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अयोध्या विवाद पर केंद्र सरकार की पहल से पक्षकार नाराज़
- Author, समीरात्मज मिश्र
- पदनाम, लखनऊ से, बीबीसी हिंदी के लिए
राम मंदिर-बाबरी मस्जिद विवाद में सरकार के नए क़दम को विवाद से जुड़े पक्षकार कोई ख़ास तवज्जो नहीं दे रहे हैं.
सरकार के इस क़दम से उन्हें न तो विवाद सुलझने की उम्मीद दिख रही है और न ही इससे मंदिर निर्माण का मार्ग प्रशस्त होता दिख रहा है.
केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अर्जी दाख़िल करके अपील की है कि अयोध्या में विवादित हिस्से को छोड़कर बाक़ी ज़मीन राम जन्मभूमि न्यास को सौंप दे ताकि राम मंदिर की योजना पर काम किया जा सके.
राम जन्म भूमि-बाबरी मस्जिद विवाद में पक्षकार निर्मोही अखाड़ा के महंत दिनेंद्र दास ने बीबीसी से बातचीत में कहा कि ये सिर्फ़ राजनीति है, इसके सिवा और कुछ नहीं.
उनका कहना था, "सुप्रीम कोर्ट से दिलवाना है तो पूरी ज़मीन निर्मोही अखाड़े को दिलाएं और निर्मोही अखाड़ा दूसरे पक्ष यानी सुन्नी सेंट्रल वक़्फ़ बोर्ड के साथ बातचीत करके मामले को सुलझा लेगा. हम बोर्ड को अखाड़े की ज़मीन देने को तैयार हैं. चुनाव के ठीक पहले सरकार का ये क़दम लोगों का ध्यान भटकाने की कोशिश है और कुछ नहीं. ये सरकार को भी पता है कि उसके इस क़दम पर सुप्रीम कोर्ट कुछ नहीं करने वाली."
क्या कहता है दूसरा पक्ष?
हालांकि, इस मामले में प्रमुख मुस्लिम इक़बाल हाशिम अंसारी का कहना है कि उन्हें सिर्फ़ मस्जिद की ज़मीन चाहिए.
उन्होंने कहा, "बाबरी मस्जिद के अलावा सरकार ज़मीन का कोई भी दूसरा हिस्सा लेने को आज़ाद है. उस पर हमारा कोई दावा ही नहीं है. उस ज़मीन को तो सरकार ने अधिग्रहित किया था, उसे वापस लेने की अर्जी डाल रखी है तो हमें क्या आपत्ति होगी."
वहीं राम जन्म भूमि मंदिर के मुख्य पुजारी महंत सत्येंद्र दास का कहना है कि केंद्र सरकार ग़ैर विवादित 67 एकड़ अधिग्रहित ज़मीन को वापस ले सकती है लेकिन जबतक गर्भगृह की विवादित जमीन पर फैसला नहीं होता मंदिर निर्माण नहीं शुरू हो सकता.
सत्येंद्र दास का कहना है कि अगर सुप्रीम कोर्ट इसकी इजाज़त दे भी दे तो मंदिर निर्माण होना मुश्किल है क्योंकि मंदिर गर्भगृह वाले स्थान पर बनना है. उनके मुताबिक, "अगर मंदिर कहीं और बनना होता तो विवाद ही क्यों होता? अयोध्या में मंदिर के लिए ज़मीन की कमी थोड़ी है. सरकार संसद में कानून बना कर इस विवाद का हल करे और अपने वादे को निभाए."
सरकार के हस्तक्षेप पर सवाल
इक़बाल अंसारी भले ही ग़ैर विवादित अधिग्रहित भूमि को वापस मांगने संबंधी सरकार के क़दम पर आपत्ति नहीं जताते लेकिन बाबरी मस्जिद के एक अन्य पक्षकार हाजी महबूब को सरकार के इस क़दम पर सख़्त ऐतराज़ है.
उनका कहना है, "अधिग्रहण के मक़सद में साफ़ कहा गया है कि जिसके पक्ष में फ़ैसला आएगा, उसे इसका हिस्सा आवंटित किया जाएगा. ऐसे में सरकार इस ज़मीन को न्यास को देने की बात कैसे कर सकती है."
हालांकि उनका ये भी कहना है कि विवादित हिस्से को छोड़ कर कहीं भी मंदिर निर्माण किया जाए तो उन्हें ऐतराज़ नहीं है.
वहीं राम जन्म भूमि न्यास के वरिष्ठ सदस्य और पूर्व सांसद राम विलास वेदांती ने सरकार के इस क़दम की प्रशंसा की है लेकिन वेदांती इसे देर से उठाया क़दम बताते हैं.
उनके मुताबिक, "यह याचिका 2014 में ही दायर की जानी चाहिए थी जब केंद्र में बीजेपी की सरकार बनी थी. ऐसा हो गया होता तो अब तक मंदिर निर्माण शुरू हो गया होता."
अयोध्या में विवादित स्थल के आस-पास की क़रीब 67 एकड़ ज़मीन का केंद्र सरकार ने साल 1993 में अधिग्रहण कर लिया था.
बाद में कोर्ट ने इस पूरे परिसर में यथास्थिति बनाए रखने और कोई धार्मिक गतिविधि न होने के निर्देश दिए थे.
साल 2010 में इलाहाबाद हाईकोर्ट ने इस ज़मीन के 2.77 एकड़ को तीन पक्षों में बराबर-बराबर बांट दिया था. हाईकोर्ट के इसी आदेश को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है.
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