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नज़रिया: क्या मोदी सरकार नोटबंदी प्लान के लिए तैयार नहीं थी?
- Author, मोहन गुरुस्वामी
- पदनाम, अर्थशास्त्री
एक अंग्रेजी अखबार में 8 अक्टूबर को लेख छपा कि नए नोट आ रहे हैं और लोग कह रहे हैं कि पुराने नोट बंद होने वाले हैं. इसका बैंक डिपॉजिट बढ़ने से संबंध है.
आंकड़े यह भी कहते हैं कि कम से कम एक लाख करोड़ रुपये सितंबर-अक्टूबर में बैंकों में जमा हुआ.
तीसरा अच्छा सबूत केंद्र में सत्तारूढ़ भाजपा की पश्चिम बंगाल इकाई का डिमोनेटाइजेशन की घोषणा से दो दिन पहले बैंक में चार करोड़ रुपये जमा करना है. और ऐसे वाकयात दूसरे राज्यों से भी आ रहे हैं. जहां एक पार्टी के लोगों ने बैंक में पैसा जमा किया है.
अब इसके बारे में जानकारी तो बैंक ही दे सकते हैं और बैंक सारे सरकारी हैं, इसलिए ये जानकारी देने से रहे. एक बैंक से बाहर खबर निकल गई क्योंकि ट्रेड यूनियन वालों ने बता दिया.
ऐसे संकेत मिलते हैं कि जिनके पास दो नंबर का पैसा छोटी मात्रा में था, उन्होंने इसे कैश कर लिया. क्योंकि इसकी भनक उन्हें लग गई थी.
बड़ी मात्रा में पैसा रखने वाले लोग हिंदुस्तान में अपना धन नहीं रखते हैं. बड़े पूंजीपति अपना पैसा विदेशी बैंकों में रखते हैं या फिर विदेशी कारोबार में लगाते हैं या फिर विदेशी सिक्यॉरिटीज में निवेश करते हैं. उनके पास यहां कोई खास पैसा नहीं होगा. 50 फीसदी पैसा बिना टैक्स वाला है जो सिस्टम में रहता है.
इनमें रोज मज़दूरी उठाने वाले लोगों का पैसा है. एक कंस्ट्रक्शन मजदूर को रोज की दिहाड़ी 350 से 550 रुपये बनती है. उसके पास एक या दो 500 के नोट तो होंगे ही. इस फैसले के बाद उसका तो घर चलाना मुश्किल हो गया है क्योंकि 500 का नोट चलेगा नहीं.
बैंकों में या तो 500 के नए नोट नहीं आए हैं या फिर उनके पास इसके खुल्ले नहीं हैं क्योंकि 80 फीसदी करेंसी 500 और 1000 के नोटों में थी. सरकार ने बड़े करेंसी हटा तो लिए लेकिन छोटे नोटों से उस जगह को भरने के लिए तैयार भी नहीं हैं.
बिना सोचे-विचारे, बिना किसी की फिक्र किए, इन्होंने जो चाहा कर लिया और लोग इसका नतीजा भुगत रहे हैं. इसके नतीजे बुरे ही निकल रहे हैं. लोग नाराज हैं, बेबस हैं लेकिन प्रधानमंत्री कहते हैं कि उन्हें मारने की साजिश हो रही है. यह तो ऐतिहासिक बात हो गई.
कभी कभी गलती हो जाती है, एक आदमी कबूल करता है कि चलो गलती हो गई और आप दिसबंर 30 तारीख तक अपने नोट बदल लीजिए और तब तक ये नोट जारी रहेंगे. दिसंबर 30 के बाद ये नोट काम के नहीं रहेंगे. ये भी नहीं किया. 100 रुपये के नए नोट भी नहीं छापे. मार्केट में असली समस्या है कि पैसा ही नहीं है.
जिसके पास भी पैसा है, वह कोई लेना नहीं चाहता. जिनके पास 2000 के नोट हैं, उसे कोई सब्जीवाला नहीं लेना चाहता, कोई छोटा दुकानदार नहीं लेना चाहता. कुछ लोगों का तो क्रेडिट कार्ड पर चल रहा है लेकिन कितने लोगों के पास क्रेडिट कार्ड हैं. 120 करोड़ लोगों के देश में लगभग तीन करोड़ के पास क्रेडिट कार्ड हैं.
बिना सोचे विचारे प्रधानमंत्री ने कह दिया कि यह होगा तो लोग हां में हां मिलाने लगे. सरकार के सलाहकार से लेकर मुलाजिम तक खामोश बैठे हुए हैं. मानो मोदी अकेले ही राज चला रहे हैं. सारे फैसले प्रधानमंत्री खुद करते हैं, इसमें वित्त मंत्रालय की भी कोई भूमिका नहीं है. रिजर्व बैंक ने इस सलाह पर शुरू में मना कर दिया था.
रिजर्व बैंक ने कहा कि ऐसा करना उचित नहीं होगा. इन्होंने रिजर्व बैंक को नोट छापने के लिए वक्त नहीं दिया. आप तैयारी करते तो 100 रुपये के नोट ज्यादा छाप देते. जो इन्होंने नहीं किया. इनके कैबिनेट में कोई चर्चा नहीं होती. सब दब कर बैठे हुए हैं. मोदी उन लोगों में से नहीं हैं जो अपनी गलती मान लेते हैं.
सरकार की ये दलील भी गलत है कि बैंकों में जमा पैसा सातवें वेतन आयोग का है. सातवें वेतन आयोग का पैसा तो अभी तक कर्मचारियों को मिला भी ही नहीं है. यह डायरेक्ट कैश बेनिफिट का पैसा है जो जनधन खातों में गया है. सरकार को इसकी बड़ी जांच करानी चाहिए.
बड़े पूंजीपतियों के पास 6 लाख करोड़ रुपये के कर्ज का पैसा फंसा हुआ है. सरकार ने इनसे एक भी पैसा रिकवर नहीं किया है.
सारे बैंक घाटे में चल रहे हैं. सारे बड़े पूंजीपति सरकार के आर्थिक सलाहकार बन गए हैं. इस फैसले का देश की अर्थव्यवस्था पर जो पहला असर पड़ा है, वह यह है कि हर तरफ मायूसी का माहौल है.
प्रोडक्शन ठप है, स्टॉक पड़े हुए हैं. हमारे 50 फीसदी मजदूर दिहाड़ी पर काम करने वाले हैं, सबसे ज्यादा परेशानी का सामना उन्हें करना पड़ रहा है. आर्थिक व्यवस्था को मनमाने तरीके से नहीं बल्कि नाजुकी से चलाया जाना चाहिए.
(बीबीसी संवाददाता संदीप सोनी से बातचीत पर आधारित.)