राहुल को कुर्सी सौंपने की इतनी हड़बड़ी क्यों?

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राहुल गांधी जल्दी ही कांग्रेस के अध्यक्ष बन सकते हैं. हालांकि अभी पार्टी के अध्यक्ष पद पर चुनाव बाक़ी है लेकिन माना जा रहा है कि राहुल के नाम पर मुहर लगना तय है.
कांग्रेस पर हमेशा नेहरू-गांधी परिवार का वर्चस्व रहा है इसलिए इस ख़बर से किसी को हैरानी नहीं हो रही लेकिन ऐन गुजरात चुनाव के दौरान राहुल गांधी को कुर्सी सौंपनी की इतनी हड़बड़ी क्यों दिखाई जा रही है, ये सवाल सबके मन में उठ रहा है.
बीबीसी के संवाददाता वात्सल्य राय ने इस मामले पर वरिष्ठ पत्रकार रामकृपाल सिंह से बातचीत की और उनसे पूछा कि आख़िर कांग्रेस में चल क्या रहा है. पढ़िए, उनका आकलन, उन्हीं के शब्दों में -

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सिर्फ़ बीजेपी राहुल को नेता मान रही है
''देखिए, डीफ़ैक्टो तो राहुल गांधी थे ही, आज से नहीं, मनमोहन सिंह के समय से रहे हैं.
अब विधिवत हो जाने से यह होगा कि थोड़ा फ़र्क आएगा, क्योंकि सोनिया जी के वफ़ादार दूसरे लोग रहे हैं. जब भी नई पीढ़ी आती है तो अपने हिसाब से सलाहकार चुनती है, तो वो बदलाव आएगा.
लेकिन कांग्रेस में आज भी ऐसी स्थिति में है कि राहुल गांधी के अलावा कोई विकल्प भी नहीं था.
कांग्रेस में हमेशा से ये रहा है कि अगर गांधी परिवार से कोई है तो ठीक है, वह मान्य है, वरना हर कोई सोचता है कि मैं क्यों नहीं?
ईमानदारी से देखें तो राहुल गांधी को अभी भी नेता सिर्फ़ बीजेपी ही मान रही है. वरना और किसी ने तो अब तक कहा नहीं कि 2019 के लिए राहुल गांधी हमारे नेता होंगे, न मुलायम सिंह ने, न मायावती ने और न लालू ने.

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इतनी जल्दी क्या थी?
मुक्तिबोध की एक लाइन है - सारी गड़बड़ियां इसलिए होती हैं कि ग़लत समय पर झगड़ा करते हैं और ग़लत समय पर झुक जाते हैं.
मुझे कांग्रेस की टाइमिंग समझ नहीं आती, जब गुजरात चुनाव सर पर हैं तो इतनी जल्दी क्यों थी? इसके नतीजे आ लेने देते.
अगर आप जीतते तो श्रेय लेते. नहीं हो पाता तो कहते कि हम एक नई रणनीति के साथ आएंगे.
राहुल ने सारी ताक़त गुजरात में झोंक रखी है. ऐन ऐसे मौक़े पर जब गुजरात में वोट पड़ने जा रहे हैं और तब ऐसा क्या हो रहा है कि यह फ़ैसला लिया जा रहा है, ये मेरी समझ से परे है.
हालांकि कांग्रेस किसे अध्यक्ष बनाती है, किसे नहीं, ये कांग्रेस का अंदरूनी मामला है. इस पर बीजेपी को कुछ नहीं कहना चाहिए.

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बीजेपी को सिर्फ़ कांग्रेस से ख़तरा
बीजेपी को यह समझने की ज़रूरत है कि हिंदुस्तान में अगर कोई विपक्ष चल सकता है तो सिर्फ़ कांग्रेस की छतरी के नीचे ही चल सकता है.
कभी भी देख लीजिए, नरसिम्हा राव से लेकर मनमोहन सिंह तक, कभी भी पूर्ण बहुमत वाली सरकार तो थी नहीं. लंगड़ी सरकार थी लेकिन फिर भी कांग्रेस की छतरी के नीचे चलती रही.
क्षेत्रीय पार्टी की छतरी के नीचे बनने वाली सरकार कभी पांच साल पूरे नहीं करती.
इसलिए बीजेपी को डर क्षेत्रीय पार्टी से नहीं है. लेकिन अगर 2004 की तरह कांग्रेस आ गई तो फिर समझिए वो लंबा दौर खेल लेगी.

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बहुत कमज़ोर हाल में है कांग्रेस
बीजेपी की रणनीति है कि कांग्रेस पर हमला करना जारी रखो और कांग्रेस को इतना कमज़ोर करो कि कांग्रेस इस लायक न रहे कि अपनी छतरी के नीचे बाक़ी पार्टियों को गोलबंद कर सके.
और आज कांग्रेस की क़मोबेश वही स्थिति हो भी गई है. पश्चिम बंगाल, बिहार से लेकर यहां तक, कहीं भी कांग्रेस इस स्थिति में नहीं है कि कह सके कि आप हमारे साथ आ जाइए. तमाम राज्यों में वो तीसरे या चौथे नंबर की पार्टी है.












