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नज़रिया: अंकित के पिता ने मजहबी नफ़रत का तर्क ध्वस्त किया
- Author, हर्ष मंदर
- पदनाम, सामाजिक कार्यकर्ता
ये एक मोहब्बत और एक-दूसरे के प्रति विश्वास जाहिर करने वाली शाम थी. बीती तीन जून को बहुमंजिला इमारतों के बीच एक संकरी गली में हरे रंग की दरी बिछी हुई थी.
पश्चिमी दिल्ली के कम आय वर्ग वाले इलाके रघुवीर नगर में लगभग तीन सौ लोग जमा हुए.
इनमें दिल्ली के दूसरे इलाकों में रहने वाले लोग भी इस ख़ास कार्यक्रम के बारे में जानकर इसमें शामिल हुए और मुस्लिम धर्म को मानने वाले लोग भी रमज़ान के महीने में रखा जाने वाला व्रत रोज़ा तोड़ने के लिए शामिल हुए.
क्यों ख़ास थी ये इफ़्तार पार्टी?
इस कार्यक्रम के बारे में ऐसी तमाम बातें थीं जो इसे ख़ास बनाती थीं. इसमें गैर मुस्लिम लोगों का शामिल होना एक वजह थी. लेकिन इस कार्यक्रम को ख़ास बनाने वाली बात इस कार्यक्रम के आयोजक थे.
ये एक शर्मीले व्यक्ति थे जो कि कैमरों और पत्रकारों के जमावड़े से साफतौर पर असहज महसूस कर रहे थे. क्योंकि ये मीडियाकर्मी इस कार्यक्रम के बारे में उनकी प्रतिक्रिया जानने पहुंचे थे.
इस शख़्स का नाम यशपाल सक्सेना था. अब से ठीक चार महीने पहले उस जगह जहां हम इफ़्तार में शामिल हो रहे थे, वहां से कुछ चार सौ मीटर दूर यशपाल सक्सेना के बेटे का कत्ल कर दिया गया था.
एक 23 साल युवा फोटोग्राफ़र की हत्या के बाद दीवारों पर उनके हर धर्म के प्रतीकों के साथ वाली तस्वीरें देखी गई थीं. इन तस्वीरों में इस युवा व्यक्ति को पगड़ी, एक स्कल कैप और नंगे सर अलग-अलग धर्मों के उपासना स्थलों पर पूजा करते दिखाया गया था.
ये वो काम था जो कि इस युवक के दोस्तों का समूह, जिसे वे आवारा ब्वॉयज़ कहते हैं, करना पसंद करते थे. अंकित ने निश्चित ही अपने पिता द्वारा इफ़्तार पार्टी आयोजित करने के फ़ैसले का समर्थन किया होता.
मैं जब भी अंकित के पिता से मिलता हूं तो वह कहते हैं कि दिन हो या रात अंकित उनसे दूर नहीं है. हालांकि, 2 फरवरी, 2018 की यादें जब उन्होंने अपने बेटे को खो दिया, भुलाए नहीं भूलती हैं.
कैसा है अंकित के घरवालों का हाल
उस दिन किसी ने अंकित के घरवालों को फोन करके चिल्लाते हुए बताया कि उन्हें अपने बेटे को बचाने के लिए जल्दी घटनास्थल पर पहुंचना चाहिए. ये ख़बर मिलते ही अंकित का परिवार दौड़ते हुए हाइवे के किनारे के फुटपाथ पर पहुंचा.
जब वे वहां पहुंचे तो उन्होंने अंकित को मुस्लिम लड़की के घरवालों से घिरा हुआ पाया जो उसे पीट रहे थे. ये मुस्लिम परिवार कुछ साल पहले तक उनके पड़ोसी हुआ करते थे.
उन्हें तब तक ये नहीं पता था कि फोटोग्राफ़ी का शौक रखने वाला उनका बेटा एक मुस्लिम लड़की से प्यार करता है और दोनों एक दूसरे से शादी करना चाहते हैं.
अंकित और ये मुस्लिम लड़की बचपन से एक साथ बड़े हुए थे. जब लड़की का परिवार कुछ दूर जाकर रहने लगा तब भी दोनों ने एक दूसरे से मिलना जारी रखा. और एक समय में जाकर दोनों को एक दूसरे से इश्क हो गया.
अंकित ने अब तक इस बारे में अपने परिवार को नहीं बताया था लेकिन लड़की के परिवार वाले इस शादी के सख़्त ख़िलाफ़ थे.
उस दिन जब अंकित की हत्या कर दी गई, तब ठीक-ठीक क्या हुआ होगा, ये कहना मुश्किल है. लेकिन हमारे पास जितनी जानकारी है उसके हिसाब से दोनों माएं एक-दूसरे से झगड़ पड़ीं और अंकित की मां ज़मीन पर गिर पड़ीं.
कोई मदद करने नहीं आया
अंकित अपनी मां को ज़मीन से उठाने आगे बढ़ा लेकिन लड़की के परिवार से किसी ने चाकू से अंकित का गला रेत दिया.
अंकित के मां-बाप ने उसे खून से सराबोर होकर ज़मीन पर गिरते हुए देखा. उन्होंने अपने पड़ोसियों से उस लड़के को बचाने की गुहार लगाई जिसे उन्होंने हाफ पैंट पहनने वाले एक बच्चे से एक नौजवान में तब्दील होते देखा था. लेकिन किसी ने उनकी मदद नहीं की.
लेकिन आखिरकार एक इलेक्ट्रिक रिक्शा चालक रुका और वो उसे नज़दीकी अस्पताल लेकर गए. अंकित की मां ने खून रोकने के लिए उसके गले पर अपना दुपट्टा लपेटने की कोशिश की. लेकिन उनका हाथ सीधे अंकित के गले में चला गया.
जब अस्पताल में डॉक्टरों ने ये बताया कि अंकित मर चुका है तो अंकित के परिवार को भरोसा नहीं हुआ.
इसके बाद, कुछ राजनीतिक दलों ने इस अपराध को सांप्रदायिक नज़र से देखते हुए इस घटना को लोगों को मुस्लिम समुदाय के ख़िलाफ़ भड़काने के मौके के रूप में देखा.
राजनेताओं ने क्या किया?
अंग्रेजी न्यूज़ वेबसाइट से जुड़े गौरव विवेक भटनागर ने राजनेताओं के बयानों पर नज़र रखी जिससे इस हत्या को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की गई.
अंकित की हत्या के बाद सबसे पहला बयान बीजेपी-अकाली दल के विधायक मनजिंदर सिंह सिरसा का आया. उन्होंने ट्वीट किया, "कड़वा सच सामने है - सम्मान के नाम पर 23 साल के अंकित की अपनी दिल्ली में कथित 'अल्पसंख्यक और शोषित' धर्म ने कर दी है. अंकित जिस लड़की शहज़ादी से प्यार करता था उसने स्वीकार किया है कि उसके परिवार वालों ने अंकित की हत्या कर दी है."
दिल्ली बीजेपी के अध्यक्ष मनोज तिवारी पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे और दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल की 'चुप्पी' पर उनकी आलोचना की.
तिवारी ने दावा किया कि केजरीवाल को तब कोई परवाह नहीं होती है जब बहुसंख्यक समुदाय के परिवारवालों के ख़िलाफ़ अत्याचार किया जाता है.
इसके साथ ही उन्होंने मांग की कि अंकित के परिवार को एक करोड़ रुपये का मुआवज़ा दिया जाए.
इसके बाद मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल पीड़ित परिवार से मिलने पहुंचे और पांच लाख रुपये की मदद देने का वादा किया.
इस बीच बजरंग दल के लोगों ने आस पास के इलाकों में गश्त शुरू कर दी और मुस्लिम परिवारों को धमकाना शुरू कर दिया.
अपने बेटे को खोने के दर्द के बीच में भी यशपाल सक्सेना ने अपनी मानवीयता बचाए रखी.
सांप्रदायिक मुद्दा बनाने पर सवाल
अंग्रेजी पत्रिका कारवां के मुताबिक़, जब मनोज तिवारी यशपाल सक्सेना से मिलने पहुंचे तो अंकित के पिता ने उनसे और पत्रकारों से निवेदन किया कि उनके बेटे की हत्या को सांप्रदायिक मुद्दा न बनाया जाए.
पत्रिका ने यशपाल सक्सेना के हवाले से कहा, "मेरा एक बेटा था, अगर मुझे न्याय मिल जाता है तो ये बेहतर होगा, अगर ऐसा नहीं होता है तब भी मेरे मन में किसी समुदाय के ख़िलाफ़ नफरत का भाव नहीं है. मुझे समझ में नहीं आ रहा है कि मीडिया इसे इस तरह से क्यों दिखा रही है."
उस समय मैंने ये लिखा था, "यशपाल सक्सेना, जिनके इकलौते बेटे को एक मुस्लिम लड़की के परिवार ने जान से मार दिया, ने ये बताकर, कि उन्हें मुस्लिमों से कोई नफ़रत नहीं है, सांप्रदायिक नफ़रत पैदा होने के तर्क को ध्वस्त कर दिया है. व्यक्तिगत हानि के समय अपनी मानवता दिखाने का जो उदाहरण दिया है, उसके लिए राष्ट्र को उनके प्रति आभार दर्ज करना चाहिए. यशपाल सक्सेना ने उसे नकार दिया है जिसे मैं बदले के लिए किए जाने वाले अपराध का सिद्धांत कहता हूं."
ये वो विचार जिसके आधार पर एक समुदाय को अपने समुदाय के किसी एक व्यक्ति द्वारा असली, काल्पनिक, वर्तमान में या इतिहास में किए गए अपराध का पाप ढोना पड़ता है. इस सिद्धांत की वजह हिंसा को एक नैतिक तार्किकता मिलती है कि अपराधी का समुदाय सिर्फ एक पहचान साझा करने की वजह से दूसरे लोगों पर बदले के लिए हिंसा कर सकते हैं."
जब मैं और कारवां-ए-मोहब्बत की टीम यशपाल सक्सेना ने अपने पक्के विश्वास के साथ सरल शब्दों में हमसे बात की. सक्सेना के वन रूम फ्लैट के ऊपर एक मुस्लिम परिवार रहता है.
अंकित के परिवार का आभार
यशपाल सक्सेना ने हमें बताया कि जब से ये हादसा हुआ है तब से इस मुस्लिम परिवार ने एक हफ़्ते तक अपने घर की सीढ़ियां भी नहीं चढ़ी हैं.
इन लोगों ने दर्द के समय एक परिवार से ज़्यादा उनका ख़्याल रखा. यशपाल सक्सेना इस परिवार की महिला के बारे में कहते हैं, "वह तो मेरी बहन है, मैं कैसे उससे नफ़रत कर सकता हूं और मुझे उससे क्यों नफ़रत करनी चाहिए?"
अंकित इस परिवार का इकलौता लड़का था और अब बुढ़ापे में इनकी सहायता करने के लिए कोई नहीं है. बीजेपी से लेकर आम आदमी पार्टी अपने वादों पर खरी नहीं उतरी है. इस परिवार की सहायता करने के लिए दो क्राउड-फंडिंग अभियान शुरू किए गए हैं.
लेकिन आवारा ब्वॉयज़ अपनी मान्यताओं पर ख़रे उतरे हैं. अपने दोस्त की तस्वीर के साथ 'आवारा' शब्द छपी हुई टी-शर्ट्स पहने इन लड़कों ने लोगों को फल और शाकाहारी बिरयानी परोसी. इसके बाद किसी ने खड़े होकर रोज़ा करने की वजह बताई ताकि किसी भूख़े और प्यासे आदमी का दर्द समझा जा सके. इसके बाद ठीक सात बजकर सत्रह मिनट पर लोगों ने भाइचारे के साथ प्रार्थना की.
आपसी रंजिशों के इस दौर में यशपाल सक्सेना ने हम सभी के लिए एक मार्ग खोल दिया है.
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