आरबीआई की स्वतंत्रता भारत के हित में: अरविंद सुब्रमण्यम

भारत के पूर्व आर्थिक सलाहकार अरविंद सुब्रमण्यम ने सरकार और आरबीआई के बीच तनाव की ख़बरों पर टिप्पणी की है.
बीबीसी संवाददाता समीर हाशमी से विशेष बातचीत में उन्होंने कहा कि आरबीआई की स्वायत्तता की रक्षा की जानी चाहिए, साथ ही आरबीआई को भी सहयोग करना चाहिए.
अरविंद सुब्रमण्यम ने जून में देश के मुख्य आर्थिक सलाहकार के पद से इस्तीफ़ा दे दिया था. इसके बाद अपनी नई किताब में उन्होंने केंद्र सरकार के नोटबंदी के फ़ैसले को 'मौद्रिक झटका' बताया है.
समीर हाशमी ने जब विशेष बातचीत में उनसे फिर यह सवाल किया तो सुब्रमण्यम ने कहा, "पहले नोटबंदी हुई और उसके बाद जीएसटी. दोनों का कैश की उपलब्धता पर असर पड़ा. जो हम आज अर्थव्यवस्था का प्रदर्शन देख रहे हैं, उसमें इन दोनों का बड़ा असर है. मैं हमेशा जीएसटी का हिमायती रहा हूं. लेकिन जीएसटी का जो आकलन हुआ है वो भी कुछ हद तक नोटबंदी के असर से प्रभावित हुआ है."

क्या सरकार ने मशविरा किया था?
दो साल पहले केंद्र सरकार ने पांच सौ और एक हज़ार के नोटों का चलना अचानक बंद कर दिया था. इसका मुख्य मक़सद कालेधन पर लग़ाम लगाना बताया गया था. हालांकि बाद में ये आंकड़े सामने आए कि नोटबंदी के बावजूद 99 फीसदी नोट वापस बैंकों में आ गए. हालांकि सरकार नोटबंदी को इस आधार पर भी फ़ायदे का सौदा बताती है कि इसके बाद आयकर भरने वालों की संख्या बढ़ गई.
पर क्या नोटबंदी का नुकसान ज़्यादा हुआ, इस सवाल पर सुब्रमण्यम ने कहा, "मुझे लगता है कि अभी तक किसी ने शॉर्ट टर्म या लॉन्ग टर्म में फ़ायदे नुकसान का विश्लेषण किया नहीं है. पर ये हो सकता है. नोटबंदी के बारे में बहुत लोग कहेंगे कि इसके फ़ायदे हुए और बहुत लोग कहेंगे कि नुकसान हुआ."
उन्होंने कहा, "एक विश्लेषक के तौर पर मैंने जो फ्रेमवर्क पेश किया था, वह अब भी अपनी जगह है. मैं आगे बढ़कर कहना चाहता हूं कि वे कौन सी नई चीज़ें हैं जिन पर मैं विचार करना चाहता हूं."

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अरविंद सुब्रमण्यम ने अपनी किताब में यह नहीं बताया है कि नोटबंदी के फैसले से पहले सरकार ने उनसे सलाह-मशविरा किया था या नहीं. इस बार भी उन्होंने यह बताने से इनकार कर दिया.
उन्होंने कहा, "ये मैंने किताब में भी कहा कि ये बातें सार्वजनिक करना उचित नहीं है. मैं इस पर ध्यान केंद्रित रखना चाहता हूं कि अर्थव्यवस्था को समझने के लिहाज़ से इसका क्या अर्थ है. ये मेरा नज़रिया है."

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'आरबीआई की स्वतंत्रता की रक्षा हो'
आरबीआई और भारत सरकार के बीच तनाव की ख़बरों पर राय पूछे जाने पर उन्होंने कहा, "मतभेद हो सकते हैं, उस पर बात करनी चाहिए. लेकिन ये सहयोग की भावना से किया जाना चाहिए. आरबीआई की स्वतंत्रता की रक्षा की जानी चाहिए. यह भारत के हित में है. इसका ये मतलब नहीं है कि आरबीआई की आलोचना न हो. लेकिन इस समझ के साथ संवाद हो कि आरबीआई एक संस्था के तौर पर स्वायत्त रहेगी."
उन्होंने कहा, "आरबीआई को भी सहयोग करना चाहिए. यह दोतरफ़ा होना चाहिए."
सरकार की ओर से आरबीआई को नियंत्रित करने के लिए सेक्शन सात के इस्तेमाल की चिंताओं को अरविंद सुब्रमण्यम ने वैध बताया. उन्होंने कहा, "सेक्शन सात का हल्के में इस्तेमाल नहीं होना चाहिए. आरबीआई की स्वतंत्रता और स्वायत्तता को बाधित नहीं होने देना चाहिए."
वह कहते हैं कि आरबीआई की स्वतंत्रता सर्वोपरि है लेकिन स्वतंत्रता के साथ सहयोग भी होना चाहिए.














