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एनडी तिवारी, जो बन सकते थे देश के प्रधानमंत्री!
- Author, शिव जोशी
- पदनाम, देहरादून से, बीबीसी हिंदी के लिए
पूर्व केंद्रीय मंत्री और वयोवृद्ध कांग्रेसी नेता नारायण दत्त तिवारी को ब्रेन हैमरेज के बाद नई दिल्ली एक निजी अस्पताल में भर्ती कराया गया है.
उनके बेटे शेखर तिवारी के अनुसार, 91 वर्षीय तिवारी की हालत गंभीर है और उन्हें आईसीयू में रखा गया है.
वो उत्तर प्रदेश और बाद में इससे अलग होकर बने उत्तराखंड के मुख्यमंत्री रहे. कांग्रेस से जुड़े रहकर उन्होंने और भी कई ज़िम्मेदारियां निभाईं.
हालांकि, 2017 की शुरुआत में नारायण दत्त तिवारी को अपने पुत्र रोहित और पत्नी उज्ज्वला के साथ, कांपते लड़खड़ाते, बेटे और पत्नी को थामे- बीजेपी अध्यक्ष अमित शाह से दिल्ली में मिलते देखा गया था.
ये उनकी आखिरी चर्चित और राजनीतिक स्टेटमेंट वाली तस्वीर थी. कहा गया कि वो सपरिवार बीजेपी में चले गए थे और बेटे के लिए विधानसभा टिकट चाहते थे.
भारतीय राजनीति में एक दौर की राजनीति के धुरंधर रहे तिवारी, 2017 आते-आते एक असहाय, विचलित, विस्मृत और बीमार वृद्ध हो गए थे.
2007 के उत्तराखंड चुनाव में कांग्रेस की हार, उनके राजनीतिक करियर का पटाक्षेप भी था. हालांकि इसकी औपचारिकता एक तरह से 2009 में पूरी हुई.
विकास की दिशा दिखाने वाले नेता की छवि
वरिष्ठ पत्रकार अनुपम त्रिवेदी कहते हैं, "2009 में जिस तरह से उनका एक टेप सार्वजनिक हुआ था, वो आंध्र प्रदेश के गर्वनर थे, और एक कथित वीडियो में आपत्तिजनक अवस्था में दिखे. उसके बाद उनकी बड़ी छीछालेदर हुई. कांग्रेस ने तो उसके बाद से तकरीबन उनसे पल्ला ही झाड़ लिया था. और वो एक तरह से राजनीतिक हाशिए पर चले गये थे."
तिवारी अकेले नेता हैं जो दो राज्यों के मुख्यमंत्री रहे हैं. उत्तर प्रदेश के तीन-तीन बार मुख्यमंत्री रहे. उत्तराखंड के पहले विधानसभा चुनाव में जीत हासिल करने के बाद कांग्रेस ने तिवारी को मुख्यमंत्री बनाया.
उनकी पैराशूट सीएम कहकर आलोचना भी खूब हुई, लेकिन आज भी लोग उनके कार्यकाल को, लालबत्ती बांटने और विपक्ष को मित्र बनाकर रखने की उनकी राजनीतिक चतुराई के लिए नहीं, बल्कि राज्य के विकास की दिशा दिखाने वाले नेता के तौर पर याद रखते हैं.
वरिष्ठ पत्रकार और लेखक जयसिंह रावत कहते हैं, "देश को भी उनका फ़ायदा मिला, उत्तर प्रदेश को भी उनके राजनैतिक कौशल का फ़ायदा मिला और उत्तराखंड को भी उनके राजनैतिक कौशल और प्रशासनिक क्षमता और जो उनके ताल्लुक थे इंडस्ट्री के लोगों से, उन सब चीज़ों का फ़ायदा मिला है."
वो प्रधानमंत्री बन सकते थे
एनडी तिवारी का अधिकांश राजनीतिक जीवन कांग्रेस के साथ रहा जहां वे संगठन से लेकर सरकारों में महत्त्वपूर्ण भूमिकाओं में रहे.
इलाहाबाद छात्र संघ के पहले अध्यक्ष से लेकर केंद्र में योजना आयोग के उपाध्यक्ष से लेकर, उद्योग, वाणिज्य पेट्रोलियम, और वित्त मंत्री के रूप में तिवारी ने काम किया.
तिवारी ने 1995 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी पार्टी बनाई. सफल नहीं रहे. दो साल बाद ही लौट आए. लेकिन इन दो वर्षों के दौरान कांग्रेस में उनके लिए कोई केंद्रीय भूमिका नहीं रह गई थी.
जयसिंह रावत कहते हैं, "नैनीताल सीट से लोकसभा का चुनाव नहीं हारते तो वो निश्चित रूप से देश के प्रधानमंत्री होते. उसके बाद कुछ उनकी कुछ कमियों की वजह से भी कांग्रेस पार्टी उन्हें नज़रअंदाज़ करती रही. उनको राष्ट्रपति का दावेदार माना जाता था, नहीं बनाया गया, फिर कहा गया हो सकता है उपराष्ट्रपति बना दें लेकिन इन्हीं विवादों की वजह से वो कांग्रेस पार्टी ने खासकर सोनिया गांधी ने उन्हें महत्व नहीं दिया."
हालांकि कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी ने अलग ढंग से उनका पुनर्वास किया.
पहले उत्तराखंड में मुख्यमंत्री बनाकर भेजा फिर 2007 में पार्टी चुनाव हारी तो तिवारी का पुनर्वास आंध्रप्रदेश के राज्यपाल के रूप में कर दिया गया.
सेक्स स्कैंडल में नाम उछलने के बाद 2009 में असमय विदाई के बाद तिवारी देहरादून लौट आए.
निजी जीवन विवादास्पद रहा
उनका एक और ठिकाना बना लखनऊ जहां समाजवादी पार्टी से उनकी नजदीकियां बनीं.
तिवारी को विकास पुरुष की उपाधि उनके चाहने वालों ने दी है.
लेकिन उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, और आंध्र प्रदेश में व्यक्तिगत जिंदगी से जुड़े सनसनीखेज़ किस्सों की बदौलत रंगीले पुरुष की छवि भी उन पर चस्पा हैं.
रोहित तिवारी ने 2008 में उन्हें अपना जैविक पिता बताते हुए मुकदमा ही कर दिया था.
वर्षों से नानुकुर करते आ रहे तिवारी की अदालत में हार हुई. रोहित की मां उज्जवला से 88 साल की उम्र में उन्होंने विवाह किया.
उत्तराखंड मे तो लोकगीतकार और गायक नरेंद्र सिंह नेगी ने 'नौछमी नारेण' नाम से एक वीडियो गीत की रचना ही कर दी थी.
कहा जाता है कि तिवारी पर उनके राजनीतिक जीवन का ये सबसे तीखा कटाक्ष था.
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