चिन्मयानंद पर रेप का मामला दर्ज क्यों नहीं हुआ?

    • Author, विभुराज
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

'चिन्मयानंद मामले में छात्रा की बेल पिटीशन पर सोमवार को सुनवाई और स्वामी अभी भी अस्पताल में' शुक्रवार के अख़बारों की ये सुर्खियां चिन्मयानंद प्रकरण पर तेज़ी से बदलते घटनाक्रम की तरफ़ साफ़ इशारा कर रही थीं.

ठीक महीने भर पहले अगस्त की 27 तारीख़ को शाहजहांपुर पुलिस ने ऐक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में ये बताया था कि छात्रा के पिता की शिकायत पर चिन्मयानंद के ख़िलाफ़ क़त्ल के इरादे से अगवा किए जाने और चिन्मयानंद की शिकायत पर छात्रा के ख़िलाफ़ जबरन उगाही का मामला दर्ज किया गया है.

शाहजहांपुर पुलिस की इस प्रेस कॉन्फ़्रेंस से पहले सोशल मीडिया पर चिन्मयानंद और छात्रा के कुछ वीडियो वायरल हो चुके थे. एक वीडियो ऐसा भी था जिसमें चिन्मयानंद पर लड़कियों का शोषण करने और धमकाने का आरोप लगाया गया था.

बात सुप्रीम कोर्ट तक पहुंची, लड़की बरामद हुई, हाई कोर्ट की निगरानी में एसआईटी का गठन हुआ, चिन्मयानंद की गिरफ़्तारी हुई और सीने में दर्द की शिकायत के बाद चिन्मयानंद संजय गांधी पोस्ट ग्रैजुएट इंस्टिट्यूट ऑफ़ मेडिकल साइंसेज़ में इलाज के लिए भर्ती हो गए.

आख़िरकार 25 सितंबर को चिन्मयानंद पर यौन शोषण का आरोप लगाने वाली छात्रा भी जबरन उगाही के मामले में गिरफ़्तार कर ली गई.

इससे पहले 20 सितंबर को स्पेशल इन्वेस्टिगेशन टीम के चीफ़ नवीन अरोड़ा ने बताया था कि चिन्मयानंद पर आईपीसी की धारा 376C, 354D, 342 और धारा 506 के तहत मामला दर्ज किया गया है.

एसआईटी के इस बयान के बाद से ही ये सवाल उठने शुरू हो गए थे कि आख़िर उत्तर प्रदेश पुलिस ने चिन्मयानंद पर रेप का केस क्यों नहीं दर्ज किया. इतना ही नहीं, पुलिस पर चिन्मयानंद का पक्ष लेने के आरोप भी लगे.

चिन्मयानंद पर क्या आरोप लगाए गए हैं?

यौन शोषण के इस मामले में दर्ज़ एफ़आईआर में एसआईटी ने चिन्मयानंद पर रेप के बजाय नियंत्रण या प्रभुत्व रखने वाले व्यक्ति द्वारा शारीरिक संबंध बनाने (धारा 376C) का केस रजिस्टर किया है.

इसके अलावा पीछा करने (धारा 354D), ग़लत तरीक़े से क़ैद करने (धारा 342) और आपराधिक धमकी देने (धारा 506) का भी आरोप लगाया गया है.

एसआईटी चीफ़ नवीन अरोड़ा ने 20 सितंबर को एक प्रेस कॉन्फ़्रेंस में कहा था, "इस मामले में चिन्मयानंद ने अपनी मौजूदगी स्वीकारी है, अश्लील बातचीत करने की बात को स्वीकार किया है, उन्होंने बॉडी मसाज की बात मानी है, यहां तक की ये बात उन्होंने पूरी तरह से मानी है. चिन्मयानंद ने ये भी कहा कि वे अपने कृत्य पर शर्मिंदा हैं."

दिलचस्प बात यह है कि एसआईटी ने ये तो माना कि "स्वामी चिन्मयानंद ने लगभग वो सारी चीज़ें स्वीकार कर ली हैं, जिनके उन पर आरोप लगे" हैं. लेकिन फर भी रेप की धाराओं के तहत मामला नहीं दर्ज़ करने की उसने कोई स्पष्ट वजह नहीं बताई.

एडवोकेट शिल्पी जैन कहती हैं, "धारा 376 में क़ानून ये कहता है कि अगर लड़की की शिकायत में बलात्कार की बात कही जाती है तो इस प्रावधान के तहत मामला दर्ज़ किया जाएगा. यहां तक कि मेडिकल साक्ष्यों की भी कोई बाध्यता नहीं रहती है."

"सुप्रीम कोर्ट ने कई मुक़दमों में ये फ़ैसला दिया है. किसी दूसरे गवाह से आरोप की पुष्टि की ज़रूरत नहीं होती. सिर्फ़ लड़की का कह देना कि धारा 376 बनता है. इतना ही काफ़ी है."

पुलिस कैसे काम करती है?

चिन्मयानंद प्रकरण या यौन शोषण के अन्य मामलों में पुलिस के काम करने का तरीक़ा क्या होता है? इसे लेकर हमेशा से सवाल उठते रहे हैं.

एडवोकेट सोनाली करवासरा का कहना है, "ऐसे मामलों में पुलिस को सबसे पहले एफ़आईआर दर्ज़ करनी होती है. ये ज़ीरो एफ़आईआर होती है यानी पुलिस ये नहीं कह सकती कि उनका ज्यूरिडिक्शन बनता है या नहीं. इस बात से कोई फ़र्क नहीं पड़ता कि अपराध कहां हुआ है और पीड़िता कहां रहती है. इसके बाद पीड़िता की मेडिकल जांच कराई जाती है."

लेकिन अगर पीड़िता ये कहे कि उसके साथ लंबे समय से यौन शोषण हो रहा था तो मेडिकल साक्ष्यों की क्या अहमियत रह जाती है? जैसा कि चिन्मयानंद मामले में पीड़िता ने आरोप लगाया है.

इस सवाल पर एडवोकेट सोनाली करवासरा कहती हैं, "इस सूरत में मेडिकल जांच के नतीज़ों की अहमियत ज़रूर कम हो जाती है. शिकायतकर्ता चाहे तो मेडिकल टेस्ट के लिए मना कर सकती है. हालांकि, मेडिकल टेस्ट हो, इसके लिए पुलिस को पूरी कोशिश करनी होती है."

पुलिस की भूमिका पर एडवोकेट शिल्पी जैन का कहना है, "चाहे रेप केस हो या कोई भी क्रिमिनल केस, एफ़आईआर दर्ज करना, चार्ज़शीट फ़ाइल करना, ये पुलिस के जूनियर रैंक के अधिकारी करते हैं. इसमें किसी आईपीएस अधिकारी की भूमिका केवल निगरानी करने की है. जांच की जिम्मेदारी जूनियर अधिकारियों पर ही होती है."

क्या कहते हैं क़ानून के जानकार?

हांलाकि इस मसले पर क़ानूनी पंडितों की राय बंटी हुई है.

एडवोकेट वृंदा ग्रोवर कहती हैं, "चिन्मयानंद पर रेप का आरोप नहीं लगाया गया है. उन्हें न्यायिक हिरासत में भेजा गया. इसका मतलब ये हुआ कि पुलिस कस्टडी में उनसे पूछताछ नहीं होगी. ये लज्जाजनक है. अभियुक्त को कौन बचा रहा है? चिन्मयानंद पर आईपीसी की धारा 376(2) के प्रावधान (f), (k) और (n) के तहत मामला दर्ज किया जाना चाहिए था. रेप के मामलों में इसी तरह से अभियुक्त को बचाया जाता है."

आईपीसी की धारा 376(2) के प्रावधान (f), (k) और (n) प्रावधान पड़िता पर नियंत्रण या प्रभुत्व रखने वाले व्यक्ति द्वारा किए गए रेप या एक से ज़्यादा बार बलात्कार के मामलों में लागू होते हैं.

चिन्मयानंद पर जिस सेक्शन 376C के तहत केस दर्ज़ किया गया है, वो भी पीड़िता पर नियंत्रण या प्रभुत्व रखने वाले व्यक्ति द्वारा बनाए गए शारीरिक संबंध की स्थिति में लागू होता है. इस सेक्शन में आरोप साबित होने पर पांच साल से दस साल तक की जेल की सज़ा का प्रावधान है जबकि रेप के मामलों में दस साल से लेकर उम्र क़ैद तक की सज़ा हो सकती है.

एडवोकेट शिल्पी जैन कहती हैं, "ये पूरी तरह से सत्ता के बेजा इस्तेमाल का मामला है. जिन मामलों में मीडिया की दिलचस्पी होती है तो ये देखा जाता है कि पुलिस अपना रवैया बदलकर अभियुक्त के ऊपर क़ानूनी तरीक़े से कार्रवाई करती है. चिन्मयानंद के मामले में पुलिस अभियुक्त के पक्ष में और पीड़िता के ख़िलाफ़ काम करती हुई दिख रही है."

लेकिन वृंदा ग्रोवर और शिल्पी जैन की राय से एडवोकेट अरविंद जैन सहमत नहीं दिखते. वे कहते हैं, "चिन्मयानंद, पड़िता पर नियंत्रण या प्रभुत्व रखने वाले व्यक्ति हैं. इस मामले में सेक्शन 375 (रेप की धारा) लागू नहीं होती. एसआईटी ने सेक्शन 376C लगाकर कुछ ग़लत नहीं किया है."

मामला दर्ज़ कराने में देरी करने से पीड़ित का पक्ष कमज़ोर हो जाता है. क्या वाकई ऐसा कुछ है? चिन्मयानंद के पक्ष में दी जा रही इस दलील पर शिल्पी जैन कहती हैं, "रेप या मर्डर जैसे गंभीर किस्म के अपराधों में देरी का कोई मतलब नहीं होता है. इस मामले में अभियुक्त एक रसूखदार आदमी है. सत्ता पक्ष से जुड़ा हुआ है. इसलिए ये मानने की वजहें होती हैं कि लड़की ने दबाव या डर की वजह से देरी की."

ताक़तवर और रसूखदार अभियुक्तों के मामले में क्या?

क्या क्रिमिनल जस्टिस आम और ख़ास लोगों के लिए अलग-अलग तरीक़े से काम करता है?

एडवोकेट सोनाली करवासरा कहती हैं, "पुलिस कैसे काम करती है, उसके काम करने का तरीका सीआरपीसी (दंड प्रक्रिया संहिता) से तय होता है. और इसमें ऐसा कोई भेद नहीं है."

लेकिन इसके बावजूद पुलिस की भूमिका को लेकर सवाल उठने कम नहीं होते.

एडवोकेट शिल्पी जैन की राय है, "पुलिस के जूनियर रैंक के अधिकारी करप्शन में डूबे हुए हैं. आम मुक़दमों में भी अगर अभियुक्त थोड़ा सा भी पैसे वाला है तो वो कहीं न कहीं बचकर निकल जाता है. हम ऐसे मामले अदालतों में रोज़ देखते हैं. क़ानून कुछ और है और उसे लागू करने का ढंग कमज़ोर है. चिन्मयानंद के मामले में ये ज़्यादा साफ़ तौर पर दिखता है."

यौन शोषण के मामले सामने आने के बाद एक चलन ये भी देखा गया है कि विरोधी पक्ष पीड़िता पर काउंटर एफ़आईआर करता है. जैसा कि चिन्मयानंद के मामले में पुलिस ने पीड़िता पर मामला दर्ज़ किया है.

सोनाली करवासरा कहती हैं, "हम ये नहीं कह सकते कि हर केस सही होता है. क़ानून एक औरत को जितना संरक्षण देता है, उतने ही रास्ते भी खुले होते हैं कि उनका इस्तेमाल करके क़ानूनी प्रावधानों का ग़लत फ़ायदा उठाया जाए. और न ही हम ये कह सकते हैं कि महिलाओं के पक्ष में कड़े कानूनी प्रावधान नहीं बनाए जाने चाहिए क्योंकि उनको प्रोटेक्शन की ज़रूरत है."

साथ ही सोनाली ये भी कहती हैं, "ठीक इसी तरह क़ानूनी मान्यताओं की भी उतनी ही अहमियत होती है. जैसे ये मान्यता कि अगर पीड़िता की गवाही अकाट्य है तो ये रेप के अपराध को साबित करने के लिए काफ़ी है. किसी गवाह की ग़ैरमौजूदगी में पीड़िता के बयान को नाकाफ़ी नहीं माना जाएगा."

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