You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
अटल बिहारी वाजपेयी के पसंदीदा भोजन कौन से
- Author, पुष्पेश पंत
- पदनाम, बीबीसी हिंदी के लिए
बात कोई दो दशक पहले की है. आगरा में वाजपेयी-मुशर्रफ शिख़र वार्ता का आयोजन हुआ था. मेज़बान और मेहमान के खाने-पीने के बंदोबस्त का ज़िम्मा मेरे मित्र जिग्स कालरा को सौंपा गया था. मेनू बड़ी सावधानी से तैयार किया गया.
जिग्स ने मुझे ख़बरदार किया, "गुरू! वाजपेयी जी खाने के ज़बरदस्त शौक़ीन हैं- कुछ कसर न रह जाए. फिर मुल्क की इज़्ज़त का भी सवाल है. पाकिस्तानियों को नाज़ है अपनी लाहौर की खाऊ गली पर. हमें उन्हें यह जतलाना है कि सारा बेहतरीन खाना मुहाजिरों के साथ सरहद पार नहीं चला गया. इसके अलावा कुछ नुमाइश साझा विरासत की भी होनी चाहिए."
ख़ुशक़िस्मती यह थी कि पूर्व प्रधानमंत्री ने अपनी पसंद-नापसंद थोपने का हठ नहीं पाला. बस शर्त रखी कि खाने का ज़ायका नायाब होना चाहिए. इस बात का हमारी पूरी टीम को गर्व है कि जो भी तश्तरियाँ उस गुप्त वार्ता वाले कमरे में भेजी जातीं, वह ख़ाली लौटती थीं.
लाने ले-जाने वाले मज़ाक़ करते थे कि मुशर्रफ़ तो तनाव में लगते हैं पर पंडित जी निर्विकार भाव से संवाद को भी गतिशील रखते हैं और चबैना भी निबटा रहे हैं.
वाजपेयी जी का अच्छा खाने-पीने का शौक़ मशहूर था. वह कभी नहीं छिपाते थे कि वह मछली-माँस चाव से खाते हैं. शाकाहार को लेकर जरा भी हठधर्मी या कट्टरपंथी नहीं थे. दक्षिण दिल्ली में ग्रेटर कैलाश-2 में उनका प्रिय चीनी रेस्तराँ था जहाँ वह प्रधानमंत्री बनने से पहले अकसर दिख जाते थे.
पुराने भोपाल में मदीना के मालिक बड़े मियाँ फ़ख्र से बताते थे कि वह वाजपेयी जी का पसंदीदा मुर्ग़ मुसल्लम पैक करवा कर दिल्ली पहुंचवाया करते थे.
मिठाइयों के वह ग़ज़ब के शौक़ीन थे. उनके पुराने मित्र ठिठोली करते कि ठंडाई छानने के बाद भूख खुलना स्वाभाविक है और मीठा खाते रहने का मन करने लगता है.
बचपन और लड़कपन ग्वालियर में बिताने के बाद वह विद्यार्थी के रूप में कानपुर में रहे थे. भिंड मुरैना की गज्जक, जले खोए के पेड़े के साथ-साथ ठग्गू के लड्डू और बदनाम क़ुल्फ़ी का चस्का शायद तभी उनको लगा था.
कुछ और पुरानी बातें याद आती हैं. पचास साल पहले मैंने दिल्ली के रामजस कॉलेज में पढ़ाना शुरू किया था. हॉस्टल के वॉर्डन प्रोफ़ेसर कौल थे. उन्होंने मुझे छोटा भाई मान कर सस्नेह मेरा मार्गदर्शन किया. छात्रों के लिए वह और श्रीमती कौल वत्सल अभिभावक थे.
वाजपेयी जी कौल दंपति के पारिवारिक मित्र थे. जब वह उनके यहाँ होते तो किसी बड़े नेता की मुद्रा में नहीं होते. छात्रों के साथ अनौपचारिक तरीक़े से जो कुछ पकता, वे मिल-बाँट कर खाते-बतियाते और ठहाके लगाते. बाद में रामजस के तत्कालीन छात्र अशोक सैकिया और शक्ति सिंह आईएएस में उत्तीर्ण होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय में पहुँचे.
मॉरीशस से आये विजय सिंह माखन से वाजपेयी जी काफ़ी स्नेह रखते थे. उसके साथ उस द्वीप के प्रवासी भारतीय भोजन की चर्चा अकसर होती थी. मणिलाल त्रिपाठी ओडिशा से आये जो बाद में विदेश सेवा में नियुक्त हुए. उसके साथ छेनापूड को लेकर छेड़ चलती तो कभी-कभार कमला नगर के छोले भटूरों, पुरानी दिल्ली की चाट के चटकारे लिए जाते. हॉस्टल मेस के खाने की गुणवत्ता चखने से उन्हें परहेज़ नहीं था.
लखनऊ और बनारस से कोई पहुँचता तो वह खाने-पीने की कोई सौग़ात उनके लिए लाना न भूलता. जो कुछ हाथ लगता उसे मिल-बाँट कर खाने में ही उन्हें रस आता था. आज जब उनकी स्मृति शेष है तब यह कसक भी महसूस होती है कि आज खान-पान को लेकर कितनी आशंकाएँ हमें भयभीत कर रही हैं और कैसे अपनी बहुलवादी विरासत का क्षय हम चुपचाप देख रहे हैं.
ज़ुबान बंद रखने का वक़्त नहीं-आख़िर ज़ायका भी ज़ुबान पर ही चढ़ता है. हमारी भारतीय पहचान का अभिन्न अंग भाषाओं की विविधता नहीं बल्कि खान-पान की विविधता का सह-अस्तित्व है.
वाजपेयी जी का खाने पीने का शौक़ मेरी समझ में पेटू भोजन सरीखा नहीं था बल्कि संवेदनशील पारखी कला, रसिक वाला और हिंदुस्तान की समन्वयात्मक इंद्रधनुषी संस्कृति का प्रतिबिंबित था. सराहनीय और अनुकरणीय.
(लेखक जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय में अंतरराष्ट्रीय मामलों के प्रोफ़ेसर रहे हैं. इसके अलावा भारतीय खाने को लेकर उन्होंने कई किताबें लिखी हैं.)
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक, ट्विटर, इंस्टाग्राम और यूट्यूब पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)