ब्लॉग: आज की सीता क्या चाहती है?

सीता

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    • Author, दिव्या आर्य
    • पदनाम, बीबीसी संवाददाता

मेरी सहेली का नाम सीता है और ये नाम ही उसका क़ैदख़ाना है.

मैं ही नहीं, लगभग उसके सब जानने वाले, उसे हर व़क्त उन गुणों की याद दिलाते हैं जिनके मुताबिक़ उसे जीना चाहिए.

दूधवाला, जो सोचता है कि सुबह सीता का चेहरा देख ले तो उसे पुण्य मिलेगा, उसके मां-बाप जो हमेशा उसके आने-जाने की ख़बर रखते हुए परेशान रहते हैं, से लेकर उसके साथ काम करने वाले लोग जो हर मर्द से उसकी बातचीत को शक़ की निगाह से देखते हैं.

फ़र्क इतना है कि मैं ये तुलना हंसी-मज़ाक में करती हूं और बाकी सब संजीदगी से इसे अपना कर्तव्य समझते हैं.

कुछ मायनों में वो सही भी हैं. पौराणिक कथाएं बहुत अहम हैं क्योंकि वो हमें हमारी धरोहर और इतिहास का रस देकर उनका हिस्सा बनने का मौका देती हैं.

हम कहां से आए हैं, आदर्श क्या है और हमें क्या होना चाहिए, ये सब समझाती हैं.

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बलिदानी, आज्ञाकारी और पतिव्रता

ईमानदारी से कहूं तो ऐसा नहीं है कि मेरी सीता, राम की सीता को बिल्कुल नापसंद करती है या उनके फ़ैसलों के आकलन पर उसने कोई विपरीत राय क़ायम की है.

वो तो उनसे इत्तेफ़ाक रखती है, बस नज़रिया अलग है.

उसने अपनी पीढ़ी के ज़्यादातर लोगों की ही तरह रामायण नहीं पढ़ी है, लेकिन उस पर आधारित सीरियल ज़रूर देखा है.

और उसमें उसने जो औरत देखी वो मज़बूत सिद्धांत वाली थी, अपनी बात पर अडिग रहने वाली और हर चुनौती का सामना करते हुए अपने बेटों को अकेले बड़ा करने वाली.

पर लोगों की याद्दाश्त में सीता बलिदानी, आज्ञाकारी और पतिव्रता होने के लिए आदर्श मानी जाती है.

मेरी सीता इन सबसे जकड़ी नहीं जाना चाहती.

वो नहीं चाहती कि स्वंयवर में उसे चुना जाए, उसे पीछे चलना पड़े, ये माना जाए कि उससे आसानी से छल किया जा सकता है और उसका ध्यान रखा जाए.

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सीता की आज़ादी

और सती-सावित्री बनने के बारे में उसका मन अभी अपना मन बना ही रहा है.

जैसे जब उसे प्यार हुआ.

वो शांत स्वभाव का शर्मीला आदमी है. एक कलाकार जिसके मन में हर व़क्त नई सोच कुलांचे मारती रहती हैं, पर जेब अक़्सर ख़ाली रहती है.

उसे वो इसीलिए पसंद है कि वो आदर्श नहीं है.

उसके स्वभाव में मर्दानगी का झूठा चोगा नहीं है. खुद पर ज़रूरत से ज़्यादा गुरूर नहीं है.

वो उसके लिए दरवाज़ा नहीं खोलता. रात को जब सीता को देर हो तो फ़ोन कर उसकी ख़बर नहीं लेता रहता.

वो बस सीता को आज़ादी से जीने देता है. उस पर विश्वास करता है और उतना क़रीब आता है जिससे रिश्ते में घुटन ना हो.

सबसे ज़रूरी ये, वो उसका विचार पूछता है, सुनता है और उसके फ़ैसलों की इज़्जत करता है.

जो उसके पिता जी नहीं करते. उस मर्द की जिन बातों पर सीता को प्यार आता है, उसके पिता उन्हीं के बल पर उसको औसत दर्जे का मानते हैं.

वो उसे कहते हैं, सीता किसी आम आदमी से शादी नहीं कर सकती.

तुम क्या जानो तुम्हारे लिए क्या सही है? और वैसे भी तुम्हारी पसंद से फ़र्क़ भी क्या पड़ता है?

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आदर्श नारी

तुम्हारे पिता तुम्हारे लिए चुनाव कर सबसे उम्दा व्यक्ति चुनेंगे.

गठीला शरीर, उच्चतम शिक्षा और अच्छी कमाई करने वाला.

वो तुम्हारा ख़्याल रखेगा, तुम्हारी रक्षा करेगा और अगर कोई तुम्हारी इज़्ज़त पर हाथ डाले तो बदला लेगा.

इसके बदले तुम उसकी बात सुनोगी, समझोगी और उसके मुताबिक़ ज़िंदगी में बदलाव लाओगी.

अब कोई राजा और रजवाड़े नहीं हैं, समाज में भी समय के साथ बदलाव आया है पर औरतों से उम्मीद के पैमाने नहीं बदले.

ये सीता को परेशान करता है. शायद नहीं करना चाहिए. आख़िरकार लोगों को रामायण की आदर्श नारी के मूल्यों की याद दिलाने में इतना बुरा भी क्या है?

पर वो परेशान होती है. क्योंकि ये सब क़ायदों और अपेक्षाओं को बनाए रखता है.

मेरी सीता आख़िर मेरी सीता है. वो बहस करती है. वो अनादर नहीं करना चाहती. पर अपने लिए आदर भी चाहती है.

वो कहती है, अगर मुझसे अपेक्षा है कि मैं समझूं और यक़ीन करूं तो मैं वही अपने लिए भी मांगती हूं.

मैं अपना खयाल रख सकती हूं. मुझे ऐसा साथी चाहिए जो मेरे साथ हो, जिसका क़द मेरे ऊपर वर्चस्व ना बनाए.

मैं दोस्त बनाना चाहती हूं. मर्द, औरत, समलैंगिक, ट्रांसजेंडर.

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चाहती हूं कि मेरा विश्वास किया जाए...

मैं नहीं चाहती कि मेरी रक्षा की जाए. मैं चाहती हूं कि मेरा विश्वास किया जाए.

जब मैं और मेरा साथी ज़िंदगी साथ बिताने का वायदा करें तो हमारी उंगलियां एक दूसरे की ओर नहीं बल्कि एक दूसरे के साथ मिलकर जुड़ी हों.

आग पर मैं अकेले नहीं चलूंगी, हम साथ हों.

जब हम पर सवाल उठें, तो जवाब हम साथ दें.

हमारे सामने जो भी आए, हम उसका सामना साथ करें.

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