो के ग्राहकों की संख्या लगातार बढ़ती गई जबकि बाज़ार में मौजूद बाकी टेलीकॉम कंपनियां ग़ायब होती चली गईं और अब सिर्फ़ चार कंपनियां ही हमारे सामने रह गई हैं.

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इन चार में से भी एक कंपनी बीएसएनएल है, जिसका हाल किसी से छिपा नहीं है. वह बाज़ार में है भी या नहीं कुछ कहा नहीं जा सकता. तो मोटे तौर पर जियो के अलावा सिर्फ़ दो ही प्रमुख कंपनियां हैं, एयरटेल और वोडाफ़ोन. बाज़ार का यह हाल चिंताजनक है.

दूरसंचार उद्योग की स्थिति पर आशंकाओं को और बढ़ाते हुए भारत की सबसे बड़ी टेलीकॉम कंपनियों में शामिल वोडाफ़ोन-इंडिया को दूसरी तिमाही में रिकॉर्ड 74,000 करोड़ रुपये का घाटा हुआ है.

एक अरब से अधिक मोबाइल ग्राहकों के साथ भारत दुनिया के सबसे बड़े दूरसंचार बाज़ारों में से एक है. इसके बावजूद कंपनी को जो नुकसान हो रहा है वो वाकई चिंता का विषय है. ऐसे में कंपनियों ने कुछ क़दम उठाए हैं.

भारत में टेलीकॉम बाज़ार और भविष्य की संभावनाओं को समझने के लिए बीबीसी संवाददाता नवीन नेगी ने टेक्नोलॉजी विशेषज्ञ प्रशांतो रॉय से बात की-

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टैरिफ़ बढ़ाना क्यों ज़रूरी

एयरटेल और वोडाफ़ोन को अपने टैरिफ़ प्लान के रेट बढ़ाना बहुत ज़्यादा ज़रूरी हो गया था. जैसे हालात उनके सामने बने हुए हैं, उनके स्पैक्ट्रम के ख़र्चे लगातार बढ़ रहे हैं.

इस वजह से इन कंपनियों को हर तिमाही में नुकसान उठाना पड़ रहा है. अगर ये कंपनियां अपने टैरिफ़ प्लान में बदलाव किए बिना ही आगे बढ़ती जातीं तो इनका बाज़ार में बने रह पाना ही नामुमकिन सा हो जाता और तब सिर्फ़ जियो अकेला बाज़ार में रह जाता.

अगर इस तरह के हालात के बारे में सोचें तो इन टैरिफ़ प्लान में हुए बदलाव को अच्छा ही माना जाना चाहिए. क्योंकि बाज़ार में प्रतिस्पर्धा लगातार कम होती जा रही है. ऐसे में इन कंपनियों को मिलकर ही फ़ैसला करना था.

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जियो के सामने क्यों नहीं टिकीं बाकी कंपनियां?

जियो के पीछे एक बहुत बड़ी कंपनी का हाथ था. उसके पास पैसे की कोई कमी नहीं थी. यही वजह है कि उसने ग्राहकों को अपनी तरफ़ खींचने के लिए लुभावने ऑफ़र उपलब्ध करवाए.

भारत में टेलीकॉम का व्यापार बहुत महंगा माना जाता है. इसमें स्पैक्ट्रम का ख़र्च, स्पैक्ट्रम को इस्तेमाल करने का अलग ख़र्च, नेटवर्क स्थापित करने का ख़र्च शामिल होता है.

इससे भी बड़ी बात यह है कि भारत में प्रति यूज़र जो औसत आय है वह बहुत कम है. इसका मतलब है कि भारत में लोग मोबाइल पर बहुत कम ख़र्च करना चाहते हैं.

भारत में एक आम आदमी का औसतन महीने का मोबाइल बिल 100-150 रुपए तक आता है. यह दुनिया में सबसे कम ख़र्च है. इतने कम ख़र्च में किसी तरह की टेलीकॉम कंपनी का चलना बहुत ही मुश्किल है.

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क्या भारतीय बाज़ार को नहीं समझ पाई बाकी कंपनियां?

एयरटेल और वोडाफ़ोन जैसी कंपनियां भी भारतीय बाज़ार में बहुत सालों से मौजूद हैं. इसलिए यह नहीं कहा जा सकता कि उन्हें भारतीय बाज़ार की समझ नहीं थी.

लेकिन यह कहना होगा कि जियो जैसे बड़े प्रतिद्वंद्वी के आने से इन पर बहुत ज़्यादा असर पड़ गया. इन कंपनियों को बिलकुल अंदाज़ा नहीं था कि जियो की तरफ़ इस तरह से लोग चले जाएंगे.

साथ ही जियो बहुत ही नई तकनीक के साथ बाज़ार में उतरा था. बाकी कंपनियां जहां 2जी और 3जी में चल रही थीं वहीं जियो सीधे 4जी के साथ बाज़ार में उतरी.

इस वजह से इस नई तकनीक ने पुरानी कंपनियों को पछाड़ दिया.

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क्या अनलिमिटेड का दौर ख़त्म हो जाएगा?

कंपनियों का मुख्य मुद्दा यह है कि वो ग्राहकों का औसत महीने का बिल बढ़ा सकें. इसके लिए वे वॉयस कॉल की दरों में वृद्धि कर रही हैं.

यही वजह है कि अनलिमिटेड कॉलिंग के घंटों में भी कुछ लिमिट कर दी गई है. साथ ही डेटा प्लान में भी बदलाव किया गया है.

जैसे जियो ने दूसरे नेटवर्क पर कॉलिंग के लिए पैसे चार्ज करने शुरू किए लेकिन वो साथ ही इसके लिए आपको डेटा भी दे रही है. बाकी कंपनियों को भी इस तरह के प्लान पर काम करना होगा.

कंपनियों का मक़सद अनलिमिटेड दौर को ख़त्म करना नहीं है वो बस औसत बिल को 100-150 रुपए से बढ़ाकर 200-250 रुपए तक करना चाहती हैं.

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क्या पूरे बाज़ार को एक कंपनी चला रही है

बाज़ार का जो फ़िलहाल हाल है उसमें यह कह सकते हैं कि एक ही कंपनी सबसे ज़्यादा चल रही है. बाकी जो दो कंपनियां हैं उसमें वोडाफ़ोन का हाल भी ज़्यादा अच्छा नहीं है.

ऐसे में बस जियो ही है जो बाज़ार के हिसाब से ख़ुद को आगे ले जा रही है. साथ ही इस कंपनी ने सरकार की नीतियों के अनुसार भी ख़ुद को ढाला है. यह बात भी इनके पक्ष में गई है.

अभी जिस तरह का बाज़ार है, सरकार है और उनकी नीतियां हैं, यह सब देखते हुए लगता है कि सब कुछ जियो के पक्ष में ही जा रहा है.

अब सरकार को देखना होगा कि इन हालातों को बहुत ज़्यादा बिगड़ने से पहले कैसे सुधारा जाए. ट्राई और डीओटी को इसके लिए पहल करनी होगी.

सरकार को निश्चित करना होगा कि बाज़ार में एक ही कंपनी का राज नहीं हो जाए क्योंकि तब हालात बेहद ख़राब हो जाएंगे. शायद इसके लिए कॉम्पिटीशन कमिशन ऑफ़ इंडिया को भी बीच में आना पड़ सकता है.

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महंगे प्लान से कैसे बचे ग्राहक?

पूरी दुनिया से तुलना की जाए तो भारत में वैसे भी लोग सबसे सस्ते टैरिफ़ का इस्तेमाल कर रहे हैं.

फिर भी जो नए टैरिफ़ हैं उनमें अपने पैसे बचाने के लिए लोगों को अपने डेटा के इस्तेमाल को संभलकर ख़र्च करना होगा.

लोग सबसे ज़्यादा ख़र्च मोबाइल डेटा पर करते हैं. इसलिए लोगों को अब मुफ़्त वाई-फ़ाई की तरफ़ बढ़ना चाहिए.

शायद आने वाले वक़्त में टेलीकॉम कंपनियां भी इस तरफ़ बढ़ेंगी और वो लोगों को मुफ़्त वाई-फ़ाई देना शुरू कर देंगी.

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