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ब्लॉग: अंकित के घर से लौटकर दिमाग में कहानी नहीं, आंख में आंसू आते हैं
- Author, भूमिका राय
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
नहीं मालूम था कि जिस जगह पर मैं बैठकर उनसे बात कर रही थी, वहीं कभी अंकित बैठा करता था.
जो कुत्ता मेरे इर्द गिर्द मंडरा रहा था वो अंकित का 'बच्चा' (अंकित उसे बच्चा कहकर बुलाता) था. दिल्ली के रघुबीर नगर का वही अंकित जिसे एक लड़की से इश्क था.
और उस लड़की के पिता को दिन दहाड़े अंकित की गला रेत कर हत्या करने के आरोप में गिरफ़्तार किया गया है.
"तुझे मालूम है तू अंकित जैसी लगती है?" अपने बेटे की मौत देख चुके यशपाल सक्सेना ने मुझे देखकर ऐसा क्यों कहा होगा - मैं सोचने लगती हूँ.
वो अचानक मेरी कलाई पकड़ लेते हैं और लगभग खींचते हुए, इसरार करते हुए मुझे घर के अंदर ले जाते हैं. बिस्तरे पर अंकित की माँ मुँह छिपाए सोई हैं.
"सुनो, देखो ये लड़की अंकित जैसी लगती है."
रो-रोकर थक चुकी माँ अब इस अटपटे वाक्य को सुनकर भी नहीं चौंकती. उनके आसपास बैठी महिलाएँ इशारे से कहती हैं, 'उन्हें सोने दो'.
अंकित के घर पहुँचने पर मुझे कई चीज़ें असामान्य और अटपटी लगीं.
एक व्यक्ति जिसके जवान बेटे की हत्या कर दी गई हो वो मुस्कुरा रहा था. घर की सीढ़ियों से उतरते हुए अंकित के पिता के चेहरे पर फैली मुस्कान कितनी असामान्य सी थी.
'जल्दी-जल्दी पूछ ले क्या पूछना है'
मेरी आंखें उनकी पहचान कर चुकी थीं कि यही वो आदमी है जिनके बेटे की हत्या हुई है. लेकिन दिमाग मान नहीं पा रहा था. कैसे मान लेता?
जिसका बेटा मर गया हो वो हंस कैसे सकता है? मज़ाक कैसे कर सकता है? उसे तो रोना चाहिए न... अच्छा रो नहीं रहा तो कम से कम मज़ाक तो नहीं करना चाहिए.
मेरा दिमाग, उनके दिमाग को लेकर ख़्याल बुन रहा था.
थोड़ी देर बाद अंकित के पापा यशपाल सक्सेना ने कहा, "चल जल्दी-जल्दी पूछ ले क्या पूछना है. आजकल रोज़ तेरी तरह कोई न कोई आता है."
क़रीब 20 मिनट के इंटरव्यू के बाद हम लोग खड़े हो गए और आपस में बात करने लगे.
महिलाओं का इशारा पाकर हम अंकित के घर के बाहर आ चुके थे.
बाहर आकर अंकित के पापा ने मुझे ज़ोर से गले लगाया और कहा, "कसम खा, दोबारा आएगी, अंकित की तरह नहीं करेगी."
"तू बिल्कुल मेरे अंकित की तरह है. बिल्कुल वैसी. तू आएगी तो मम्मी जल्दी ठीक हो जाएगी. बोल आएगी न...? कसम खा..."
दिल टूट रहा था, आवाज़ गले में फंस रही थी लेकिन मैं फिर भी कसम खिलाती हूं.
मन को ऐतबार करने में आसानी हो जाती है कि जो वादा किया जा रहा है, सामने वाला उसे तोड़ेगा नहीं.
वो रो नहीं रहे थे और मैं रो नहीं सकती थी
बस उनसे इतना ही कहा, "मैं ज़रूर आऊंगी. आपमें बहुत हिम्मत है. अपना ख़्याल रखिएगा."
जहां सीढ़ियां ख़त्म होती हैं, वहां मुहल्ले वालों की भीड़ जमा हो गई थी. शायद आठ दिन में पहली बार ऐसा हो रहा था.
मैं और अंकित के पापा हाथ पकड़कर नीचे उतरे.
नीचे आकर अंकित के पापा ने उसके दोस्तों और मुहल्ले वालों से कहा, ये एकदम अंकित जैसी है न...
उन लोगों ने क्या जवाब दिया, क्या नहीं... ये तो नहीं पता लेकिन सब मुस्कुरा ज़रूर रहे थे.
उन्होंने कहा "देख, अंकित को राजमा-चावल बहुत पसंद थे. तू जब अगली बार आएगी तो तेरे लिए वही बनवाकर रखूंगा. खाने आएगी न...?"
साफ़ झलक रहा था कि बेयक़ीनी किस कदर हावी हो चुकी है.
जब क़िस्मत अचानक सब छीन ले तो यक़ीन मुश्किल से ही होता है.
थोड़ी देर बाद वो सामने रखे गद्दों पर बैठ गए.
फिर खुद ही बोलने लगे "मेरे अंकित को मेरे सामने मार दिया, तू आई तो लगा वो आ गया. ऐसे ही जब मैं बोलता था, तो वो सुनता था. जैसे तू खड़ी है, वैसे ही खड़ा होता था. अब मैं तेरा पापा हूं. मिलने आना."
वो मुझे हर उस चीज़ का वास्ता दे रहे थे जो अंकित से जुड़ी हुई थी.
"देख ये बच्चा (कुत्ता) भी सबको छोड़कर तेरे पास ही बैठा. कुत्ते पहचानते हैं. उसे भी तुझमें अंकित दिखा."
मैंने पास जाकर आख़िरी बार कहा, "मैं आऊंगी, अब चलती हूं."
वो शायद रोकने के लिए ही बोले - "चाय पीकर जा". हमने चाय तो नहीं पी लेकिन कुछ देर बस खड़े रहे.
उस पिता के दिल पर क्या बीत रही होगी...
वो एकटक सिर्फ देख रहे थे. अचानक बोले, "अब जा नहीं तो रात हो जाएगी. संभल के जाना."
फिर मुंह फेर लिया.
रात का वक़्त... संभलना... शायद उन्हें कुछ याद आ गया होगा.
नमस्ते करके हम भी लौटने लगे... गली के मोड़ पर पलटकर देखा, वो हमें जाते हुए देख रहे थे.
नहीं पता मैं उन्हें क्यों अंकित लगी? ये भी नहीं पता कि जो कुत्ता अंकित का दुलारा था, मेरे ही पास आकर क्यों बैठा? आत्मा-परमात्मा... कुछ नहीं पता लेकिन वहां से लौटते समय आंखें नम थीं.