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जब हरिवंशराय बच्चन ने पहली बार किया था मधुशाला का पाठ
- Author, रेहान फ़ज़ल
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता
मार्च, 1968 का एक दिन था. तय हुआ कि धर्मवीर भारती के मुंबई के बोमनजी पेटिट रोड के सीतामहल फ़्लैट की टैरेस पर हरिवंशराय बच्चन कविता पाठ करेंगे.
चुनिंदा काव्यप्रेमियों को इकट्ठा किया गया. भारती बच्चन की पुस्तकों में से चुन-चुन कर कविताएं देते गए और बच्चन ने अपना छोटा-छोटा वक्तव्य देते हुए सस्वर उन कविताओं का पाठ किया.
धर्मवीर भारती की पत्नी पुष्पा भारती बताती हैं, "वो एक अद्भुत, न भुलाई जाने वाली शाम थी. खुली छत, अछोर फैला आसमान, मुंडेर पर खड़े हो जाएं तो सामने ब्रीच कैंडी का उछालें मारता समुद्र दिखाई देता था! ये शाम अद्भुत इसलिए भी थी कि इसमें अमिताभ भी आया था. अभी उसका इतना नाम तो नहीं हुआ था, लेकिन लोग पहचानने लगे थे."
वो कहती हैं, "वो थोड़ी देर तक तो सुनता रहा था. बाद में हमने देखा कि वो हाथ में क़ॉफ़ी का प्याला ले कर हमारी मुंडेर पर चला गया था और समुद्र देखता रहा था अपने में डूबा हुआ. वहीं हमने एक छोटा सा गद्दा बिछाया था. छोटी सी मेज़ भी लगा दी थी."
हरिवंश और तेजी का डुएट
पुष्पा भारती आगे बताती हैं, "बच्चनजी उस मेज़ के पास बैठे थे गावतकिया लगाए हुए. भारती बग़ल में उनके पास ज़मीन पर बैठे थे. उनकी किताबों की गड्डी अपने पास रख ली थी. उसमें चिटें लगा ली थीं कि उनसे क्या क्या फ़रमाइश करनी है. एक एक चिट उठाते जाते थे और बच्चनजी के आगे किताब कर देते थे. ऐसा कविता पाठ मैंने अपनी ज़िंदगी में कभी नहीं सुना. बच्चनजी ने भी कहा कि वो हज़ारों कवि सम्मेलनों में गए है, लेकिन ऐसा आनंद उन्हें भी कभी नहीं आया."
इसी तरह का मौका भारत के विदेश सचिव रहे महाराज कृष्ण रसगोत्रा को भी मिला था. उन दिनों वो नेपाल के भारतीय दूतावास में तैनात थे.
रसगोत्रा बताते हैं, "जब इलाहाबाद विश्वविद्यालय गर्मियों की छुट्टियों के लिए बंद हुआ तो बच्चन अपनी पत्नी तेजी और दोनों बच्चों अमिताभ और अजिताभ के साथ मेरे यहाँ काठमांडू रहने आए. छह हफ़्तों तक दोनों बच्चों ने मेरे घर को अपनी हंसी और मीठी शरारतों से भर दिया. एक दिन बच्चन ने मेरे घर पर आमंत्रित श्रोताओं के सामने रात भर अपनी रचना 'निशा निमंत्रण' का पाठ किया."
घुंघराले बालों और सेंसुअल होठों वाला कवि
महाराज कृष्ण रसगोत्रा कहते हैं, "पाठ रात 9 बजे शुरू हुआ और सुबह पौ फटने तक चला. उन दिनों मेरी शादी नहीं हुई थी. इसलिए पूरे प्रवास के दौरान तेजी ने मेरा घर संभाला. वो बहुत सुंदर महिला थीं. उनका भी अच्छा स्वर था. वो देखने लायक दृश्य होता था, जब पति-पत्नी मिलकर बच्चन की रचनाओं का 'डुएट' गाया करते थे."
हरिवंशराय बच्चन का ज़िक्र करते हुए उपेंद्रनाथ अश्क लिखते हैं, "सांवला दुबला चेहरा, गाल किंचित धंसे, जबड़े की हड्डियाँ भरी हुईं, मोटे सेंसुअल होंठ, चौड़ा माथा, लंबे काले घुंघराले बाल, चेहरे पर भावुकता, वेशभूषा में सुरुचि और सादगी, स्वभाव में साधारण सभ्य नागरिक की छाप, ये हैं हरिवंशराय बच्चन!"
पुष्पा भारती बताती हैं कि बच्चनजी से उनका पहली बार साबका तब पड़ा जब वो सिर्फ़ छह या सात साल की रही होंगी. उनके पिता हिंदी और अंग्रेज़ी के विद्वान थे और गवर्नमेंट इंटर कॉलेज में पढ़ाया करते थे.
जब बच्चन ने पहली बार मधुशाला का पाठ किया
पुष्पा भारती कहती हैं कि वो कवि सम्मेलनों का आयोजन करते थे जिसमें अक्सर बच्चनजी को बुलाया जाता था. वो मंच के पीछे कंबल ले कर बैठ जाती थीं और कवियों को सुनते सुनते उन्हें नींद आ जाया करती थी. लेकिन सोने से पहले वो अपने पिता से कहती थीं कि जब बच्चनजी मंच पर आएं तो उन्हें जगा दे. सबसे ज़्यादा वाहवाही हरिवंशराज बच्चन को ही मिलती थी.
वो बताती हैं कि कई बार उन्होंने बच्चन को सुनते सुनते सुबह होते हुए देखी है. अजित कुमार की किताब 'बच्चन निकट से' में पंडित नरेंद्र शर्मा ने उस दिन का ज़िक्र किया है जब बच्चन ने पहली बार मधुशाला को मंच पर गाया था.
वो कहती हैं, "मुझे मधुशाला का अत्यंत अनौपचारिक और भव्य उद्घाटन समारोह देखने का मौका मिला. वो आजकल जैसा कोई ग्रंथ विमोचन नहीं था. वो था एक कवि सम्मेलन बनारस के हिंदू विश्वविद्यालय में. हॉल खचाखच भरा था. विद्यार्थी कई आमंत्रित कवियों को उखाड़ चुके थे."
निराला और पंत की कुश्ती
पुष्पा भारती ने बताया, "बच्चन तब बनारस में अनजाने कवि थे. जैसे ही उन्होंने मधुशाला का पाठ आरंभ किया, श्रोताओं पर एकबारगी निस्तब्धता छा गई. कुछ देर के लिए लोग सांस लेना भी भूल गए और फिर प्रशंसा का बाँध एकाएक टूट पड़ा. तालियों की गड़गड़ाहट और वाह वाह के शोर से पूरा हॉल गूंज उठा."
इलाहाबाद के दिनों में हरिवंशराय बच्चन की सबसे अधिक निकटता शमशेर बहादुर सिंह, पंडित नरेंद्र शर्मा, सर्वेश्वर दयाल सक्सेना और सुमित्रानंदन पंत के साथ हुआ करती थी.
अपनी आत्मकथा "नीड़ का निर्माण फिर" में बच्चन पंत और निराला का एक दिलचस्प किस्सा लिखते हैं, "पंत और निराला एक दूसरे के कितने एलर्जिक थे, उसका अनुभव मुझे पहली बार इलाहाबाद में ही हुआ."
वो लिखते हैं, "निरालाजी उन दिनों पहलवानी मुद्रा में रहते थे, पांव में पंजाबी जूता, कमर में तहमद, बदन पर लंबा ढीला कुर्ता और सिर पर पतली साफ़ी. कहीं अखाड़े में लोट कर चेहरे और मुंडे सिर पर मिट्टी भी पोत आते थे."
वो चाय प्रकरण
बच्चन आगे लिखते हैं, "एक दिन तो निरालाजी मेरे ड्राइंग रूम में आ धमके और उन्होंने पंतजी को कुश्ती के लिए ललकारा. वो बोले, "मैं निराला नहीं हूँ. मुत्तन ख़ाँ हूँ, टुट्टन ख़ाँ का बेटा."
बच्चन ने लिखा, "बोलते बोलते निराला ने अपने सारे कपड़े उतार दिए और अपनी साफ़ी को कमर में लंगोट के तौर पर लपेट लिया. फिर वो दंड बैठक कर ताल ठोंकने लगे. जब उन्हें पंतजी से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली तो निराला ने मेरी तरफ़ देख कर कहा, "वो नहीं तो तुम सही!" मैंने कहा, "मैं आप का पैर छूने लायक भी नहीं हूँ, कुश्ती क्या लड़ूंगा आप से!"
इस पर निराला थोड़े ठंडे हुए. मैंने कहा, "आपके लिए चाय बनवाई जाए." निराला बोले, "मुझे चाय के लिए तो बुलाया नहीं गया. हाँ पानी ज़रूर पी सकता हूँ. पीतल के गिलास में पानी मंगवाओ!"
पानी आते ही उन्होंने उसके कुछ घूंट लिए और फिर घर से बाहर चले गए. अमृतलाल नागर इस घटना के चश्मदीद गवाह हैं."
दो झंडों की कहानी
इलाहाबाद विश्वविद्यालय में अंग्रेज़ी पढ़ाने और कैंब्रिज में मशहूर अंग्रेज़ी कवि डब्ल्यू येट्स पर शोध करने से पहले हरिवंशराय बच्चन की गिनती हिंदी के उभरते हुए कवियों में होने लगी थी.
बच्चन के बड़े बेटे अमिताभ बच्चन ने बीबीसी से बात करते हुए हरिवंशजी के रचना संसार की एक झलक दी थी.
उन्होंने बताया, "जब डैड लिखने के मूड में होते थे तो बाहरी दुनिया से बिल्कुल कट से जाया करते थे. घर में क्या हो रहा है, कौन आ रहा है, कौन जा रहा है, इस बारे में वो कभी नहीं सोचते थे और हमलोग समझ जाते थे कि उनका अब लिखने का मूड हो चला है, इसलिए हमें उन्हें डिस्टर्ब नहीं करना चाहिए."
वो कहते हैं, "दिल्ली में तो वो अपने कमरे को अंदर से बंद कर लेते थे और बाहर दो झंडेनुमा चीज़ें लटका देते थे. अगर एक झंडा लटका हो तो इसका मतलब होता था कि अंदर आना-जाना हो सकता है, अगर बहुत ज़रूरी हो. लेकिन दो झंडे लटके हों तो इसका मतलब होता था कि उन्हें कोई भी डिस्टर्ब नहीं कर सकता. एक चीज़ अद्भुत मैंने उनमें ये देखी कि जब वो बैठे-बैठे थक जाते थे तो खड़े हो कर लिखते थे."
अनुशासनप्रिय बच्चन
अमिताभ आगे कहते हैं, "मुझे याद है डैड साइकिल से यूनिवर्सिटी जाते थे. होली में वो अडेल्फ़ी में हमारे लॉन में अपने विद्यार्थियों के साथ होली खेलते थे. जब वो कैंब्रिज में थे तो मैंने उनको वहाँ से एक एयर गन लाने के लिए लिखा था और वो मेरे लिए ले कर आए थे. कई दिनों तक वो मेरा एक 'प्राइज़्ड पज़ेशन' हुआ करता था."
"मैंने डैड को हमेशा एक बहुत ही कड़ा 'डिसिप्लीनेरियन' पाया. वो हमसे बहुत कम बातें करते थे. हम लोग उनसे बहुत डरते थे और कभी भी बेवक्त घर से बाहर आना या जाना हो तो यही डर रहता था कि उस बरामदे को पार कर जाना होगा, जहाँ वो बैठे होते थे."
अमिताभ का हाफ़ टिकट
हरिवंशराय बच्चन ने भी अपनी आत्मकथा में अमिताभ का कई जगह ज़िक्र किया है.
"दशद्वार से सोपान तक" में वो लिखते हैं, "अमिताभ जन्म के समय ही 9 पाउंड का था. बढ़ने लगा तो तेज़ी से. दो बरस की उम्र में चार का लगता. उस ज़माने में हमें बहुत सफ़र करना पड़ता था. इलाहाबाद से लाहौर, लायलपुर और कराची."
आगे वो लिखते हैं, "उस समय रेलवे में क़ायदा था कि चार साल की उम्र के बच्चों का टिकट नहीं लगता था. हम अमित का टिकट नहीं खरीदते थे और टिकट चेकर से हमें प्राय: बहस करनी पड़ती थी. वो अमित को चार से ऊपर का बताते और हम क़समें खाते कि बच्चा चार से कम है. बाद में तो इस झगड़े से बचने के लिए अमित का आधा टिकट लेने लगे थे, हाँलाकि उसकी उम्र चार से कम थी."
बेबाक आत्मकथा
कवि बच्चन ने 'मधुशाला' के बराबर ही नाम कमाया चार खंडों में अपनी आत्मकथा लिख कर.
धर्मवीर भारती ने एक बार कहा था कि हिंदी के हज़ार वर्षों के इतिहास में अपने बारे में सब कुछ इतनी बेबाकी और साहस से पहले कभी नहीं कहा गया.
पुष्पा भारती कहती हैं, "अगर मुझसे कहा जाए कि अपनी पसंद की तीन किताबों के नाम लो, तो मैं पहली किताब बच्चन की 'क्या भूलूँ , कया याद करूँ' रखूंगी. ये सिर्फ़ आत्मकथा नहीं है, ये उस समय का भारत है, उस समय के मानव मूल्य हैं. आदमियों के बीच में रिश्ते कैसे होते थे, ये सारी चीज़ें हमें उनकी इस आत्मकथा से समझ में आती है. इसके अलावा वो अपने जीवन की जो बातें बताते हैं, इतनी सीधी और सच्ची कि हम एक-एक दृश्य देखते हुए चलते हैं."
कलम चुराने से कोई संकोच नहीं
हरिवंशराय बच्चन को तरह-तरह की कलमें जमा करने का शौक था और अपने इस शौक को पूरा करने के लिए वो किसी भी हद तक जा सकते थे.
बच्चन अपनी आत्मकथा 'दशद्वार से सोपान' तक में लिखते हैं, "हर कलम का अपना व्यक्तित्व होता है. किसी कलम से कविता अच्छी लिखी जा सकती है, किसी कलम से गद्य. कोई कलम प्रेम पत्र लिखने के लिए अच्छा होता है, तो कोई अंग्रेज़ी लिखने के लिए. कोई नीली स्याही के उपयुक्त, कोई काली के, कोई ज़्यादा लिखने के लिए, तो कोई सिर्फ़ हस्ताक्षर करने के लिए!"
मन में ललक उठती है...
बच्चन लिखते हैं, "मेरे पास एक ऐसा कलम है जिसमें छोटा बल्ब लगा है. लिखते-लिखते अगर बिजली चली जाए तो आप स्विच दबाइए, बल्ब जल उठेगा. मेरी टेबल पर 10-12 तरह का कलम रहता है. मैं समय समय पर इनकी सफ़ाई भी करता हूँ और उनकी डॉक्टरी भी."
उन्होंने आगे लिखा, "कोई अच्छा कलम देख कर उसे किसी न किसी तरह हथियाने की मेरे मन में ललक उठती है. मोल और मांगे से न मिले, तो चुराने में भी संकोच न करूंगा! मेरे बेटे जब विदेश जाते हैं तो पूछते हैं, "आपके लिए क्या लाएं?" मैं कहता हूँ, कोई नए तरह का कलम निकला हो, तो ले आना और वो ले आते हैं. मेरे पास कलमों का अच्छा भंडार है और मैं उसे कंजूस के धन की तरह सेता हूँ."
जब अमिताभ ने पहली बार चूड़ीदार पाजामा पहना
1976 में हरिवंशराय बच्चन को भारत के तीसरे सबसे बड़े नागरिक सम्मान पद्मभूषण से सम्मानित किया गया. इस समय एक दिलचस्प घटना घटी.
बच्चन अपनी आत्मकथा में लिखते हैं, "पद्मभूषण अलंकरण समारोह देखने के लिए मैं अपने परिवार के दो सदस्यों को ला सकता था. अमिताभ और अजिताभ दोनों ने चलने की इच्छा प्रकट की. अमिताभ ने तय किया कि हम तीनों बंद गले का सूट पहन कर वहाँ जाएं. दर्ज़ी बुला कर तीनों के लिए काले सूट सिलने का ऑर्डर दे दिया गया और सूट सिल कर आ भी गए. हमें जिस दिन बंबई से आना था, उसी दिन रमू की तबीयत ख़राब हो गई, इसलिए अजिताभ ने बंबई में ही रुकना ठीक समझा."
बच्चन आगे लिखते हैं, "जब समारोह में जाने का वक्त था तो मैं अपना सूट पहन कर शीशे के सामने खड़ा हुआ. अमिताभ ने जब अपनी सूट पहनी तो वो छोटा पड़ गया. सब आश्चर्यचकित!"
वो लिखते हैं, "हुआ ये था कि हमारी पैकिंग जया ने की थी. वो थोड़ी लापरवाह है. सूट सब काले एक तरह के थे. उसने मेरा सूट तो ठीक रखा था, लेकिन अमिताभ के सूट की जगह अजिताभ का सूट रख दिया था. अमिताभ के पास दूसरे कपड़े नहीं थे. वो जया पर बहुत बिगड़े. लेकिन बिगड़ने से उस समय क्या हासिल होना था. उन्हें एक बात सूझी. उन्होंने राजीव गांधी को फ़ोन किया और उनका एक चूड़ीदार पाजामा, कुर्ता और शॉल मंगाई. शायद पहली बार उन्होंने ये पोशाक पहनी. वो भी उन पर ख़ूब फबी. अलंकरण समारोह के बाद स्वागत समारोह के दौरान राजीव अमिताभ को छेड़ते रहे, "कह दूँ सबसे कि ये शॉल मेरी है!"
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