You’re viewing a text-only version of this website that uses less data. View the main version of the website including all images and videos.
नज़रिया: 'शिवसेना-बीजेपी अलगाव का कांग्रेस को फ़ायदा'
हाल ही में शिवसेना ने घोषणा की कि वो 2019 का लोकसभा और महाराष्ट्र विधानसभा का चुनाव अकेले लड़ेगी. ये घोषणा इसलिए अहम है कि शिवसेना और भारतीय जनता पार्टी का साथ कई दशक पुराना है.
इसके बाद एक टीवी चैनल को दिए इंटरव्यू में महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा कि अकेले चुनाव लड़ने से शिवसेना बुरी तरह हारेगी.
क्या वजह है कि समान विचारधारा होने के बाद भी भारतीय जनता पार्टी और शिवसेना में मतभेद पैदा हो गए हैं?
इसी मुद्दे पर बीबीसी संवाददाता मोहम्मद शाहिद ने महाराष्ट्र के वरिष्ठ पत्रकार कुमार केतकर से बात की.
पढ़ें, कुमार केतकर का नज़रिया
विचारधारा के तौर पर जो साथ हैं, ऐसा आवश्यक नहीं है कि वो राजनीतिक रूप से भी साथ हों. इसका सबसे बड़ा उदाहरण वामपंथी पार्टियां हैं. सीपीआई और सीपीएम की विचारधारा लगभग एक जैसी है लेकिन दोनों राजनीतिक रूप से एक-दूसरे के ख़िलाफ़ हैं.
शिवसेना और बीजेपी का नाता सिर्फ़ हिंदुत्व से नहीं है बल्कि राजनीतिक भी है और राजनीति शक्ति का खेल है. शिवसेना को लगता है कि सत्ता की ताक़त होते हुए भी उनको उसमें कोई स्थान नहीं मिल रहा है.
शिवसेना को हमेशा अपमानित किया जाता है और ऐसा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह की ओर से होता है. शिवसेना को जो भी मंत्रालय दिए गए वो कम दर्जे के थे और उसका अंतिम फ़ैसला भी मुख्यमंत्री के हाथों में होता है. इस कारण उनका मंत्री पद पर रहना सिर्फ़ नाम के लिए है.
अमित शाह ने पहले से ही पार्टी को ये संकेत दिया हुआ है कि वो शिवसेना से नाता तोड़ दे और इमरजेंसी में उसका समर्थन शरद पवार की पार्टी एनसीपी कर सकती है.
अक्तूबर 2014 में विधानसभा चुनावों में शिवसेना-बीजेपी का गठबंधन टूट गया था और अमित शाह के आदेश की कॉपी एकनाथ खडसे ने प्रेस को बांट दी थी. वहीं, आधे घंटे के अंदर एनसीपी नेता प्रफुल्ल पटेल ने घोषणा की थी कि उनका कांग्रेस के साथ गठबंधन टूट गया है.
वास्तव में अमित शाह की प्रफुल्ल पटेल और शरद पवार से डील हो चुकी थी और ये सबको मालूम था. शिवसेना को यह समझ में आ रहा था कि बीजेपी उन्हें नहीं चाहती है. इसी कारण हटाने से अच्छा है कि उन्होंने पहले ही 2019 में अकेले चुनाव लड़ने का फ़ैसला ले लिया.
हालांकि, शिवसेना जानती है कि उसे और बीजेपी दोनों को नुकसान होना है क्योंकि मराठी और हिंदुत्व विचारधारा को मानने वाले वोटर बटेंगे. मराठी मानुष राज ठाकरे के एजेंडे में भी होगा. एक विचारधारा होते हुए भी बीजेपी-शिवसेना में शक्ति को लेकर लड़ाई है.
शिवसेना को कितना नुकसान?
ऐसा नहीं है कि जैसे महाराष्ट्र के मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस ने कहा है, वैसा ही हो. शिवसेना और बीजेपी दोनों ही बुरी तरीके से हार सकते हैं क्योंकि शिवसेना की ज़मीन मुंबई, ठाणे, पुणे और नाशिक जैसे चार शहरों में है.
किसी भी ग्रामीण क्षेत्र में बीजेपी और शिवसेना की पकड़ नहीं है. इन ग्रामीण इलाकों में कांग्रेस और एनसीपी मज़बूत है. इन दोनों के विभाजन का थोड़ा बहुत लाभ इन दोनों को होने वाला है.
शिवसेना को 2014 में जो सीटें मिलीं उसमें मोदी लहर भी थी. लेकिन विधानसभा चुनावों में बीजेपी और शिवसेना दोनों को बहुमत नहीं मिला. शिवसेना को लगता था कि मोदी और अमित शाह का जादू समाप्त हो गया है. दोनों को मालूम है कि वे अभी भी एक-दूसरे पर निर्भर हैं.
बीजेपी में उतना साहस नहीं
शिवसेना को लेकर जितना आत्मविश्वास बीजेपी दिखा रही है वास्तविकता में ऐसा नहीं है और गुजरात के चुनाव के बाद तो बिलकुल भी नहीं है. बीजेपी ये दिखाती है कि शिवसेना का साथ छोड़ने से उसे डर नहीं है.
गुजरात के ग्रामीण इलाकों में बीजेपी को मार पड़ी है और वही महाराष्ट्र में होने वाला है. ऐसा बिलकुल नहीं है लोग कांग्रेस या एनसीपी को चाहते हैं. हालांकि, इसमें विरोधी लहर काम करेगी. इस कारण बीजेपी मार खाने वाली है और शिवसेना के साथ होते हुए जो उनको फ़ायदा मिल रहा था वो भी नहीं मिलने वाला है.
बीजेपी और शिवसेना दोनों की सीटें काफी कम हो सकती हैं. इसका फ़ायदा कांग्रेस और एनसीपी को हो सकता है.
(बीबीसी हिन्दी के एंड्रॉएड ऐप के लिए आप यहां क्लिक कर सकते हैं. आप हमें फ़ेसबुक और ट्विटर पर फ़ॉलो भी कर सकते हैं.)