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कर्नल पुरोहित: एटीएस और एनआईए के अलग-अलग सुर
मालेगांव धमाके के अभियुक्त संख्या 9 लेफ़्टिनेंट कर्नल प्रसाद पुरोहित रायगढ़ ज़िले के उच्च सुरक्षा वाले तालोजा जेल परिसर से बुधवार सुबह जब बाहर निकले तब सेना की गाड़ियां उन्हें एस्कॉर्ट कर रहीं थीं.
5 नवंबर 2008 को गिरफ़्तार किए गए कर्नल पुरोहित को सोमवार यानी 21 अगस्त 2017 को सुप्रीम कोर्ट ने ज़मानत दे दी थी, जिसके बाद नौ साल से जेल में बंद पुरोहित की रिहाई का रास्ता साफ़ हो गया था.
मराठा लाइट इंफ़ेंट्री के लिए नियुक्त किए गए कर्नल पुरोहित बाद में सेना की मिलिट्री इंटेलिजेंस फ़ील्ड यूनिट का हिस्सा बन गए थे. जब उन्हें गिरफ़्तार किया गया तब वो सेना की मिलिट्री इंटेलिजेंस के लिए ही काम कर रहे थे.
9 सितंबर 2009 को मालेगांव के अंजुमन चौक और भीकू चौक के बीच शकील गुड्स ट्रांस्पोर्ट कंपनी के बाहर धमाका हुआ था जिसमें छह लोग मारे गए थे और 101 लोग घायल हुए थे.
महाराष्ट्र एटीएस ने की शुरुआती जांच
रमज़ान के महीने में मुस्लिम बहुल इलाक़े में हुए इस धमाके की शुरुआती जाँच महाराष्ट्र एटीएस ने की थी.
महाराष्ट्र एटीएस ने अभियुक्तों पर मकोका एक्ट की धाराएं भी लगाईं थीं. महाराष्ट्र एटीएस ने जांच पूरी करने के बाद 11 गिरफ़्तार और 3 फ़रार अभियुक्तों के खिलाफ़ मामले में पहली चार्जशीट 20 जनवरी 2009 को दायर की थी.
इसके बाद 21 अप्रैल 2011 को महाराष्ट्र एटीएस ने अतिरिक्त चार्जशीट भी अदालत में पेश की थी.
एटीएस ने कर्नल पुरोहित पर भारत में हिंदुत्व को बढ़ावा देने, अलग भगवा झंडा अपनाने और लोगों के दिलों में दहशत पैदा करने के इरादे से आपराधिक साज़िशें और धमाके करवाने के आरोप तय किए गए थे.
महाराष्ट्र एटीएस ने कहा अलग देश बनाना चाहते थे पुरोहित
मामले में दायर एटीएस की पहली चार्जशीट के मुताबिक अभियुक्त प्रसाद पुरोहित ने साल 2007 में 'अभिनव भारत' नाम का एक संगठन बनाया जिसका उद्देश्य एक "पृथक हिंदू राष्ट्र का निर्माण करना था" जिसका अपना अलग संविधान और अलग भगवा ध्वज हो.
एटीएस के मुताबिक़ 'अभिनव भारत' संगठन के लोगों ने फ़रीदाबाद, कोलकाता, भोपाल, जबलपुर, इंदौर और नासिक शहरों में बैठकों की और धमाके करने की आपराधिक साज़िशें रचीं.
'अभिनव भारत' संगठन अपना उद्देश्य पूरा करने के लिए पूरे भारत से लोगों को अपने साथ जोड़ रहा था.
एनआईए ने मकोका की धाराएं हटाईं
लेकिन भारत सरकार के जनवरी 2011 में आए एक आदेश के बाद इस मामले की जांच राष्ट्रीय जांच एजेंसी को सौंप दी गई थी.
अभियुक्तों के उच्च न्यायालयों में कई याचिकाएं दायर कर मकोका एक्ट लगाए जाने को चुनौती दी थी.
एनआईए इस मामले में सुप्रीम कोर्ट के निर्णय के बाद जांच अप्रैल 2015 में ही शुरू कर सकी. 2015 तक एनआईए ने इस मामले में कोई साक्ष्य अदालत में पेश नहीं किया.
राष्ट्रीय जांच एजेंसी ने मई 2016 में चार्जशीट दायर की जिसमें कर्नल पुरोहित समेत सभी अभियुक्तों पर से मकोका क़ानून की धाराएं हटा ली गईं.
एनआईए ने अपनी रिपोर्ट में ये भी कहा कि मकोका क़ानून के तहत एटीएस की ओर से लिए गए अभियुक्तों के कई इक़बालिया बयानों का संज्ञान एनआईए की जांच में नहीं लिया गया है.
कर्नल पुरोहित अभी भी हत्या, षडयंत्र, अवैध हथियार रखने आदि संगीन मामलों के अभियुक्त हैं और एनआईएएअब भी पूरे मामले की जांच कर रही है.
लेकिन पिछले दिनों सुप्रीम कोर्ट ने पुरोहित को यह कहते हुए ज़मानत दे दी थी कि सिर्फ़ 'किसी समुदाय की भावनाएं उनके ख़िलाफ़ होने की वजह से' उन्हें राहत से वंचित नहीं रखा जा सकता.
सुप्रीम कोर्ट ने कई शर्तों के साथ पुरोहित को ज़मानत दी है जिनमें बिना पूर्व अनुमति के देश नहीं छोड़ना भी शामिल है.
इससे पहले इस मामले में एनआईए साध्वी प्रज्ञासिंह ठाकुर समेत छह अभियुक्तों को आरोपमुक्त कर चुकी है.
दबाव का आरोप लगाकर अलग हो गईं थी सरकारी वकील
इस मामले की सरकारी वकील रोहिणी सालियां ने 2015 में ये आरोप लगाते हुए इस्तीफ़ा दे दिया कि एनआईए ने उनसे मुक़दमे की गति धीमी करने को कहा था.
मामले की जांच से अलग होने की वजह बताते हुए सालियां ने बीबीसी से कहा था, "अब तो यह साफ़ हो गया है कि उनका एजेंडा अलग है. उन्हें मेरी सेवाएं नहीं चाहिए. पूरी सुनवाई में उनके मुताबिक़ कोई भी फ़ैसला नहीं आया. मेरी सेवा उनके लिए सुविधाजनक नहीं है. इस केस की ज़िम्मेदारी मेरे पास है, इसलिए जनता को इस बारे में पता होना चाहिए. उन्होंने बड़े विश्वास से मुझे यह केस सौंपा था. अगर कोई इसमें हस्तक्षेप करता है तो मुझे ठीक नहीं लगेगा. एक सरकारी वकील होने के नाते निष्पक्ष पैरवी की हमारी ज़िम्मेदारी बनती है. इसीलिए यह बात बताकर मैं केस से बाहर आई."