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रोहिंग्या के दर्द पर ख़ामोश क्यों है दुनिया?
- Author, फ़ैसल मोहम्मद अली
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, दिल्ली
पिछले सप्ताह हुए प्रदर्शन की तरह ये अव्यवस्थित था और 20-25 रोहिंग्या मुसलमानों के इकट्ठा होने जैसा नहीं था.
दिल्ली के जंतर-मंतर पर उस दिन रहम की गुहार लगा रहे रोहिंग्या की जगह, यहां सवाल थे - सरकार से, म्यांमार की नेता आंग सान सू ची से और सीधे भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी से.
सवाल था, "तलाक़ के मामले के वक़्त हमारे प्रधानमंत्री ने कहा था कि वो औरतों से हमदर्दी रखते हैं, औरतों के साथ हैं, क्या वो मां-बहनें नहीं हैं हमारी?" ये सवाल था शमा ख़ान का.
उनके साथ खड़ी अस्मत ने पूछा, "पूरी नस्ल को ख़त्म किया जा रहा है. बच्चों तक को भाले-बर्छियां भोंककर टांग दिया जा रहा है. औरतों की आबरू लूटी जा रही है. दुनिया ख़ामोश क्यों है? क्या ये आतंकवाद नहीं है?"
'आंग सान सू ची यही तुम्हारा असली चेहरा है', 'रोहिंग्या का नरसंहार बंद करो', 'शेम-शेम' और 'होश में तुमको आना होगा'; जैसे पोस्टर लिए और नारे लगाते दिल्ली के दूतावासों वाले इलाक़े चाणक्यपुरी में जमा हुई दो-तीन हज़ार लोगों की भीड़ में और भी कई सवाल पूछे गए.
अगर भारत तिब्बत और बांग्लादेश के शरणार्थियों को शरण दे सकता था, यहां तक कि श्रीलंका से भागे तमिलों तक को पनाह दी गई, जबकि उनमें से बहुतों पर एलटीटीई समर्थक होने का आरोप था, तो फिर रोहिंग्या मुसलमानों के साथ भेदभाव क्यों?
मानवधिकार कार्यकर्ता रवि नायर कहते हैं, "मज़हब के नाम पर भेदभाव किया जा रहा है. बीजेपी सरकार का यही नज़रिया है."
प्रदर्शनकारी सवाल कर रहे हैं कि जिन्हें उनका देश- बर्मा या म्यांमार अपना नागरिक मानने को भी तैयार नहीं है उन्हें आख़िर भेजा कहां जायेगा!
भारत के कई राजनितिक दलों जैसे तृणमूल कांग्रेस, बहुजन समाज पार्टी और वामपंथी दलों ने कहा है कि रोहिंग्या शरणार्थियों के मामले को मानवता के नज़रिये से देखा जाना चाहिए और फिलहाल उन्हें वापस भेजने का इरादा तर्क कर दिया जाना चाहिए.
प्रदर्शन में शामिल होने आये लालू प्रसाद यादव की पार्टी राष्ट्रीय जनता दल के प्रवक्ता मनोज झा कहा, "आरजेडी का रुख़ साफ़ है कि भारत सरकार फिलहाल क़ानूनी और ग़ैर-क़ानूनी का चक्कर छोड़े और चूंकि रोहिंग्या नस्लीय हिंसा से पीड़ित हैं इसलिए भारत को उन्हें शरण देनी होगी."
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने पिछले सप्ताह ही म्यांमार का दौरा किया था. लेकिन वहां के नेताओं से रोहिंग्या समस्या पर उनकी कोई बातचीत क्यों नहीं हुई? इस सवाल पर एमडी थॉमस ने कहा, "ये राजनीति है."
कुछ जगहों पर ये भी कहा जा रहा है कि शक्तिशाली चीन के पाकिस्तान, श्रीलंका और यहां तक कि नेपाल के क़रीब होने से चिंतित भारत म्यांमार से अपने संबंधों को मज़बूत करना चाहता है और यही इस मामले की अनदेखी की वजह है.
इस पर छात्र नेता शहला रशीद कहती हैं, "भारत ने चीन की नाराज़गी के बावजूद तिब्बतियों को देश में जगह दे रखी है, म्यांमार तो चीन जितना ताक़तवर नहीं है."
हालांकि प्रदर्शनकारी भीड़ में मुसलमानों की तादाद ज़्यादा थी, लेकिन साथ ही इकट्ठा हुए थे मानवधिकार कार्यकर्ता, कई राजनीतिक दलों के प्रतिनिधि और छात्र नेता.
बुधवार के दिल्ली-प्रदर्शन के पहले भारत के कई शहरों जैसे कोलकाता, लुधियाना, अलीगढ़ वग़ैरह में रोहिंग्या मुसलमानों के समर्थन में प्रदर्शन हो चुके हैं.
भारत के केंद्रीय गृह मंत्री राजनाथ सिंह इससे पहले कहा था कि रोहिंग्या देश की सुरक्षा के लिए ख़तरा है.
केंद्रीय गृह राज्य मंत्री किरण रिजीजू का बयान भी आ चुका है कि रोहिंग्या मुसलमान ग़ैर-क़ानूनी घुसपैठिये हैं और उन्हें वापस भेजा जाएगा. हालांकि उन्होंने अब साफ़ किया है कि फिलहाल उनकी पहचान की जा रही है.
संयुक्त राष्ट्र ने रोहिंग्या मुसलमानों के मामले पर अगले हफ्ते एक बैठक बुलाई है. लेकिन म्यांमार या बर्मा की नेता सू ची ने कहा है कि वो इसमें शामिल नहीं होंगी.
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