गुर्जर आरक्षणः राजस्थान सरकार सुप्रीम कोर्ट में

    • Author, नारायण बारेठ
    • पदनाम, जयपुर से, बीबीसी हिंदी के लिए

क़ानूनी उलझनों में फंसे गुर्जर समुदाय सहित कुछ अन्य जातियों के आरक्षण का रास्ता खोलने के लिए अब राजस्थान सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की है.

इस पर सोमवार को सुनवाई की उम्मीद है. राजस्थान हाईकोर्ट ने बीते 9 नवंबर को गुर्जर आरक्षण विधेयक पर रोक लगा दी थी. राजस्थान विधानसभा ने 26 अक्तूबर को ही यह विधेयक पारित किया था. इस विधेयक के बाद राजस्थान में कुल आरक्षण 54 फ़ीसदी हो गया था.

इसे एक नागरिक ने यह कह कर चुनौती दी कि सरकार का यह कदम, उच्चतम न्यायालय के इंदिरा साहनी मामले में दिए गए निर्णय का उल्लंघन करता है. पिछले नौ सालों में ये चौथा मौका है जब गुर्जर और कुछ अन्य जातियों के आरक्षण की पहल अदालत की देहरी तक जाकर रुक गई.

क़ानूनी पेंच

याचिकाकर्ता गंगासहाय ने अदालत से कहा कि राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट के फैसले के ख़िलाफ़ जाकर इस क़ानून को बनाया. राज्य के महाधिवक्ता एनएम लोढ़ा ने अपनी दलीलों से अदालत को संतुष्ट करने का प्रयास किया.

मगर अदालत ने कहा कि जब पहले ही यह मामला सुप्रीम कोर्ट में जा चुका है और इस बारे में तीन बार अदालत अपना रुख़ स्पष्ट कर चुकी है, ऐसे में इसकी ज़रूरत नहीं थी. इसके पहले 2015 में भी सरकार ने क़ानून बना कर इन जातियों को आरक्षण का लाभ देने का प्रयास किया था. लेकिन हाईकोर्ट ने इसे भी रद्द कर दिया था.

आरक्षण का लाभ

राजस्थान में अभी पिछड़े वर्ग की 21 जनजातियों के लिए 12 और अनुसूचित जन जातियों के लिए 16 प्रतिशत आरक्षण का प्रावधान है. राज्य विधानसभा ने पिछले महीने गुर्जर सहित तीन अन्य जातियों के लिए 5 प्रतिशत आरक्षण देने का क़ानून बनाया.

इसके तहत पिछड़ा वर्ग के आरक्षण को बढ़ाकर 21 से 26 प्रतिशत कर दिया गया. सरकार के इस कदम से राजस्थान में कुल आरक्षण 54 फीसदी हो गया. इसके पहले भी जब इस तरह के क़ानून बनाकर इन जातियों को आरक्षण का लाभ देने की कोशिश की गई, हाईकोर्ट ने रोक लगा दी.

अदालत की कसौटी

विधानसभा ने जब इस तरह के क़ानूनी उपाय किए, तभी गुर्जर समाज के नेताओं ने इस पर सवाल उठाए थे. मगर बीजेपी सरकार ने यह कहकर भरोसा दिलाने की कोशिश की कि इस बार आरक्षण की पुख़्ता क़ानूनी व्यवस्था की गई है.

उस वक्त राज्य के सामाजिक न्याय मंत्री अरुण चतुर्वेदी ने कहा था कि संवैधानिक स्थिति को ध्यान में रख कर ही इस क़ानून को बनाया गया है. मगर ये क़ानून पहले की ही तरह अदालत में कसौटी पर ख़रा नहीं उतरा.

गुर्जर आंदोलन

राजस्थान में कोई एक दशक पहले गुर्जर जनजाति वर्ग का दर्जा मांगते हुए सड़कों पर निकल आए और आंदोलन शुरू कर दिया. पर इस आंदोलन का कोई नतीजा नहीं निकला तो गुर्जर फिर जमा हुए और कई स्थानों पर राजमार्गों पर जाम कर दिया.

कई बार दिल्ली मुंबई रेल मार्ग भी बाधित हुआ और आंदोलन के दौरान हिंसा में 70 लोगों की जान चली गई. राज्य सरकार ने इसका कोई रास्ता निकालने के लिए हाई कोर्ट के सेवानिवृत न्यायाधीश जसराज चोपड़ा के नेतृत्व में एक आयोग भी गठित किया.

सामाजिक शैक्षणिक स्थिति

आयोग ने गुर्जर समाज और कुछ अन्य जातियों की सामाजिक शैक्षणिक स्थिति का अध्ययन किया और अपनी रिपोर्ट सरकार को सौंपी. लेकिन ये रिपोर्ट भी आरक्षण के मामले में गुर्जर समुदाय की कोई मदद नहीं कर सकी. बीच बीच में गुर्जर समुदाय के नेता पिछड़ा वर्ग आरक्षण के भीतर ही उनके लिए कोटा तय करने की मांग करते रहे.

मगर ऐसा करना भी आसान नहीं है. क्योंकि इस पर पहले से ही पिछड़ा वर्ग में शामिल कुछ जातियों को गहरी आपत्ति रही है. अब आंदोलनकारी नेता अगर मुड़ कर देखते हैं तो आरक्षण के मामले में वे खुद को वहीं खड़ा पाते हैं जहाँ वे एक दशक पहले थे.

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