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जब इस्मत चुग़ताई पर लगा कान्हा को चुराने का इल्ज़ाम
हमारे पड़ोस में एक लालाजी रहते थे. उनकी बेटी से मेरी दांत-काटी रोटी थी. एक उम्र तक बच्चों पर छूत की पाबंदी लाज़मी नहीं समझी जाती. सूशी हमारे यहां खाना भी खा लेती थी.
फल, दालमोट, बिस्कुट में इतनी छूत नहीं होती, लेकिन चूंकि हमें मालूम था कि सूशी गोश्त नहीं खाती इसलिए उसे धोखे से किसी तरह का गोश्त खिलाके बड़ा इत्मीनान होता था.
हालांकि उसे पता नहीं चलता था, मगर हमारा न जाने कौन-सा जज़्बा तसल्ली पा जाता था. वैसे दिन भर एक-दूसरे के घर में घुसे रहते थे मगर बक़रीद के दिन सूशी ताले में बंद कर दी जाती थी.
बकरे अहाते के पीछे टट्टी खड़ी करके काटे जाते. कई दिन तक गोश्त बंटता रहता. उन दिनों हमारे घर में लालाजी से नाता टूट जाता.
लालाजी के यहां बड़ी धूमधाम से जश्न मनाया जा रहा था. जन्माष्टमी थी. तक तरफ़ कड़ाह चढ़ रहे थे और धड़ाधड़ पकवान तले जा रहे थे. बाहर हम फ़क़ीरों की तरह खड़े हसरत से ताक रहे थे. मिठाइयों की होशरूबा (होश उड़ाने वाली) ख़ुशबू अपनी तरफ़ खींच रही थी.
सूशी ऐसे मौक़ों पर बड़ी मज़हबी बन जाया करती थी. वैसे तो हम दोनों एक ही अमरूद बारी-बारी दांत से काटकर खा चुके थे, मगर सबसे छिपकर.
"भागो यहां से," आते-जाते लोग हमें धुतकार जाते. हम फिर खिसक आते. फूले पेट की पूरियां तलते देखने का किस बच्चे को शौक़ नहीं होता है. "अंदर क्या है?" मैंने शोखी से पूछा. सामने का कमरा फूल-पत्तों से दुल्हन की तरह सजा हुआ था. अंदर से घंटियां बजने की आवाजें आ रही थीं.
जी में खुदबुद हो रही थी- हाय अल्ला, अंदर कौन है!
"वहां भगवान बिराजे हैं." सूशी ने ग़ुरूर से गरदन अकड़ाई.
"भगवान!" मुझे बेइंतहा एहसास-ए-कमतरी (हीनभाव) सताने लगा. उनके भगवान क्या मज़े से आते-जाते हैं. एक हमारे अल्ला मियां हैं, न जाने कहां छिपकर बैठे हैं. न जाने कौन-सी रग फड़की कि खिसक के मैं बरामदे में पहुंच गई.
घर के किसी व्यक्ति की नज़र न पड़ी. मेरे मुंह पर मेरा मज़हब तो लिखा नहीं था. उधर से एक देवीजी आरती की थाली लिए सबके माथे पर चंदन-चावल चिपकाती आईं. मेरे माथे पर भी लगाती गुज़र गईं. मैंने फ़ौरन हथेली से टीका छुटाना चाहा, फिर मेरी बदज़ाती आड़े आ गई.
सुनते थे, जहां टीका लगे उतना गोश्त जहन्नम में जाता है. ख़ैर मेरे पास गोश्त की कमी नहीं थी, इतना-सा गोश्त चला गया जहन्नम में तो कौन टोटा हो जाएगा.
नौकरों की सोहबत में बड़ी होशियारियां आ जाती हैं. माथे पर सर्टिफ़िकेट लिए, मैं मज़े से उस कमरे में घुस गई जहां भगवान बिराज रहे थे.
बचपन की आंखें कैसे सुहाने ख़्वाबों का जाल बुन लेती हैं. घी और लोबान की ख़ुशबू से कमरा महक रहा था. बीच कमरे में एक चांदी का पलना लटक रहा था. रेशम और गोटे के तकियों और गद्दों पर एक रूपहली बच्चा लेटा झूल रहा था.
क्या सुंदर और बारीक काम था! आंखें जैसे लहकते हुए दिये! ज़िद कर रहा है, मुझे गोदी में ले लो. हौले से मैंने बे-इख़्तियार उसे उठाकर सीने से लगा लिया.
एकदम जैसे तूफ़ान फट पड़ा और बच्चा चीख़ मारकर मेरी गोद से उछलकर गिर पड़ा. सूशी की नानी मां का मुंह फटा हुआ था. मानो उन्हें दौरा पड़ गया हो, जैसे मैंने रूपहली बच्चे को चूमकर उसके गले में तीर चुभो दिया हो.
चाचीजी ने झपटकर मेरा हाथ पकड़ा, भागती हुई आईं और दरवाज़े से बाहर मुझे मरी हुई छिपकली की तरह फेंक दिया. फ़ौरन मेरे घर शिकायत पहुंची कि मैं चांदी के भगवान की मूर्ति चुरा रही थी. अम्मां ने सर पीट लिया और फिर मुझे भी पीटा.
वह तो कहो, अपने लालाजी से ऐसे भाईचारे वाले थे; इससे भी मामूली हादसों पर आजकल आए-दिन ख़ूनख़राबे होते रहते हैं. मुझे समझाया गया कि बुतपरस्ती (मूर्तिपूजा) गुनाह है.
महमूद ग़ज़नवी बुतशिकन (मूर्ति तोड़ने वाला) था. मेरी ख़ाक समझ में न आया. मेरे दिल में उस वक़्त पूजा का एहसास भी पैदा न हुआ था. मैं पूजा नहीं कर रही थी, एक बच्चे को प्यार कर रही थी.....
इस बीच कई साल गुज़र गए
...बीए करने के बाद जायदाद के सिलसिले में एक बार फिर आगरा जाने का इत्तफ़ाक़ हुआ. मालूम हुआ, दूसरे दिन सूशी, मेरे बचपन की गुइयां की शादी है. सारे घर का बुलावा आया है. मुझे ताज्जुब हुआ कि लालाजी जैसे तंगख़याल, कट्टर इनसान से मेरे भाई का लेन-देन कैसे क़ायम है.
मैं ख़ुद तो तमाम बंधन तोड़कर एक ऐसे मुक़ाम पर पहुंच चुकी थी जहां इंसानियत ही अकेला ख़ुदा रह जाता है, मेरा और सूशी का क्या जोड़! सूशी फ़्रॉड है जिससे मां-बाप ने पल्ले बांधने का फ़ैसला कर लिया उसी को भगवान बनाने को तैयार हो गई.
मुझे वह जन्माष्टमी वाला दिन याद था, जिसके बाद आगरा छूट चुका था और हम लोग अलीगढ़ चले आए थे. लालाजी को पता चला तो झट से छोटे बेटे सुरेश को भेजा. मैंने टालना चाहा.
"शाम को आऊंगी."
"दीदी कहती है, बस दो घड़ी को आ जाओ. फिर रस्में शुरू हो जाएंगी तो बात न हो सकेगी." सुरेश पीछे पड़ गया. मैं गई तो सूशी हल्दी लगाए उसी कमरे में बैठी थी जहां एक दिन भगवान कृष्ण का झूला सजाया गया था.
जहां से मुझे बेइज़्ज़त करके निकाला गया था. जी चाहा उलटे क़दम वापस चली आऊं, मगर मुझे देखकर वह लपकी.
"कैसी है री चुन्नी," उसने मेरा प्यार का नाम लेकर पुकारा. बचपन के साथ यह नाम भी कहीं दूर छोड़ आई थी. अजीब सा लगा, जैसे वह मुझसे नहीं किसी और से मुख़ातिब हो रही थी. उसने हाथ पकड़कर मुझे अंदर घसीटा और कुंडी चढ़ा दी. बाहर नानी-मां बड़बड़ा रही थी-
"ऐसे समय हर कोई का आना-जाना ठीक नहीं."
वह देर तक भरी-भरी आंखों से मुझे देखती रही. मेरी झूठी मुस्कुराहट से उसने धोखा नहीं खाया. उसने शरारत से मुस्कुराहट दबाकर देखा, जैसे रूठे हुए बच्चे को देखते हैं.
"हाय राम, कितनी लंबी ताड़ की ताड़ हो गई." फिर उसने अलमारी खोली और मिठाई की थाली निकाली. मैं लड्डू हाथ में लेने लगी कि बाहर जाकर कूड़े पर फेंक दूंगी. जो हमसे छूत करे, हम उसका छुआ क्यों खाएं.
"ऊंहुक, मुंह खोल."
मैंने मजबूरन ज़रा-सा लड्डू कतर लिया. बाक़ी का बचा हुआ लड्डू सूशी ने मुंह में डाल लिया. तो वह भी नहीं भूली थी!
दीवार ने बांहें खोल दीं. देर तक हम सर जोड़े बचपन की सुहावनी हिमाक़ातों को याद करके हंसते रहे. चलते समय सूशी ने एक नन्हा-सा पीतल का घुटनों चलती भगवान कृष्ण की मूर्ति मेरी हथेली पर रख दी.
"ले चुड़ैल! अब तो तेरे कलेजे में ठंडक पड़ी."
मैं मुसलमान हूं, बुतपरस्ती गुनाह है. मगर देवमाला (पुराण) मेरे वतन का विरसा (धरोहर) है. इसमें सदियों का कल्चर और फ़लसफ़ा समाया हुआ है. ईमान अलहदा है, वतन की तहज़ीब अलहदा है.
इसमें मेरा बराबर का हिस्सा है जैसे उसकी मिट्टी, धूप और पानी में मेरा हिस्सा है. मैं होली पर रंग खेलूं, दीवाली पर दिये जलाऊं तो क्या मेरा ईमान हिल जाएगा? मेरा यक़ीन और शऊर क्या इतना बोदा है, इतना अधूरा है कि टुकड़े-टुकड़े हो जाएगा?
और मैंने तो पूजा की हदें पार कर लीं.
जब हिंदू-मुस्लिम फ़साद की मुल्क के किसी हिस्से से ख़बरें आती हैं तो मेरा क़लम मुंह चिढ़ाता है. और सूशी का खिलाया हुआ लड्डू हलक़ में ज़हरीला कांटों वाला गोला बनकर फटने लगता है.
तब मैं अलमारी में रखे हुए बालकृष्ण से पूछती हूं-
"क्या तुम वाक़ई किसी मनचले शायर का ख्वाब हो? क्या तुमने मेरी जन्मभूमि पर जन्म नहीं लिया? बस एक वहम, इक आरज़ू से ज़्यादा तुम्हारी हक़ीक़त नहीं. किसी मजबूर और बंधनों में जकड़ी हुई अबला की कल्पना की उड़ान हो कि तुम्हें रचने के बाद उसने ज़िंदगी का ज़हर हंस-हंसके पी लिया?"
मगर पीतल का भगवान मेरी हिमाक़त पर हंस भी नहीं सकता. सियासत की दुनिया का सबसे मुनाफ़ाबख़्श पेशा है, दुनिया का ख़ुदा है.
सियासत के मैदान में खाई हुई मात के स्याह धब्बे मासूमों के खून से धोए जाते हैं. ख़ुद को बेहतर साबित करने के लिए इनसानों को कुत्तों की तरह लड़ाया जाता है.
क्या एक दिन पीतल का यह खोल तोड़कर ख़ुदा बाहर निकल आएगा?
(इस्मत चुग़तई की आत्मकथा 'क़ाग़ज़ी है पैरहन' का एक संपादित अंश, उर्दू के कठिन शब्दों की जगह आसान हिंदुस्तानी का इस्तेमाल किया गया है. साभार--राजकमल प्रकाशन)
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