You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नक्सल प्रभावित इलाक़ों से बीमार जवानों को हटाने की मांग
- Author, सलमान रावी
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
छत्तीसगढ़ में नक्सल विरोधी अभियान के लिए तैनात किए गए केंद्रीय अर्धसैनिक बल (सीआरपीएफ़) की लगभग पूरी एक बटालियन को शारीरिक रूप से अस्वस्थ और अनफिट पाया गया गया है.
आम तौर पर एक बटालियन में एक हज़ार जवान और अधिकारी होते हैं और छत्तीसगढ़ में सीआरपीएफ़ की 22 बटालियन तैनात हैं.
जवानों की फ़िटनेस और ख़राब सेहत की बात तब सामने आई जब सीआरपीएफ़ के आईजी जीएचपी राजू ने मुख्यालय को भेजे गए अपने पत्र में इन जवानों और अधिकारियों को जोखिम भरे इलाक़ों में मिलने वाले भत्ते को रोकने की सिफारिश भी की.
आईजी राजू ने लिखा कि नक्सल प्रभावित इलाक़े सुरक्षा बल के इन जवानों के लिए 'बहुत ही ज़्यादा संवेदनशील' हैं और ऐसे में शारीरिक रूप से कमज़ोर जवानों और अफ़सरों की तैनाती विभाग पर एक बोझ की तरह है.
चिठ्ठी में कहा गया है कि 894 जवानों और अधिकारियों को 'लो मेडिकल कैटेगरी' का यानी शारीरिक रूप से अस्वस्थ पाया गया है.
दिल्ली स्थित सीआरपीएफ़ के मुख्यालय में प्रशासन महानिरीक्षक एम एस भाटिया ने बीबीसी से बात करते हुए कहा कि सीआरपीएफ़ निदेशालय को आईजी की चिट्ठी मिली है जिसकी समीक्षा की जा रही है.
भाटिया का कहना था कि आईजी ने शारीरिक रूप से अक्षम या बीमार जवानों और अधिकारियों की तैनाती पर सवाल उठाते हुए उनको नक्सल इलाक़ों से कहीं और भेजने की सिफारिश की है.
वो कहते हैं, ''हम इस पर चर्चा कर रहे हैं जिसके बाद कोई ही आईजी की सिफारिशों पर कोई पहल की जाएगी."
सीआरपीएफ़ निदेशालय के मुताबिक, फिलहाल 'लो मेडिकल केटेगरी' के तहत चिह्नित किये गए जवानों और अधिकारियों को नक्सल प्रभावित इलाक़ों में सिर्फ कैम्पों में ही रखा जाता है. उन्हें अभियान का हिस्सा नहीं बनाया जा रहा है इसलिए उन्हें विशेष भत्ता दिया जाए या नहीं, इस पर चर्चा चल रही है.
पूर्वी और मध्य भारत माओवाद की चपेट में है जहां पिछले कुछ दशकों से सुरक्षा बलों और माओवादी छापामारों के बीच युद्ध चल रहा है.
इस हिंसा में कई लोगों को अपनी जानें गंवानी पड़ी हैं. यही वजह है कि नक्सल प्रभावित राज्यों की सहायता के लिए केंद्र सरकार ने बड़े पैमाने पर केंद्रीय बलों की तैनाती की है.
इन राज्यों में झारखंड, ओडिशा, आंध्र प्रदेश, तेलंगाना और छत्तीसगढ़ प्रमुख हैं जहां कई इलाक़े में माओवाद प्रभावित हैं.
छत्तीसगढ़ पुलिस के महानिदेशक डीएम अवस्थी कहते हैं कि नक्सल विरोधी अभियान में मानसिक और शारीरिक रूप से मज़बूत जवानों और अधिकारियों की ज़रूरत है.
वो कहते हैं, "ये ख़तरनाक इलाक़े हैं. कब क्या होगा कोई नहीं कह सकता. यहाँ सतर्कता बहुत महत्वपूर्ण है. यहां काम करना जोखिम भरा है इसलिए कोई 'चांस' नहीं लिया जा सकता."
अवस्थी ये भी कहते हैं कि जिन इलाक़ों में नक्सली सक्रिय हैं वो बड़े दुर्गम और मुश्किल इलाक़े हैं जहाँ अलग अलग तरह की चुनौतियां हैं. वो कहते हैं, "बहुत लंबे अरसे तक इन इलाक़ों में तैनात रहने से भी जवानों और अधिकारियों पर मानसिक और शारीरिक असर पड़ता है."
नक्सल प्रभावित इलाक़ों में अर्ध सैनिक बलों के कई कैंप बनाये गए हैं. ज़्यादातर कैंप सुदूर और दुर्गम इलाक़ों में स्थित हैं. छत्तीसगढ़ में कई ऐसे इलाक़े हैं जहां माओवादी अकसर बारूदी सुरंगें और 'बूबी ट्रैप' लगाते रहते हैं.
ऐसे में जवानों का कैंप से बाहर निकलना भी जोखिम भरा है.
मिसाल के तौर पर साल 2010 में छत्तीसगढ़ के सुकमा ज़िले के ताड़मेटला में सीआरपीएफ़ जवानों पर माओवादी छापामारों ने तब घात लगाकर हमला किया जब वो रोज़ की तरह अपने कैंप से बाहर निकले थे. इसमें 70 जवान मारे गए थे.
ऐसी कई वारदात दर्ज की गई हैं जब माओवादियों ने कैंपों पर हमला किया.
कुछ एक सर्वेक्षणों में पाया गया है कि ऐसे इलाक़ों में तैनात जवान और अधिकारियों पर मानसिक दबाव भी काफ़ी रहता है.
कई ऐसे मामले भी दर्ज किये गए हैं जब या तो किसी जवान ने आत्महत्या कर ली या फिर मानसिक तनाव में अपने किसी अधिकारी पर ही गोली चला दी.
झारखण्ड के पूर्व पुलिस महानिदेशक रहे राजीव कुमार का मांनना है कि नक्सल विरोधी अभियान में शामिल कोई जवान अगर शारीरिक और मानसिक रूप से फिट न हो तो उस अभियान में उसके शामिल होने का कोई मतलब नहीं है और वह बाक़ी जवानों के लिए बोझ बन जाता है.
राजीव कुमार कहते हैं कि माओवादियों के साथ चल रहे छापामार युद्ध के लिए अब कुछ प्रभावित राज्यों ने ख़ुद के विशेष बलों को प्रशिक्षित किया है जिससे केंद्रीय सुरक्षा बलों पर निर्भरता कम हो सके जैसे आंध्र प्रदेश के 'ग्रे हाउंड' और झारखण्ड में 'झारखंड जगुआर'. उसी तरह महाराष्ट्र में भी माओवादियों से निपटने के लिए अलग विशेष फ़ोर्स बनाई गयी है.
नक्सल प्रभावित इलाक़ों में तैनात केंद्रीय बलों के जवानों को वेतन के साथ हर महीने 17,300 रुपये अतिरिक्त मिलते हैं जबकि अधिकारियों के लिए ये अतिरिक्त रक़म 25 हज़ार रुपए प्रति माह है.
जम्मू-कश्मीर के पुलवामा में हुए हमले के बाद केंद्रीय गृह मंत्रालय ने ये राशि बढ़ाने की घोषणा भी की है.
मगर सीआरपीएफ़ के आई जी राजू का कहना है कि शारीरिक रूप से बीमार या कमज़ोर अधिकारियों और जवानों को अति संवेदनशील इलाक़ों से हटाना उनके लिए भी बेहतर है और अभियान के लिए भी.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूबपर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)