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राष्ट्र मंच ने नहीं पेश किया ‘राष्ट्र बचाने’ का कोई कार्यक्रम
- Author, मनीष शांडिल्य
- पदनाम, पटना से, बीबीसी हिन्दी के लिए
अगले आम चुनाव अगर तय समय पर हुए तो चुनावी प्रक्रिया शुरू होने में अब एक साल से भी कम का समय रह गया है. ऐसे में भारतीय जनता पार्टी या यूं कहें कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ़ विपक्षी दलों को एकजुट करने की कोशिशें तेज़ हो रही हैं. पटना के श्रीकृष्ण मेमोरियल हॉल में आयोजित राष्ट्र मंच के कार्यक्रम में भी रविवार को एक ऐसी ही कोशिश की गई.
इस कार्यक्रम में विपक्ष के कई नेताओं ने जम कर केंद्र सरकार की आलोचना की. मंच से बार-बार दोहराया गया कि नरेंद्र मोदी सरकार के कार्यप्रणाली के कारण भारत में लोकतंत्र खतरे में है. लोकतंत्र की संस्थाएं खतरे में हैं.
कार्यक्रम में लोकतंत्र को बचाने और मजबूत करने की शपथ भी ली गई. लेकिन ऐसा करने के लिए भविष्य के उनके कार्यक्रम और योजनाएं क्या होंगी, इसका खाका सामने नहीं रखा गया. ऐसे में रविवार का राष्ट्र मंच का कार्यक्रम यशवंत सिन्हा के भाजपा छोड़ने के एलान का कार्यक्रम बन कर ज्यादा रह गया.
फ़ैसले की वजह
उन्होंने अपने फ़ैसले की मूल वजह ये बताई कि आज देश में लोकतंत्र खतरे में है. भाजपा छोड़ने की घोषणा ने ठीक पहले उन्होंने संसद, न्यायपालिका, चुनाव आयोग और मीडिया के काम करने के वर्तमान तरीकों का उदाहरण दिया और इसके जरिए यह बताया कि उनके मुताबिक देश में लोकतंत्र क्यूं ख़तरे में है.
जैसा कि उन्होंने कहा, ''संसद देश की सबसे बड़ी पंचायत है. इस पंचायत का सबसे महत्वपूर्ण काम यह जांच करना है कि सरकार को बहुमत है कि नहीं. लेकिन इस बात की जांच करने के लिए लोकसभा ने अविश्वास का प्रस्ताव नहीं स्वीकार किया. इस तरह संसद अपनी सबसे बड़ी जिम्मेदारी निभाने में फेल कर गई.''
यशवंत सिन्हा ने मंच से बहुत सारी दूसरी बातें भी कहीं, लेकिन मंच से या फिर कार्यक्रम के बाद पत्रकारों के पूछे जाने पर भी यह नहीं बताया कि राष्ट्र मंच की आगे की रणनीति क्या होगी, कार्यक्रम क्या होंगे.
राष्ट्र मंच की आगे की रणनीति
राष्ट्र मंच के कार्यक्रम की शुरुआत यशवंत सिन्हा के संबोधन से हुई तो समापन शत्रुघ्न सिन्हा के भाषण से हुआ. भाजपा के असंतुष्ट नेताओं में शुमार किए जाने वाले सांसद शत्रुघ्न सिन्हा ने भी केंद्र सरकार की आलोचना की, पार्टी में अपनी उपेक्षा का आरोप लगाया. लेकिन उन्होंने यशवंत सिन्हा की तरह कोई एलान नहीं किया और यह भी कहा कि वे कोई पार्टी विरोधी कार्रवाई नहीं कर रहे.
उन्होंने कहा, ''ये जो हम लोग यहां बैठे हैं ये कोई पार्टी विरोधी कार्रवाई नहीं हो रही है. ये देश के प्रति अपनी वफादारी है. ये देश से प्रेम दर्शाता है क्यूंकि हमें भी सिखाया गया है कि व्यक्ति से बड़ी पार्टी होती है और पार्टी से बड़ा देश. तो आप बताइए कि हम जो कर रहे हैं वो देशहित में है कि नहीं.''
इतना ही नहीं शत्रुघ्न ने रविवार को यह भी कहा कि वे पार्टी नहीं छोड़ने वाले, पार्टी अगर उन्हें छोड़ती है तो इसका स्वागत है.
'कुर्बानी के लिए तैयार रहें'
जानकारों का मानना है कि दरअसल शत्रुघ्न दो वजहों से पार्टी छोड़ने की जगह अपने ऊपर कार्रवाई किया जाना पसंद कर रहे हैं. पहला, इससे उन्हें 'शहीद' बन कर जनता के बीच जाने का मौका मिलेगा. दूसरा, इससे उनकी संसद की सदस्यता भी बच जाएगी.
दूसरी ओर कार्यक्रम में बिहार में विरोधी दल के नेता तेजस्वी यादव ने यह जरूर बताया कि भाजपा और आरएसएस को हटाते हुए देश बचाने के लिए क्या करने की जरूरत है.
उन्होंने कहा, ''सड़कों पर आकर आंदोलन करने की जरूरत है, लड़ाई लड़ने की जरूरत है. जरूरत पड़े तो कुर्बानी देने के लिए भी तैयार रहिए.''
लेकिन तेजस्वी ने भी यह नहीं बताया कि किन मुद्दों पर किस तरह और कब सड़क पर उतरा जाएगा. भाजपा विरोधी दलों का रविवार से भी बड़ा जुटान करीब आठ महीने पहले पटना के ही गांधी मैदान में राजद की 'भाजपा भगाओ-देश बचाओ' रैली में हुआ था. उस रैली में आज के मुकाबले कहीं ज्यादा दल और उनके सर्वोच्च नेता जुटे थे. लेकिन उस रैली के बाद भी विपक्ष का कोई संगठित और सुनियोजित स्वरूप अब तक सामने नहीं आया है.
जानकार बताते हैं कि भाजपा के ख़िलाफ़ लड़ाई में विपक्षी दलों की सबसे बड़ी समस्या भी यही है कि राष्ट्रीय स्तर पर न तो उनका कोई सर्वमान्य नेता है और न ही कोई स्पष्ट कार्यक्रम. जबकि उनका मुकाबला नरेंद्र मोदी जैसे नेता से है जो अपने दम पर बाजी जीतने का माद्दा रखते हैं और जिनके पीछे भाजपा और आरएसएस जैसा विशाल संगठन है.
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