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कश्मीर के हल के लिए पाकिस्तान से बात ज़रूरी: यशवंत
भारतीय जनता पार्टी नेता यशवंत सिन्हा की अगुआई में भारत प्रशासित कश्मीर के दौरे पर गए 5 सदस्यों के प्रतिनिधिमंडल ने कश्मीर के मौजूदा हालातों पर अपनी रिपोर्ट जारी की है.
यशवंत सिन्हा प्रतिनिधि मंडल ने अपनी रिपोर्ट में कहा है कि कश्मीर में जारी समस्या को सुलझाने के लिए हुर्रियत को शामिल करते हुए सरकार को जल्द से जल्द बहु आयामी बातचीत शुरू करनी चाहिए.
बीते साल हिज़बुल मुजाहिद्दीन कमांडर बुरहान वानी की मौत के बाद कश्मीर में हुए प्रदर्शनों और हिंसा के बाद कई प्रतिनिधि मंडल अलगाववादी नेताओं और आम लोगों से मिलने और बातचीत करने के लिए कश्मीर गया था.
हालांकि ये प्रतिनिधिमंडल सरकारी नहीं था.
इस रिपोर्ट के बारे में और कश्मीर के मसले पर यशवंत सिन्हा से बात की बीबीसी उर्दू संवाददाता शकील अख़्तर ने. यशवंत सिन्हा ने मौजूदा हालात और भारत पाकिस्तान के रिश्तों को सुधारने के लिए कई बातें कहीं. यशवंत सिन्हा की बात उन्हीं के शब्दों में.
बीते 4-5 महीनों की हिंसा और फिर लगातार कर्फ़्यू के बाद कई दल और प्रतिनिधिमंडल कश्मीर गए, गृह मंत्री भी वहां गए, ऑल पार्टी संसदीय प्रतिनिधिमंडल भी कश्मीर की अवाम तक पहुंचने के लिए वहां गया. लेकिन यह दुर्भाग्यपूर्ण था कि उन सबके लिए सारे दरवाज़े नहीं खुले.
मैं ख़ुद को भाग्यशाली मानता हूं कि जब मैं अपने दल के साथ वहां गया तो हमारे लिए दरवाज़े खुले.
बहुत सारे ऐसे दल और एसोसिएशन जो उस वक़्त सर्वदलीय प्रतिनिधिमंडल से नहीं मिले थे, वो हमसे मिलने आए. हम ज़िलों में गए तो वहां भी लोग हमसे मिलने आए.
इस बार हमने जो रिपोर्ट बनाई है उसमें हमने यह दिखाने की कोशिश की है कि लोगों की हमारे बारे में भावना क्या है.
ये ठीक बात है कि दूरी बढ़ी है. इसीलिए हमने ज़ोर देकर दोनों रिपोर्ट में कहा है कि उस दूरी को पाटने की कोशिश होनी चाहिए.
अगर हम बातचीत के नज़रिए से ऐसा नहीं करेंगे तो फिर दोनों तरफ एक ही उपाय बचेगा और बहुत ख़ूनख़राबा होगा.
आज भी इस माहौल में भी लोग अटल बिहारी वाजपेयी के तौर तरीक़ों को याद करते हैं और कहते हैं कि अगर उसी तरह से आगे बढ़ने की कोशिश जाए तो शायद हम मंज़िल की ओर आगे बढ़ें.
लेकिन इसके लिए दोनों तरफ से कुछ ना कुछ पहल करनी होगी, और उसी बात पर हम ज़ोर दे रहे हैं.
वाजपेयी जी ने जैसा कहा है कि इंसानियत के दायरे में रह कर बातचीत होनी चाहिए. हमें ये कहना चाहिए कि हम इंसानियत के दायरे में बातचीत करेंगे.
पाकिस्तान ने जो समय-समय पर वायदे किए हैं भारत के साथ, उसे उन पर अमल करना चाहिए.
जब मैं विदेश मंत्री के तौर पर वाजपेयी जी के साथ इस्लामाबाद गया था, वहां 6 जनवरी 2004 को हमने एक दस्तावेज़ जारी किया था जिसमें साफ़ तौर पर कहा गया कहा था कि पाकिस्तान भारत के ख़िलाफ़ हिंसा और चरमपंथ को बढ़ाने के लिए अपने इलाक़े का इस्तेमाल नहीं करने देगा.
ये वायदा पाकिस्तान की हुकूमत ने किया, उसके बाद वो वादा जब टूटता है तो दुख होता है.
सीधा रास्ता ये है कि पाकिस्तान दहशतगर्दी बंद करे. जिस दिन पाकिस्तान से दहशतगर्दी बंद हो जाएगी उस दिन बातचीत शुरू हो जाए.
कश्मीर के मसले का हल आज के दिन सारे लोग चाहते हैं. कश्मीर में कोई ये नहीं कह रहा कि हमें ज़्यादा पैसा दो या रिआयत दो, वो कहते हैं इस मसले को हल करो.
पूरी तरह से इस मसले का हल ढ़ूढ़ने के लिए के लिए पाकिस्तान से बात करना ज़रूरी है, लेकिन पाकिस्तान को अपने कहे वायदे पर अमल करना चाहिए.
पठानकोट के ठीक पहले प्रधानमंत्री मोदी अचानक लाहौर चले गए और पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ के साथ उनकी बहुत अच्छी मुलाक़ात हुई.
उसके तुरंत बाद हमला हो गया.
भारत में एक भावना ये है कि अटल जी पाकिस्तान गए तो कारगिल हो गया. उन्होंने मुशर्रफ साहब को आगरा बुलाया और अपनी तरफ से बड़ी कोशिश की लेकिन पाकिस्तान के सारे वायदे करने के बाद भी हम वही 'ढाक के तीन पात' पर अटके रह गए.
कहीं न कहीं चाहे वो किसी स्तर पर हो या चाहे बैकचैनल से हो, भारत और पाकिस्तान को साथ मैं बैठ कर संजीदगी से बात करनी होगी कि रिश्तों में सुधार कैसे करें.
ये बात सच है कि रिश्ते गड़बड़ाए हुए हैं. और ये भी बड़ा भारी अंदेशा है कि आने वाले दिनों में कहीं रिश्ते और ख़राब ना हों.
मैं प्रार्थना करूंगा कि ऐसा न हो क्योंकि ये पूरे प्रायद्वीप, दक्षिण एशिया और दुनिया के लिए बहुत बुरा होगा.
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