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यूपीः पार्टी में लगी 'आग बुझाने' लखनऊ गए थे अमित शाह
- Author, शरत प्रधान
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार, लखनऊ से
योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने से भाजपा कार्यकर्ताओं में ऐसी ख़ुशी की लहर दौड़ी थी मानो उनकी सारी इच्छाएं पूरी हो गई हों. एक भगवाधारी साधु को प्रदेश की सबसे ऊंची कुर्सी पर बैठा देखकर उन्हें ऐसा लगने लगा कि इस बार तो सही मायने में हिंदुत्व की सरकार बनी है.
उन्होंने ये मान लिया कि उन्हें भी वैसे ही आनंद उठाने का अवसर मिलेगा जैसे कि पूर्व सरकारों के राज में समाजवादी या बसपा के कार्यकर्ता उठाते रहे.
शायद उन्हें इस बात का एहसास नहीं था कि कुल चार महीनों में उनकी उम्मीदों पर पानी फिर जाएगा और उन्हें अपने ही नेता के ख़िलाफ़ दिल्ली तक गुहार लगानी पड़ेगी.
उसी के फ़लस्वरूप पार्टी के राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह को लखनऊ आकर तीन दिनों तक डेरा डालना पड़ा और हर स्तर के कार्यकर्ता को अपनी बात विस्तार से कहने का मौका देना पड़ा.
विश्वस्त सूत्रों का कहना है कि अमित शाह को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने इस उद्देश्य से लखनऊ में लंबा समय गुज़ारने को कहा जिससे हर एक को अपनी पूरी बात कहने का अवसर मिले.
योगी की शिकायत
वैसे तो शाह अन्य प्रदेशों में भी समय दे रहे हैं परंतु उन प्रदेशों में इस प्रकार की समस्या नहीं है जैसी उत्तर प्रदेश में है. इसीलिए उन्होंने अगले महीने फिर से यहां आकर समय बिताने की बात कही.
प्रदेश के कुछ सांसद और विधायकों ने हिम्मत करके अपनी शिकायत मोदी के दरबार में पहुंचाई थी. कुछ लोगों ने यहां तक कह डाला कि यदि प्रदेश सरकार के कार्यकलाप इसी प्रकार रहे तो वे 2019 के लोकसभा चुनाव में अपना योगदान कैसे दे पाएंगे.
कुछ सांसदों ने प्रदेश की बिगड़ती क़ानून व्यवस्था पर भी सवाल उठाए और इस बात पर भी प्रधानमंत्री का ध्यान आकर्षित किया कि अखिलेश यादव की सरकार जाने का एक बहुत बड़ा कारण बढ़ता हुआ अपराध भी था.
उसी के फ़लस्वरूप अमित शाह यहां आए और हर वर्ग के पार्टी नेता और कार्यकर्ताओं से बातचीत करने का सिलसिला शुरू किया.
उपेक्षा से नाराज़ कार्यकर्ता
ये बात दीगर है कि योगी आदित्यनाथ अधिकतर समय शाह के साथ मौजूद रहे, पर ज़िला अध्यक्षों और विधायकों ने खुलकर सरकार की आलोचना करने में कसर नहीं छोड़ी.
अधिकतर लोगों को सरकार के 'अफ़सरशाही' तरीक़ों से शिकायत थी. उनका मानना था कि उनकी आज भी वैसी ही उपेक्षा हो रही है जैसी पिछली सपा सरकार या दूसरी पार्टियों की सरकार में होती रही थी.
इन लोगों ने अमित शाह के सामने ये भी कहा कि 'सरकार में उनकी बात अफ़सर नहीं सुनते क्योंकि मुख्यमंत्री ने उन्हें ऐसा करने के लिए खुलेआम निर्देशित किया है'.
वैसे तो मुख्यमंत्री अधिकतर ख़ामोश रहे पर बीच-बीच में अपनी सफ़ाई भी दी कि उनका उद्देश्य अपने कार्यकर्ताओं को ग़लत काम के लिए किसी की पैरवी करने से रोकने का था.
उम्मीदों पर पानी फिरा
मुख्यमंत्री का कहना था कि उन्होंने अफ़सरों को केवल ये निर्देश दिए थे कि वे किसी के नाजायज़ दबाव में आकर काम न करें.
ऐसे भी कई उदाहरण दिए गए जहां नौकरशाह और पुलिस अधिकारियों ने जनप्रतिनिधियों के साथ बदसलूकी की.
कुछ ने अपना दुखड़ा इस प्रकार से रोया कि यदि वे जनता का काम ही नहीं करवा पाएंगे तो उन्हें अगले चुनाव में वोट कौन देगा.
दरअसल, पार्टी कार्यकर्ताओं को लगता था कि इतने सालों बाद बीजेपी की सरकार आई है और वो भी योगी आदित्यनाथ जैसे आक्रामक हिंदू नेता के नेतृत्व में तो इसके आने से उनके वारे न्यारे हो जाएंगे.
उन्होंने सोचा कि उन्हें उसी प्रकार से सरकारी ठेके मिलने लगेंगे जैसे कि अखिलेश सरकार में सपा के लोगों को मिलते थे.
उन्हें लगता था कि अब पुलिस वाले उनकी सुनेंगे, डीएम और अधिकारी उनकी सिफ़ारिश सुना करेंगे जिससे उनकी जेबें भी गरम होंगी. मगर ये हो ना सका क्योंकि मुख्यमंत्री योगी अपनी अलग ही धुन में थे.
संघ की सिफ़ारिशें भी दरकिनार
अपनी ईमानदार छवि बनाए रखने के लिए ये भी ज़रूरी था कि वो ये संदेश दें कि वो किसी का नाजायज़ काम न तो खुद करेंगे ना किसी और को करने देंगे. पार्टी के छोटे नेता और कार्यकर्ताओं के लिए तो तमाम बाधाएं खड़ी हो गईं पर वहीं चंद बड़े नेताओं के कहने पर सब कुछ होने लगा.
इस कारण इन कार्यकर्ताओं में सरकार से अंदरूनी नाराज़गी और बढ़ी. बात यहां तक बढ़ी कि संघ परिवार की सिफ़ारिशों को ताक पर रखते हुए सुनील बंसल की सिफ़ारिश पर ऐसे बहुत से लोगों को हाईकोर्ट में सरकारी अधिकारी नियुक्त कर दिया गया जिन्होंने हाईकोर्ट की शक्ल तक कभी नहीं देखी थी.
प्रदेश के महाधिवक्ता राघवेंद्र सिंह ने भी इस बात पर आपत्ति जताई.
पार्टी के बहुचर्चित संगठन मंत्री सुनील बंसल जिनके तानाशाही रवैये से यूपी के कार्यकर्ताओं में पहले से ही रोष था, लोगों की आंख का कांटा बन गए.
संगठन मंत्री सुनील बंसल 'ताक़तवर'
एक तरफ़ योगी सरकार के सब मंत्री बंसल की हर सही-ग़लत सिफ़ारिश को सर आंखों पर लेते तो दूसरी तरफ़ आम पार्टी नेताओं और कार्यकर्ताओं के आग्रह को ठंडे बस्ते में डाल देते.
अधिकतर ट्रांसफ़र-पोस्टिंग भी बंसल दरबार में तय किए जाने लगे जबकि बहुत से विधायकों, ज़िलाध्यक्षों या अन्य नेताओं की सिफ़ारिशें नज़रअंदाज़ होती रहीं.
बंसल की अमित शाह से क़रीबियां सबको पता थीं, इसीलिए शुरू में किसी ने उनके ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं की. पर जब पानी सिर से ऊपर हो गया तो गुब्बारा फूटना ही था.
उधर गिरती क़ानून व्यवस्था के कारण वैसे भी सरकार की बहुत किरकिरी हो रही थी, जबकि एक अत्यंत ईमानदार आईपीएस अधिकारी सुल्खान सिंह को डीजीपी की कुर्सी पर बैठाया गया है और वैसे ही ईमानदार आईएएस अफ़सर राजीव कुमार को तो दिल्ली से बुलवाकर मुख्य सचिव बनाया गया.
लोगों को साफ़ दिखने लगा कि बिगड़ती क़ानून व्यवस्था के पीछे यही कारण है कि इन अधिकारियों से ज़्यादा ताक़तवर पार्टी का एक नेता बन गया है जो कि मुख्यमंत्री से कुछ भी करवा सकता है जबकि पार्टी के वाजिब काम भी नहीं होते हैं.
अमित शाह के जाते ही मुख्यमंत्री ने क़ानून व्यवस्था पर विशेष मीटिंग ली जिसमें कई मंत्री और उच्च अधिकारी बुलाए गए.
उसी के साथ-साथ अमित शाह के जाते ही योगी ने 23 समन्वयक समूह बनाए जिसमें कि दो-दो मंत्री और 12-12 विधायक शामिल किए गए हैं. अब ये ग्रुप कितने कार्यकुशल और सफल होते हैं इसे देखने के लिए अमित शाह सितम्बर में फिर से यहां आएंगे. आखिर 2019 दूर नहीं है.
(ये लेखक के निजी विचार हैं)
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