क्या दुनिया भर में ख़तरे में है लोकतंत्र?

    • Author, डगलस हेवन
    • पदनाम, बीबीसी फ़्यूचर

'लोकतंत्र ख़तरे में है'. ये जुमला आप अक्सर सुनते होंगे. कभी ममता बनर्जी से. कभी अरविंद केजरीवाल से. कभी कांग्रेस के नेताओं की ज़ुबान से.

कभी बराक ओबामा को लोकतंत्र की फिक्र होती है. तो, कभी टेरीज़ा मे और एंजेला मर्केल लोकतंत्र बचाने की गुहार लगाती हैं.

पूरी दुनिया में हंगामा सा है. लोकतंत्र ख़तरे में है...जम्हूरियत को बचाओ.

आख़िर लोकतंत्र क्यों ख़तरे में है? उसे किससे ख़तरा है? सीरिया में बशर अल असद की सरकार, जब अपने ही लोगों पर ज़ुल्म करती है, तो लोकतंत्र को ख़तरा समझ में आता है.

चीन की सरकार जब हॉंगकॉंग जैसे स्वायत्त इलाक़े में दखल देती है, तो लोकतंत्र पर ख़तरा समझ में आता है. ईरान, इराक़ और रूस में जब साफ़-सुथरे चुनाव नहीं होते, तो भी जम्हूरियत को नुक़सान पहुंचता है.

मगर, यूपी के विधानसभा चुनाव में बीजेपी की जीत से लोकतंत्र को कैसा ख़तरा? जब अमरीका की जनता डोनाल्ड ट्रंप को राष्ट्रपति चुनती है, फिर डेमोक्रेसी को कैसा डेंजर? जब ब्रिटेन के लोग यूरोपीय यूनियन से अलग होने यानी ब्रेक्ज़िट के हक़ में वोट देते हैं, तो उसे भी लोकतंत्र के लिए ख़तरा क्यों बताया जाता है?

ये शोर, ये चीख़-पुकार क्यों है आख़िर?

जो मुल्क़ तानाशाही के शिकार रहे हैं, वो तो बदनाम हैं ही. जैसे रूस या मिस्र या ईरान में लोकतंत्र का सिर्फ़ नाम है. मगर अमरीका, ब्रिटेन जैसे देश जो सदियों से जम्हूरियत में जीते आए हैं, वहां लोकतंत्र क्योंकर कमज़ोर हो रहा है?

मध्य-पूर्व और पूर्वी यूरोप के देश हों जो हाल में लोकतांत्रिक हुए थे, या फिर सदी से भी ज़्यादा पुराना जम्हूरी मुल्क़ तुर्की, हर जगह तानाशाही ने ज़ोरदार वापसी की है.

आम लोगों के अधिकारों पर पाबंदियां लगाई जा रही हैं. राज करने वाले लोग इकतरफ़ा फ़ैसले ले रहे हैं. अपने हुक्मरानों पर जनता का भरोसा कम होता जा रहा है.

लंदन की संस्था इकोनॉमिक इंटेलिजेंस यूनिट यानी आईईयू की योआन होई कहती हैं कि रूस और ईरान जैसे देश तो बदनाम ही हैं. अब लोकतंत्र को अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में भी ख़तरा है.

अमरीका की स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी के राजनीतिक समाजशास्त्री लैरी डायमंड का कहना है कि लोकतंत्र का मिज़ाज बदल रहा है. ये रंग-रूप बदल रहा है. इसे लेकर ही पश्चिमी देश फिक्रमंद हैं.

पिछले एक दशक में सारी दुनिया में जिस तरह के सियासी बदलाव हुए हैं, लोग उससे परेशान हैं.

क्योंकि लोकतंत्र को एक बने-बनाए चश्मे से देखा जाता था. किसी भी देश में जम्हूरियत को एक ख़ास पैमाने पर तौला जाता था. इसीलिए आज दुनिया में जो बदलाव हो रहे हैं, उन्हें लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताया जाता है.

तानाशाही के शिकंजे में

लैरी डायमंड कहते हैं कि लोकतंत्र पिछले एक दशक से मंदी के दौर से गुज़र रहा है. पूर्वी यूरोप और मध्य पूर्व के देशों में जहां लोकतंत्र की अलख जगी थी, वो फिर से तानाशाही के शिकंजे में कसते जा रहे हैं.

ब्रिटेन की संस्था आईईयू यानी इकॉनमिस्ट इनटेलिजेंस यूनिट पिछले 11 सालों से दुनिया भर में लोकतंत्र को एक ख़ास पैमाने पर तौलती आई है. आईईयू लोकतंत्र के गिरते मेयार पर एक रिपोर्ट निकालती है, जिसका नाम है डेमोक्रेसी इंडेक्स.

इस रिपोर्ट में क़रीब 167 देशों के हालात का ब्यौरा दिया जाता है. मसलन, वहां की सरकार कैसी है? नागरिकों को कितने अधिकार हासिल हैं? सरकार की नीतियां कैसी हैं? फ़ैसलों में जनता की भागीदारी कितनी है?

इन पैमानों पर परखने के बाद फिर इन देशों को डेमोक्रेसी इंडेक्स में नबंर दिए जाते हैं. मतलब कहां लोकतंत्र मज़बूत है? कहां ये कमज़ोर हो रहा है? कहां तानाशाही है?

आईईयू ने पिछले साल की जो रिपोर्ट जारी की है उसके नतीजे बहुत निराशाजनक हैं. 2015 के मुक़ाबले साल 2016 में क़रीब 72 देश इस रिपोर्ट के पैमाने पर नीचे गए हैं. सिर्फ़ 38 देशों में लोकतंत्र के लिए हालात बेहतर हुए हैं.

पूरी तरह से लोकतांत्रिक कहे जाने वाले देशों की तादाद भी 20 से घटकर 19 रह गई. रिपोर्ट में अमरीका में भी लोकतंत्र को कमज़ोर और कमतर ठहराया गया है. आईईयू की रिपोर्ट के मुताबिक़ सिर्फ दुनिया की कुल आबादी का 4.5 फीसद हिस्सा ही सही मायनों में लोकतांत्रिक माहौल में रह रहा है.

अमरीका की यूनिवर्सिटी ऑफ़ नॉर्थ कैरोलाइना के प्रोफ़ेसर एंड्रयू रेनॉल्ड्स कहते हैं कि नॉर्थ कैरोलाइना में जिस तरह से काले मतदाताओं को मताधिकार से अलग किया गया है. उसके बाद अमरीका को भी पूर्ण लोकतंत्र की फ़ेहरिस्त में शामिल नहीं किया जा सकता.

आखिर ये सब हो क्या रहा है. सारी दुनिया में दहाइयों तक जिस सियासी निज़ाम ने अपनी धाक जमाई वो अब चरमरा क्यों रहा है. वजह एक दम साफ़ है. आज जिस तरीक़े से लोकतंत्र को चलाया जा रहा है उस पर पूंजीवादियों का दबदबा होता है.

पेशेवर लोग पॉलिसी बनाने में अहम रोल निभाते हैं. ये जाने बग़ैर कि आम जनता अपने सियासी रहनुमाओं से क्या चाहती है. आज लोगों का नज़रिया बदल रहा है. आज जनता अपने नेताओं से काम की उम्मीद करती है.

बदल रही है जनता की पसंद

अगर अमरीका में लाख मुख़ालफ़त के बावजूद डोनाल्ड ट्रंप कामयाबी हासिल कर लेते हैं तो इससे साफ़ है कि जनता की पसंद बदल रही है. पूर्व अमरीकी राष्ट्रपति बराक ओबामा जनता के दरमियान काफ़ी पसंद किए जाते थे. उनकी छवि एक अच्छी लीडर वाली थी.

फिर भी वो अपनी मक़बूलियत को पार्टी के लिए वोट दिलाने में इस्तेमाल नहीं कर पाए. क्योंकि अमरीकी अवाम मौजूदा व्यवस्था में बदलाव चाहता है. उसकी उम्मीद उन्हें ट्रंप में नज़र आई.

अब राजनीति विचारधारा की लड़ाई भर नहीं रह गई. 1990 के दशक से पहले दुनिया में पूंजीवाद बनाम साम्यवाद की लड़ाई थी. वोटर को दो में से एक विकल्प चुनना होता था.

मगर आज वामपंथी दल हों या पूंजीवादी, सबके सिद्धांत थोड़े से हेर-फेर के साथ एक जैसे ही लगते हैं. ऐसे में जनता की उम्मीदें बदल गई हैं. वो सत्ता में भागीदारी चाहते हैं. ऐसे में जब हुक्मरान जनता की उम्मीदों पर खरे नहीं उतरते, तो लोकतंत्र में पब्लिक का भरोसा कम होता है.

अमरीकी संस्था प्यू की रिपोर्ट बताती है कि आज केवल 19 फ़ीसद लोगों को लगता है कि उनकी सरकार सही फ़ैसले लेगी. 1958 में ये आंकड़ा 73 प्रतिशत था. इसी से समझ लीजिए कि लोकतंत्र के कमज़ोर होने का शोर क्यों है.

इसीलिए जब नरेंद्र मोदी, डोनाल्ड ट्रंप या ब्रिटेन के विपक्षी नेता नाइजल फराज जैसे लोग पूरे सिस्टम को बदल डालने, एक नया नज़रिया लाने की बात करते हैं, तो, लोग उन्हें हाथों-हाथ लेते हैं.

जनता का पलटवार?

आईईयू की योआन होई कहती है कि इसके लिए वही लोग ज़िम्मेदार हैं, जो आज लोकतंत्र के ख़तरे में पड़ने की दुहाई दे रहे हैं. अब अगर जनता बदलाव चाहती है, तो कुछ लोग उस बदलाव को भी लोकतंत्र के लिए ख़तरा बता रहे हैं.

अमरीका में बहुत से ऐसे लोग हैं जो डोनाल्ड ट्रंप के राष्ट्रपति बनने को लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताते हैं. आख़िर क्योँ? ट्रंप को जनता ने उन्हीं लोगों की तय की हुई व्यवस्था के ज़रिए चुना है, जो उन्हें लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताते हैं.

भारत में नरेंद्र मोदी पहले से तय चुनावी प्रक्रिया से ही चुने गए हैं. मगर एक तबक़ा उन्हें लगातार लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताता रहा है. ये वही लोग हैं जो अब तक जनता के मुद्दों की अनदेखी करते आए हैं. जो, सत्ता में थे या सत्ता के क़रीब थे. लेकिन वो जनता की बात नहीं सुनते थे.

अब जबकि जनता ने पलटवार किया है, नई तरह की बातें करने वालों को चुना है, तो ये लोग जनता के पलटवार को लोकतंत्र के लिए ख़तरा बताते हैं.

क्या वाक़ई ऐसा है?

आज जनता अपने मुद्दों की सुनवाई चाहती है. अपनी भागीदारी चाहती है. वो मौजूदा हालात से नाख़ुश है तो उसे लोकतंत्र की व्यवस्था के ज़रिए ही बदल रही है. योआन होई कहती हैं कि इसका स्वागत होना चाहिए. अगर ट्रंप या मोदी उम्मीदों पर खरे नहीं उतरेंगे तो उन्हें भी जनता बदल देगी. होई कहती हैं कि विचारधाराओं का टकराव होना चाहिए. तमाम मसलों पर तबादला-ए-ख़याल वक़्त की मांग है.

हालांकि लैरी डायमंड कहते हैं कि लोकतंत्र में कई बार बहुमत के षडयंत्र का डर रहता है. ट्रंप की जीत इस ख़तरे की घंटी है. ऐसे में हमारे लोकतंत्र में ऐसी व्यवस्था होनी चाहिए, जो किसी को भी बेलगाम होने से रोके. फिर चाहे वो न्यायपालिका के ज़रिए हो, या कोई और तरीक़ा.

कई बार लोकतांत्रिक तरीक़े से चुने गए नेता भी ऐसे फ़ैसले लेते हैं, जो नागरिकों की आज़ादी पर हमला होता है. जैसे डोनाल्ड ट्रंप अप्रवासियों के आने पर पाबंदी लगा रहे हैं. ब्रिटेन की सरकार ने नागरिकों की जासूसी का नया क़ानून बनाया है.

लेकिन, अमरीका और ब्रिटेन जैसे देशों में लोकतांत्रिक व्यवस्थाएं इतनी मज़बूत हैं कि उन्हें ज़्यादा ख़तरा नहीं. डर तो हंगरी और पोलैंड जैसे देशों में लोकतंत्र के ख़तरे का है. जहां जम्हूरियत की जड़ें उतनी गहरी नहीं हैं.

जानकार मानते हैं कि जनता पलटवार तभी करती है, वो कट्टरपंथ या तानाशाही की तरफ़ तभी झुकती है, जब निज़ाम उसकी नहीं सुनता. लैरी डायमंड, यूरोप और अमरीका की मिसाल देते हैं. वो कहते हैं कि यूरोपीय देशों की जनता साफ कह रही है कि वो और अप्रवासियों को नहीं बर्दाश्त कर सकते.

लेकिन उनके देशों की सरकारें उनकी नहीं सुन रही हैं. इसीलिए मरीन ली पेन और डोनाल्ड ट्रंप जैसे अप्रवासी विरोधी नेता हाथों-हाथ लिए जा रहे हैं. डायमंड कहते हैं कि लिबरल नेताओं को पीछे हटना होगा. उन्हें सामाजिक-आर्थिक खुलेपन की नीति से फिलहाल तो किनारा करना ही होगा.

वो मिसाल देते हैं नीदरलैंड की जहां राष्ट्रवादी गीर्ट वाइल्डर्स को चुनाव में करारा झटका लगा. क्योंकि नीदरलैंड के प्रधानमंत्री ने खुलेपन की नीति की कमियों को समझा और उसमें सुधार किया.

लोकतंत्र ऐसे बचेगा?

लोकतंत्र को बचाने का यही तरीक़ा है. जनता की आवाज़ सुनकर रास्ता और तरीक़ा बदलना होगा.

इंसान के विकास के इतिहास में लोकतंत्र ऐसी व्यवस्था है, जो प्रशासन का सबसे अच्छा तरीक़ा है. जहां जनता की भागीदारी है. सरकार चलाने वालों की जवाबदेही है. इसीलिए अफ्रीका से लेकर एशिया तक, लोकतंत्र की मांग उठ रही है.

जैसे-जैसे चीन तरक़्क़ी कर रहा है, वहां जम्हूरियत के लिए लोग ज़ोर लगाकर आवाज़ उठा रहे हैं.

लैरी डायमंड कहते हैं कि तानाशाही में स्थायित्व की कमी है. चीन,रूस या ईरान के निज़ाम आखिर में ढह जाएंगे. लेकिन लोकतंत्र ज़िंदा रहेगा. उसकी जड़ें बहुत गहरी हैं. ये बात और है कि लोकतंत्र के पैमाने, इसका रंग-रूप बदल जाएगा. लोकतंत्र की जिस परिभाषा को पश्चिमी देशों ने बाक़ी दुनिया को सिखाया है, वो परिभाषा अब बदल रही है.

हर व्यवस्था की कुछ ख़ामियां होती हैं, तो कुछ ख़ूबियां भी. जैसे चीन में सरकार के नुमाइंदे चुने नहीं जाते. उन्हें काबिलियत के आधार पर मौक़े दिए जाते हैं. ज़रूरी नहीं कि लोकतंत्र में सबसे बेहतर इंसान ही प्रशासन चलाए. चीन ने ये बात साबित की है. चीन की कम्यूनिस्ट पार्टी के करीब नौ करोड़ सदस्य हैं.

राष्ट्रवादी पार्टियों का प्रभुत्व

ये इम्तिहान देकर सदस्य बनते हैं. फिर इनकी काबिलियत की बिनाह पर इन्हें मौक़े दिए जाते हैं. जो काम करता है, वो तरक़्क़ी पाता है. ये बात और है कि इस व्यवस्था में पारदर्शिता की कमी है. चीन में भ्रष्टाचार सबसे बड़ी चुनौती है. लाख कोशिशों के बावजूद चीन में भ्रष्टाचार पर काबू नहीं पाया जा सका है.

ऐसे ही मौक़ों पर लोकतांत्रिक देशों की चुनाव की व्यवस्था की ख़ूबी मालूम होती है. जहां सरकारों की जवाबदेही जनता वोट के ज़रिए तय करती है. नाकारा और भ्रष्ट लोगों को सत्ता से बाहर करके सबक़ सिखाती है.

लेकिन चीन जैसी व्यवस्था के फ़ायदे भी हैं. सरकारें बिना चुनाव की फिक्र किए, काम पर फ़ोकस कर सकती हैं. उन्हें जनता की नाराज़गी की फिक्र नहीं करनी पड़ती. ऊंचे पदों पर बैठे लोगों के पास काफ़ी तजुर्बा होता है.

वैसे, लोकतंत्र का दरख़्त जब ख़ुद से पनपता है तो ज़्यादा मज़बूत होता है. अगर कहीं और से लाकर लोकतंत्र की जड़ें जमाने की कोशिश होती है, तो वो अक्सर नाकाम होती है.

आज पूरी दुनिया में तेज़ी से राष्ट्रवादी पार्टियों का विकास हो रहा है. ऐसे में अमरीका और यूरोप के पास अच्छा मौक़ा है कि वो ख़ुद के भीतर झांकें. वो अपने लोकतंत्र की कमियां दूर करें. तभी तो वो बाक़ी दुनिया के सामने अपनी मिसाल दे सकेंगे.

फिलहाल तो घबराने की ज़रूरत नहीं. लोकतंत्र को कोई ख़तरा नहीं.

(अंग्रेजी में मूल लेख पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें, जो बीबीसी फ्यूचर पर उपलब्ध है.)

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