ग्राउंड रिपोर्ट-3: सहारनपुर में दलित-ठाकुर हिंसा का असल कारण क्या है?

- Author, ज़ुबैर अहमद
- पदनाम, बीबीसी संवाददाता, सहारनपुर से लौटकर
"मुसलमान हमें हिंदू समझ कर काटते हैं, हिंदू चमार समझ कर. हम कटते ही रहते हैं."
उत्तर प्रदेश के सहारनपुर में शब्बीरपुर गांव के शिव राज के इन शब्दों ने हमें हिला कर रख दिया.
उन्होंने ऐसे ही ये बात नहीं कही थी. उनके शब्दों में मायूसी भी थी और नाउम्मीदी का एहसास भी.
शिव राज दलित का जीवन जीते-जीते अब थक चुके हैं. पांच मई को गांव में हुई हिंसा में उनके घर को आग लगा दी गई थी.
उन्हें पीटा गया था. उनके जैसे 50 से अधिक दलित पड़ोसियों के घर भी जला दिए गए थे.

विवाद की शुरुआत
हुआ ये था कि 5 मई को पास के शिमलाना गांव में महाराणा प्रताप जयंती का आयोजन था.
इस आयोजन में शामिल होने के लिए शब्बीरपुर गांव से कुछ ठाकुर शोभा यात्रा निकाल रहे थे. ठाकुरों का आरोप है कि दलितों ने इसे रोक दिया और पुलिस बुलाई गई.
विवाद की शुरुआत इसी घटना से हुई.
शिव राज हों या उनके पड़ोसी दल सिंह या फिर शिमला देवी, ये सभी लोग 60 से ऊपर के हैं लेकिन उनके अनुसार उन्होंने अब तक शब्बीरपुर में खुद को इतना असुरक्षित कभी महसूस नहीं किया.
सहारनपुर से 25 किलोमीटर दूर इस गांव के दलितों के घरों के बाहर बड़ी संख्या में पुलिस वाले तैनात हैं. जले-गिरे घरों के आस-पास स्पेशल फोर्सेज की पूरी ड्यूटी है.

डर के कारण
कई घरों की छतें गिरी हुई हैं. जो बची हैं उस पर चढ़कर नीचे देखें तो पुलिस की वर्दी हर तरफ नज़र आती है.
इसके बावजूद शिव राज डरे हुए भी हैं और बेहद नाराज़ भी.
वो कहते हैं कि सवाल आज की हिंसा का नहीं है. मुद्दा है दलितों के खिलाफ अत्याचार और भेद भाव के बढ़ने का.
शिव राज कहते हैं, "हम यहाँ से कहीं और चले जाएंगे और अपना धर्म परिवर्तन भी कर सकते हैं."
कई युवा दलित मर्द गांव से बाहर रह रहे हैं. ये कहना कठिन था कि वो डर के कारण गांव छोड़ कर गए थे या गिरफ़्तारी से बचने के कारण.

स्पेशल टास्क फ़ोर्स
शब्बीरपुर में जहाँ दलितों का मोहल्ला ख़त्म होता है वहीं से राजपूतों के घर शुरू होते हैं.
बाहर वाले लोगों को दोनों मोहल्लों के दिखावे में या आकार में कोई फ़र्क़ नहीं महसूस होगा.
आर्थिक रूप से दलितों और ठाकुरों की बस्तियां और घर ग़रीब लोगों के लगते हैं. उनकी शक्लें और पोषक भी एक जैसी है.
ठाकुरों वाले मोहल्ले में केवल इक्का-दुक्का पुलिस वाले ही पहरे पर थे. लेकिन यह एक ज़ाहरी फ़र्क़ था.
मैंने लखनऊ से आए उत्तर प्रदेश पुलिस की स्पेशल टास्क फोर्स के उच्च अधिकारी अमिताभ यश से पूछा कि इसका क्या मतलब निकाला जाए?

दलित युवक की हत्या
अमिताभ यश ने कहा कि दलितों की सुरक्षा के लिए उनके घरों के आगे भारी संख्या में फ़ोर्स लगाई गई है.
मैंने कहा कि इसका मतलब ये हुआ कि दलित समुदाय पीड़ित है, इसीलिए उन्हें सुरक्षा की अधिक ज़रूरत है, तो उन्होंने कहा मेरा ये निष्कर्ष ग़लत है.
सच तो ये है कि अंदर जाने पर नज़र आया कि ठाकुरों के भी कई घर जले हुए थे.
अगर एक दलित युवक की हत्या हुई थी तो हिंसा में रसूलपुर गांव के एक ठाकुर युवक को भी पीट-पीट कर मार डाला गया था. ठाकुरों के घरों में भी आग लगाई गई थी.
ऐसे ही एक ठाकुर परिवार की महिला मधु ने कहा, "उनसे मैंने कहा, बच्चे सीधे अपने घरों को लौट जाओ लेकिन तीन लड़के आए और घर के अंदर आग लगा दी."

भीम आर्मी
ठाकुरों के कई युवाओं ने कहा कि भीम आर्मी ने मोहल्ले में काफी दहशत मचाई थी.
एक युवती रेखा कहती हैं, "वो मायावती के आने के समय सड़कों पर अपने झंडे लहराते हुए भीम आर्मी ज़िंदाबाद के नारे लगा रहे थे."
भीम आर्मी के संस्थापक चंद्रशेखर आज़ाद समेत संगठन के कई युवाओं की पुलिस को तलाश है.
भीम आर्मी के 30 से अधिक कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार भी किया गया. पुलिस अधिकारी अमिताभ यश इस बात की पुष्टि करते हैं कि भीम आर्मी का हिंसा में हाथ था.
लेकिन भीम आर्मी के जितने लोगों से हमने बातें कीं वो इस बात से इंकार करते हैं कि हिंसा में उनका हाथ था.
वो तो ये कहते हैं कि भीम आर्मी दलित लोगों की एकता और दलित युवाओं की शिक्षा के लिए काम करते हैं.

भाजपा सरकार
गांव के दलित बुज़ुर्ग दल सिंह और दूसरे पीड़ित दलित कहते हैं कि आदित्यनाथ सरकार के बनने के बाद ठाकुर "इतराने लगे हैं, खुद को ताक़तवर मानने लगे हैं."
भीम आर्मी के लोग जो खुद को प्रधानमंत्री मोदी का कुछ दिन पहले तक समर्थक कहते थे, अब भाजपा सरकार से मायूस हैं.
सहारनपुर से भाजपा के युवा सांसद राघव लखनपाल शर्मा कहते हैं ये हिंसा राज्य सरकार के खिलाफ एक साज़िश है और इशारों में वो इसकी साज़िश का आरोप मायावती पर लगाते हैं.
उन्होंने कहा, "एक षड्यंत्र के तहत इसे जातिगत हिंसा का रूप देने का प्रयास किया गया. जिन संगठनों के नाम आ रहे थे उन में एक राजनीतिक संगठन भी है. जिनको ये लग रहा था कि उनकी खोई हुई ज़मीन वापस लेनी है. मुझे लगता है राज्य सरकार को बदनाम करने की एक साज़िश है और इस साज़िश का पर्दा जल्द ही फाश होगा."

लेकिन दलितों और ठाकुरों के बीच हिंसा के ये सब तात्कालिक कारण हैं, असल मुद्दा क्या है?
अमिताभ यश कहते हैं, "जो पुराने संबंध थे वो अब बदल रहे हैं. हर समुदाय बदल रहा है, हर समुदाय प्रगति कर रहा है. अब सभी की इच्छा है कि वो दूसरों के बराबर देखे जाएँ."
शब्बीरपुर के दलित हों या दलितों की भीम आर्मी, भीम सेना और दलित सेना जैसे संगठन, ये अपने अधिकारों को मनवाने के लिए अब आवाज़ उठाने के लिए आगे आ रहे हैं.
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