मोदी सरकार के मुकाबले विपक्ष क्यों नाकाम?

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- Author, रशीद किदवई
- पदनाम, वरिष्ठ पत्रकार
कांग्रेस साल 2014 के लोकसभा चुनाव की करारी हार के बाद भी भले ही अटूट बनी हुई हो लेकिन वो लगातार होने वाली 'अग्नि परीक्षा' में असफल साबित हो रही है.
भले ही यह 'अग्नि परीक्षा' संसद में मुख्य विपक्षी दल के तौर पर कांग्रेस की भूमिका की हो या फिर राष्ट्रीय स्तर पर बीजेपी के नेतृत्व वाली एनडीए सरकार के विकल्प बनने की.
2014 की चुनावी हार आज़ादी के बाद कांग्रेस की अब तक की सबसे बड़ी हार थी.
तृणमूल कांग्रेस, बीजू जनता दल, जनता दल (यूनाइटेड), एआईएडीएमके, डीएमके, वामपंथी दल, समाजवादी पार्टी, बहुजन समाज पार्टी, आम आदमी पार्टी जैसे मजबूत क्षेत्रीय दलों के रहते भी राहुल गांधी और सोनिया गांधी नरेंद्र मोदी को कई सारे मौजूं सवालों पर कड़ी चुनौती नहीं दे पा रहे हैं.
फिर चाहे वो नरेंद्र मोदी को कश्मीर में बदतर होते हालात पर घेरने का मामला हो या फिर नक्सली हमलों में हुए इजाफे की बात हो.
इसके अलावा और भी कई मुद्दे हैं मसलन सीमा पार से होने वाले चरमपंथी हमले, अर्थव्यवस्था की धीमी रफ़्तार, गौरक्षकों का आतंक, जिस पर कांग्रेस नरेंद्र मोदी को घेरने में नाकाम रही है.

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क्षेत्रीय दलों की अपनी अलग समस्याएं हैं. मोदी सरकार के ख़िलाफ़ विदेश नीति, सुरक्षा नीति और आर्थिक मुद्दों पर खड़े होने के लिए उन्हें कांग्रेस जैसे राष्ट्रीय दलों की आवश्यकता होती है.
कांग्रेस के नेतृत्व को लेकर समस्या
कांग्रेस में नेहरू-गांधी परिवार की मौजूदगी इन दलों के लिए एक बड़ी असहज करने वाली स्थिति है.
मुलायम सिंह यादव, एम करुणानिधि, ममता बनर्जी और नवीन पटनायक जैसे पुराने नेताओं के लिए सोनिया और राहुल की नेतृत्व वाली कांग्रेस को अपनाना आसान नहीं.

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हाल ही में एडीएमके, तृणमूल कांग्रेस, और बीजू जनता दल ने इस बात के पर्याप्त संकेत दिए हैं कि एनडीए से उनका विरोध होते हुए भी वो कांग्रेस के भले के लिए राजनीति नहीं करेंगे.
राहुल गांधी ने ग़ैर-बीजेपी दलों के साथ संवाद स्थापित करने के बहुत कम या बिलकुल भी प्रयास नहीं किए हैं.

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जब ममता बनर्जी ने बंगाल में लेफ्ट को पटखनी दी तो राहुल गांधी ने उनके मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ग्रहण समारोह में नहीं जाने का फ़ैसला किया था.
तृणमूल कांग्रेस उस वक्त यूपीए का हिस्सा था इसलिए तृणमूल के नेतृत्व को भरोसा था कि राहुल गांधी शपथ ग्रहण समारोह में आएंगे.
उस वक्त यह कहा गया कि गांधी परिवार के लोग मुख्यमंत्रियों के शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा नहीं लेते हैं.
और उस वक्त पार्टी के वरिष्ठ नेताओं की एक टीम को शपथ ग्रहण समारोह में हिस्सा लेने के लिए भेजा गया.

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ममता बनर्जी के लिए यह एक अपमान की तरह था. उनके नजदीकी लोगों ने इस सवाल पर कांग्रेस को घेरना शुरू कर दिया कि जब कश्मीर में उमर अब्दुल्ला मुख्यमंत्री के तौर पर शपथ ले रहे थे तब फिर उस समारोह में राहुल और सोनिया गांधी कैसे मौजूद थे.
उसी तरह से डीएमके साथ भी कांग्रेस के रिश्ते उस समय से उतने अच्छे नहीं रह गए जब सोनिया गांधी ने पहली बार 1998 में पार्टी प्रमुख के तौर पर पदभार संभाला.
उनके पति राजीव गांधी को प्रधानमंत्री रहते हुए भी कभी चेन्नई में जयललिता के बुलाने पर जाने में कोई हिचक नहीं रही लेकिन सोनिया ने इस मामले में हमेशा प्रोटोकॉल का पालन किया.

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आज विपक्षी दलों को यह समझना जरूरी है कि विपक्षी दलों के नेताओं के बीच समझौता होने से भी ज्यादा जरूरी है कि पार्टी के कैडरों के बीच आपसी तालमेल मधुर और प्रगाढ़ हो तभी वो बीजेपी को चुनौवी राजनीति में चुनौती दे पाएंगे.
ज़मीनी स्तर पर साथ मिलकर लड़ना जैसे कदम इस दिशा में कारगर साबित होंगे.
कांग्रेस भले ही इस पर यकीन करना पसंद ना करें लेकिन समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, एआईडीएमके और बसपा जैसी पार्टियां मानती हैं कि वो बीजेपी के ख़िलाफ़ कांग्रेस की मजबूत विकल्प बन सकती हैं.
राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी एकता की परीक्षा
आने वाले राष्ट्रपति चुनाव में विपक्षी एकता की पहचान होने वाली है.
राष्ट्रपति के उम्मीदवार को लेकर लगता है कि विपक्षी दलों के बीच कोई आम सहमति नहीं है.

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कुछ सूत्रों के हवाले से पता चला है कि पश्चिम बंगाल के पूर्व गवर्नर गोपाल कृष्ण गांधी सरकार की ओर से संघ के किसी पूर्णकालिक सदस्य का नाम आने की स्थिति में विपक्षी दलों की पसंद हो सकते हैं.
कांग्रेस, वामपंथी दल और दूसरे विपक्षी दल महात्मा गांधी के पोते का नाम सामने लाकर एक प्रतिकात्मक संदेश देने की कोशिश करेंगे कि यह लड़ाई महात्मा गांधी के विचारधारा पर चलने वालों और उनकी मुखालफत करने वालों के बीच है.
कांग्रेस की ओर से मीरा कुमार का नाम भी उस स्थिति में सामने आ सकता है जब मोदी सरकार झारखंड के गर्वनर द्रुपदी मुरमू या करिया मुंडा या फिर दूसरे किसी शख़्स का नाम पहचान की राजनीति के तौर पर उछाले.
बंटा हुआ विपक्ष

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विपक्षी दल हालांकि बीजेपी के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी का नाम सामने आने की स्थिति में बंटते हुए नज़र आ सकते हैं.
ऐसी ख़बर है कि विपक्षी दलों का एक हिस्सा जिसमें सोनिया गांधी भी शामिल है, संघर्ष की स्थिति से बचना चाहती है.
उनकी नज़र में आडवाणी एक सक्षम राजनेता हैं. हालांकि पूर्व उप-प्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी बाबरी मस्जिद विध्वंस मामले में कानूनी तौर पर फंसे हुए हैं और इस वजह से विपक्षी दलों में उनके नाम को लेकर अलग-अलग राय भी हो सकती है.
विपक्षी दलों की यह उम्मीद कि नरेंद्र मोदी आम राय बनाने में ख़ुद आगे आएंगे, इसकी थोड़ी ही संभावना है.
2007 में यूपीए ने प्रतिभा पाटिल का नाम लाया था तब उसने विपक्ष के नेता लालकृष्ण आडवाणी या किसी और की उतनी परवाह नहीं की थी.
सोनिया गांधी और वामपंथी दलों ने उस वक्त राष्ट्रपति के तौर पर कार्यकाल पूरा कर हट रहे एपीजे कलाम के प्रति वो सम्मान नहीं दिखाया था.
विपक्ष के लिए मौका

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आने वाला राष्ट्रपति चुनाव हताश और निराश विपक्ष के लिए एक मौका है. कम से कम सैद्धांतिक रूप से तो सभी विपक्ष मिलाकर उनके पास एनडीए की सरकार से ज्यादा समर्थन है.
यह अलग बात है कि एडीएमके, टीआरएस, वाईएसआर कांग्रेस, बीजू जनता दल और दूसरे ग़ैर-एनडीए दलों के अंदर यह क्षमता है कि वो विपक्षी एकता को तोड़ दे और मोदी सरकार को मदद करें.
इलेक्टोरल कॉलेज की 1098,882 मतों का है जिसमें से एनडीए के पास 53, 1442 है, जो कि बहुमत के आकड़े 54, 9442 से 18,000 कम है.
एनडीए को बहुत कम मतों का और जुगाड़ करना है. इसके लिए वो एआईएडीएमके, टीआरएस और बीजू जनता दल में से किसी एक या तीनों को अपनी ओर कर लेता है तो उसका काम चल जाएगा.
वहीं विपक्ष को जीतने के लिए ना सिर्फ़ यह सुनिश्चित करना होगा कि ग़ैर-बीजेपी दल एकजुट रहें बल्कि उन्हें एनडीए के एक या दो सहयोगियों को भी अपनी तरफ करना होगा.
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