जेएनयू: ग़रीब छात्रों के बड़े सपनों का किफ़ायती टिकट

जेएनयू के छात्र
    • Author, विनीत खरे
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
  • 21 साल के एन. किशोर कुमार बचपन से 90 प्रतिशत दृष्टिहीन हैं और उनके पिता भिलाई में 'वर्कर' हैं.
  • मुरैना के गोपाल कृष्ण दृष्टिहीन हैं और उनके पिता रिटायर्ड सिक्योरिटी गार्ड हैं.
  • बिहार के सासाराम की 21 साल की ज्योति कुमारी के पिता किसान हैं.
  • इंदु कुमारी के पिता बोकारो में पैंट्री चलाते हैं.
  • मेरठ के अल्बर्ट बंसला और उनकी दादी का ख़र्च दादा की छोटी सी पेंशन से चलता है.

ये सभी दिल्ली के जवाहर लाल नेहरू विश्वविद्यालय (जेएनयू) के छात्र हैं और फ़ीस बढ़ाने के प्रशासन के फ़ैसले से स्तब्ध हैं.

जेएनयू

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जेएनयू के नए नियमों के मुताबिक़ एक सीटर कमरे का मासिक किराया 20 रुपए से बढ़कर 600 रुपए होगा, दो लोगों के लिए कमरे का किराया 10 रुपए से बढ़कर 300 रुपए होगा.

छात्रों के प्रदर्शन के बाद इसमें बदलाव हुआ और इसे क्रमश: 300 और 150 रुपए कर दिया गया. सरकार ने इसे 'मेजर रोलबैक' यानी 'भारी कटौती' के तौर पर पेश किया.

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फ़ीस बढ़ने पर नाराज़ छात्रों ने सोमवार को हज़ारों की संख्या में सुबह आठ बजे से शाम सात बजे तक प्रदर्शन किए थे.

सर्विस चार्ज जिसमें मेंटेनेंस, कुक आदि ख़र्च जो पहले नहीं लगते थे, अब छात्रों को कुल ख़र्च का आधा हिस्सा देना होगा.

प्रशासन के आंशिक रोलबैक से छात्र संतुष्ट नहीं हैं. उन्हें लगता है कि शुल्कों को मनमाने तरीक़े से दोबारा बढ़ाया जा सकता है.

प्रशासन का कहना है कि कमरों के किराए तीन दशक से नहीं बढ़े थे, बाकी ख़र्च एक दशक से लंबे समय से नहीं बढ़े थे, इसलिए ये कदम ज़रूरी था.

कई छात्रों का कहना है अगर ये बढ़ोतरी प्रभाव में आई तो उन्हें पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी.

नए मैनुअल में ड्रेस कोड के लिए 'एप्रोप्रिएट' यानी 'उपयुक्त' शब्द है. छात्र इसके मायने भी पूछ रहे हैं.

जेएनयू में विवाद नए नहीं हैं.

इस विश्वविद्यालय के बाहर कई हलके छात्रों को "मुफ़्तखोर," "पैरासाइट", "टुकड़े-टुकड़े गैंग", "राष्ट्रविरोधी" और टैक्सपेयर के ख़र्च पर सालों "ऐश" करने वाला कहते हैं.

प्रदर्शनों के अगले दिन बाद गुरुनानक जयंती पर मैं दोपहर लंच के समय कैंपस के कावेरी हॉस्टल पहुंचा.

कई छात्रों ने बताया कि प्रदर्शनों के कारण वो थका महसूस कर रहे थे लेकिन उनमें रोष कम नहीं हुआ था.

ज्योति: पैसे बढ़े तो पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी

ज्योति कुमारी
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नर्मदा होस्टल के बाहर मेरी मुलाकात 21 साल की ज्योति कुमारी से हुई. चिल्लाने के कारण दूसरे कई छात्रों की तरह उनका भी गला बैठा हुआ था.

ज्योति के पिता किसान हैं और सासाराम के एक गांव में खेती करते हैं. परिवार की सालाना आय 70,000 से 90,000 रुपए के बीच है.

वो जेएनयू में रूसी भाषा में मास्टर्स कर रही हैं.

सिविल सर्विसेज़ में जाने का ख्वाब देखने वाली ज्योति कहती हैं, "प्रदर्शन के दिन मेरी रुलाई फूटने लगी थी - ये देखकर कि पुलिस किस तरह महिलाओं के साथ व्यवहार कर रही थी. मुझे लगा कि ये सब किधर जा रहा है. वीसी हमारी बात नहीं सुन रहे हैं."

कई छात्राओं ने प्रदर्शन के दिन पुलिस पर हद से ज़्यादा बल इस्तेमाल करने और मैनहैंडलिंग का आरोप लगाया था.

स्थानीय पुलिस अफ़सरों से जब हमने संपर्क किया तो उन्होंने बात करने से इनकार कर दिया.

जेएनयू

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ज्योति ने बताया कि फ़ीस में बढ़ोतरी के कारण उन्हें अपनी पढ़ाई छोड़नी पड़ेगी.

वो कहती हैं, "मैंने 2017 से घर से पैसे नहीं लिए हैं. फ़ीस बढ़ोतरी पर मेरी पापा से बात हुई है. वो अभी इसे प्रोसेस नहीं कर पा रहे हैं. मेरी छोटी बहन और भाई है. वो भी जेएनयू एंट्रेंस देने का सोच रहे थे. अगर ये फीस बढ़ोतरी लागू होती है तो वो यहां कैसे पढ़ पाएंगे? मैं भी पढ़ाई जारी नहीं रख पाऊंगी."

ज्योति को हर महीने मेरिट कम मीन्स स्कॉलरशिप के 2,000 रुपए मिलते हैं. विश्वविद्यालय की ओर से ये स्कॉलरशिप उन बच्चों को मिलती है जिनकी सालाना पारिवारिक आय 2,50,000 रुपए से कम है.

महीने का बाकी का ख़र्च वो ट्यूशन पढ़ाकर निकलती हैं.

वो कहती हैं, "मैं रूसी या अंग्रेज़ी की कुछ क्लासेज़ लेती हूँ. जब ट्यूशन नहीं मिलते तो बहुत समस्या हो जाती है. आपको पता है कि किसानों की क्या हालत है. मेरे परिवार की मासिक आय छह से सात हज़ार के बीच है."

इंदु: पढ़ाई छोड़ नौकरी करनी पड़ेगी

नर्मदा होस्टल, जेएनयू

ज्योति के साथ बैठी बोकारो की रहने वाली इंदु ने बताया वो रिसर्च करना चाहती हैं, न कि 9 बजे सुबह से पांच बजे शाम की नौकरी.

उनके पिता पैंट्री चलाते हैं जिसकी "हालत अच्छी नहीं है".

इंदु पार्टटाइम में एडिटिंग, टीचिंग करके खर्च पूरा करती हैं.

वो कहती हैं, "मुझ पर एमफ़िल की पढ़ाई छोड़ने और नौकरी करने का दबाव बढ़ेगा ताकि मैं शादी कर लूं. मैं 9 से 5 बजे वाली नौकरी ढूंढूंगी. चाहे मैं जेएनयू की नेट होल्डर हूं या मैंने मास्टर्स किया हो, इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. मैंने नौकरी ढूंढनी शुरू कर दी है."

एक आंकड़े के मुताबिक जेएनयू में करीब 8,000 छात्र पढ़ते हैं जिनमें करीब 5,000 होस्टल में रहते हैं.

वीडियो कैप्शन, जेएनयू के स्टूडेंट्स क्यों कर रहे हैं विरोध-प्रदर्शन?

अली जावेद: 40 फीसदी बच्चों के परिवारों की आय बेहद कम

फीस बढ़ोतरी के विरोध के दौरान जेएनयू पर किया गया एक ड्राफ़्ट सर्वे कई छात्र शेयर कर रहे हैं. यही "ड्राफ़्ट सर्वे" मेरे पास भी पहुंचा. इस सर्वे का नाम है "इनिशियल रिपोर्ट ऑफ़ द जेएनयू स्टुडेंट सर्वे."

ये सर्वे सहारनपुर के रहने वाले जेएनयू में सेंटर फॉर द स्टडी ऑफ़ रीजनल डेवलेपमेंट में एमफ़िल स्कॉलर अली जावेद ने किया है.

अली जावेद इससे पहले एमिटी और जामिया में पढ़ चुके हैं.

अली जावेद
इमेज कैप्शन, अली जावेद

इस "सर्वे" का सैंपल साइज़ 463 छात्र हैं जो "हॉस्टल में रहने वाले छात्रों का नौ प्रतिशत है".

"सर्वे" का दावा है कि हॉस्टल मे पढ़ने वाले 40-46 प्रतिशत बच्चों के परिवारों की वार्षिक आय 1.44 लाख रुपए से कम है.

"सर्वे" पर छात्रों के रिस्पांस लेने के लिए फॉर्म को व्हाट्सऐप पर सर्कुलेट किया गया था, हालांकि अली जावेद के मुताबिक शुरुआत में सर्वे पर कुछ विवाद भी हुआ था.

मांडवी हॉस्टल में रह रहे अली कहते हैं, "लंच खाने के बाद जब कोई लाइब्रेरी जाता है उसे पांच-छह या सात घंटों में भूख लगती है. मैंने देखा कि छात्र पांच रुपए की चाय पीने से भी कतराते हैं. लोगों के पास खर्च करने के लिए पांच रुपए भी ज़्यादा नहीं हैं. दिन में अगर उन्होंने चाय पी ली तो समझ लीजिए उन्होंने कुछ विशेष काम कर लिया है."

"मेरी क्लास में छात्र हैं जिनकी पैंट 15 दिनों से फटी है. अगर वो छात्र पैंट नहीं सिलवा पा रहा है तो सोचिए वो किन हालात से जूझ रहा होगा. सर्दी में लोगों के पास ओढ़ने के लिए चादरें नहीं हैं. मैंने खुद किसी को चादर दी है. लोगों ने कर्ज़ उताने के लिए बीपीओ में नौकरी की है और यहां एडमिशन लिया है. लोगों के जूते फटे होते हैं और वो उन्हें बदलते नहीं हैं."

"मांडवी हॉस्टल में उन छात्रों की लिस्ट निकली जिन्होंने मेस बिल नहीं भरा. ये सवाल नहीं उठा कि उन्होंने ये बिल क्यों नहीं भरा. ये सवाल नहीं उठा कि हो सकता है कि ये लोग वो हों जिनके पास पैसे नहीं हैं. आपको फ़ोटो कॉपी निकालनी होती है. उसी का खर्च हो जाता है. लोग एक दो किलोमीटर चलते हैं ताकि वो शेयर्ड रिक्शे पर 10 रुपए बचा सकें. उसके बाद उनसे उम्मीद की जाती है कि वो बढ़ी हुए रेट पर फीस दें. क्या इस देश में हम ऐसी संस्था नहीं रख पाएंगे जहां निचले तबके से लोग आकर पढ़ सकें?"

गोपाल: पढ़ाई जारी रखने को लेकर चिंता

कावेरी हॉस्टल, जेएनयू

कावेरी हॉस्टल के बाहर मुझे काला चश्मा पहने गोपाल मिले. वो ठीक से देख नहीं सकते. वो सीढ़ियों पर धीरे-धीरे चढ़ते पहले फ़्लोर के अपने कमरे की ओर बढ़ रहे थे. मैं उनके पीछे था.

कमरे में उनके रूममेट किशोर कुमार बिस्तर पर बैठे थे. दूसरे बिस्तर पर पड़ी चादर अस्त-व्यस्त थी. सामने की दीवार के झरोखे में एक सफ़ेद कूलर फिट था.

साथ की लगी दीवार में फिट मटमैली रंग की अलमारी पर सफ़ेद पेंट के छींटे थे और हैंडल पर अंडरवियर और पैंट लटका था.

स्टडी टेबल पर तीन केले, उलटा गिलास, बंद टिफ़िन बॉक्स, पॉलिथीन में बंद लइया, इलेक्ट्रिक चाय का केटल और पीली रंग की चाय की छन्नी रखी थी. मेज़ पर चीनी बिखरी थी.

किशोर कुमार
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सेंटर फॉर पॉलिटिकल स्टडीज़ से मॉस्टर्स कर रहे किशोर ने मुझे बताया, "जेएनयू आने का कारण था शिक्षा का अच्छा स्तर. साथ ही ये सबसे एफ़ोर्डेबल यूनिवर्सिटी है. इसका कैंपस बैरियर फ़्री है."

पुष्पेश पंत जैसे प्रोफ़ेसर्स के नाम ने उन्हें जेएनयू की ओर आकर्षित किया. सपना था, जेएनयू का नाम ठप्पा मार्कशीट पर लग जाए.

किशोर की आंखों में बचपन से ऑप्टिक नर्व्स में समस्या थी और उन्हें बचपन से मात्र 10 प्रतिशत दिखाई देता है. उन्होंने विशेष स्कूलों में पढ़ाई की. अब जेएनयू में फ़ीस की बढ़ोत्तरी से पढ़ाई जारी रखने को लेकर वो चिंतित थे.

पंकज: अब तक स्कॉलरशिप के सहारे की पढ़ाई

पास ही ग़ाज़ीपुर के पंकज सिंह कुशवाहा बैठे थे. उनके पिता किसान हैं और ढाई बीघे की छोटी सी ज़मीन पर खेती करते हैं.

पंकज भी आंशिक दृष्टिहीन हैं और वो इन्क्लूसिव एजुकेशन पर पीएचडी कर रहे हैं.

पंकज सिंह कुशवाहा
इमेज कैप्शन, पंकज सिंह कुशवाहा

पंकज कहते हैं, "हम लैपटॉप पर पढ़ते हैं. लैपटॉप बंद तो हमारी पढ़ाई बंद. प्रशासन बिजली का नया चार्ज लाने वाला है. हर रूम के सामने मीटर लगाने की बात है. हमें लगता इसके अलावा प्लंबर चार्जेज़ और बाकी ख़र्चों मे भी बढ़ोतरी होगी."

"किताबों को पढ़ने के लिए हम रीडर रखते हैं. यहां उसके लिए पैसे भी मिलते हैं. पहले रीडर के एक रात रुकने का दस रुपए लगता था. अब उसे 30 रुपए प्रति नाइट करने की बात है. इस तरह सारे खर्च बढ़ रहे हैं. इन खर्चों से हमारा मासिक व्यय करीब दोगुना हो जाएगा."

पंकज के मुताबिक रूम के किराये, मेस के ख़र्च आदि को जोड़ें तो यहां पीडब्ल्यूडी (परसन विद डिसएबिलिटी) के छात्रों का हर महीने चार से पांच हज़ार का खर्च होता है. फ़ीस बढ़ने के बाद उन पर आर्थिक बोझ बढ़ेगा.

दसवीं और 12वीं कक्षा की पढ़ाई स्पेशल सरकारी स्कूलों में करने वाले पंकज कहते हैं, "एडमिशन लेने के बाद घर से एक रुपए भी नहीं लिया. साल 2011 में एमए में हमें 3000 रुपए रीडरशिप अलाउंस और 2000 मेरिट कम मीन्स स्कॉलरशिप का मिलता था. अगर ये पैसा नहीं होता तो हम उच्च शिक्षा हासिल नहीं कर पाते."

जेएनयू आने से पहले किशोर के रूममेट गोपाल को लगता था कि जेएनयू में देश विरोधी नारे लगते हैं.

वो कहते हैं, "मैं यहां आना नहीं चाहता था लेकिन मेरे शिक्षक जेएनयू के थे. उन्होंने मुझे यहां आने के लिए प्रेरित किया. आज मुझे लगता है कि ये मिनी भारत है."

फ़ीस बढ़ने के बाद मेरे कई दोस्त कहते हैं वो पढ़ाई छोड़ देंगे. मैं अभी अपने दोस्तों की आर्थिक मदद कर देता हूँ. फ़ीस बढ़ने के बाद ऐसा नहीं कर पाऊंगा. मेरा बजट भी सीमित है.

"मुझे दुख होता है कि अभिजीत बनर्जी, एस जयशंकर, निर्मला सीतारमण जो यहां से पढ़े, इनमें से कुछ आज हमारे समर्थन में नहीं हैं. वो खुद इतनी कम फ़ीस में पढ़े और आज हमारे ऊपर इतनी बड़ी फ़ीस का बोझ डालना चाहते हैं."

अल्बर्ट: दादा की पेंशन से चलता है घर

ऐल्बर्ट
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नर्मदा होस्टल में ही मुझे अल्बर्ट मिले जो वैज्ञानिक बनना चाहते हैं.

प्रदर्शन के दिन उन्हें चोट लगी और उन्हें एम्स अस्पताल रेफ़र किया गया जहां पता चला कि उन्हें माइनर फ़ैक्चर हो गया था.

पहली मंज़िल के अपने कमरे में वो चारपाई पर प्लास्टर चढ़ा अपना चोटिल पांव ऊपर रखकर बैठे थे. उनके घर का सारा ख़र्च दादा की पेंशन पर चलता है.

वह स्कूल ऑफ़ कंप्युटेशनल एंड इंटेग्रेटिव साइंसेज़ से कांप्लेक्स सिस्टम्स में पीएचडी कर रहे हैं.

वो कहते हैं, "जेएनयू में जो डेटा कोर्स 283 रुपए में पढ़ाया जाता है, उसे बाहर करने में 5-6 लाख रुपए लगते है. निजी इंस्टीट्यूट में ये फ़ीस 20-25 लाख तक जाती है. अगर फ़ीस बढ़ती है इस सेमेस्टर के बाद मैं पढ़ाई छोड़ दूंगा. अभी मुझ पर नौकरी करने का बहुत दबाव है. मैं किसी छोटे-मोटे स्कूल में कोई नौकरी ढूंढ लूंगा."

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