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खाड़ी के भारतीयों ने लगा रखी हैं उम्मीदें
दुनिया के विभिन्न हिस्सों की तरह ही खाड़ी देशों के लोगों को भी प्रवासी भारतीय दिवस से काफ़ी उम्मीदें हैं. उन्हें लगता है कि इस मौक़े का इस्तेमाल करके अपनी बात सरकार के कानों तक पहुँचाई जा सकती है. आम तौर पर ये कहा जाता है कि भारत सरकार खाड़ी देशों के प्रवासी भारतीयों के साथ पश्चिमी देशों के प्रवासी भारतीयों के मुक़ाबले भेदभाव करती है मगर दुबई के एक जाने-माने प्रवासी भारतीय ऐसा नहीं मानते. संयुक्त अरब अमीरात ओवरसीज़ इंडियन इकॉनॉमिक फ़ोरम के संस्थापक प्रमुख राम बक्सानी कहते हैं, “खाड़ी देशों में रहने वाले ज़्यादातर भारतीय मूल को लोग कम पढ़े हैं इससे उन्हें अपने हक़ की लड़ाई लड़ने में कठिनाई होती है.” बक्सानी लगभग 40 वर्षों से दुबई में रह रहे हैं और वह इंटरनेशनल ट्रेडर्स मिडल ईस्ट के ग्रुप एग़्ज़ीक्यूटिव वाइस चेयरमैन हैं. बक्सानी नौ से 11 जनवरी के बीच दिल्ली में हो रहे दूसरे प्रवासी भारतीय सम्मेलन में संयुक्त अरब अमीरात की ओर से प्रतिनिधित्व कर रहे हैं. इसे सरकार तक अपनी बात पहुँचाने का बेहतरीन मौक़ा मानने वालों में एक किरण संघानी भी हैं जो इंडियन बिज़नेस ऐंड प्रोफ़ेशनल काउंसिल के महासचिव हैं.
उन्हें लगता है कि इस मौक़े का फ़ायदा उठाकर अपनी समस्याएँ रखी जानी चाहिए. वहीं व्यापारी और समाज सेवक भरत भाई शाह मानते हैं कि सरकार को पहले अपने किए हुए वायदे पूरे करने चाहिए. शाह कहते हैं कि कम से कम प्रवासियों के पासपोर्ट पर एक एनआरआई मोहर लगना चाहिए जिससे उन्हें बैंक और संपत्ति से जुड़े काम कराने में मदद मिले. 'बहिष्कार रास्ता नहीं' इधर कुछ समय पहले ही खाड़ी देशों के कुछ जाने-माने लोगों ने बयान दिया था कि यहाँ के प्रवासियों की माँगों पर सरकार ध्यान नहीं दे रही है इसलिए इस साल के प्रवासी भारतीय दिवस का बहिष्कार किया जाना चाहिए. मगर बक्सानी की सोच इससे अलग है. वह कहते हैं कि इसके लिए सरकार को दोषी मानना ग़लत है. उनके अनुसार, “प्रवासी दिवस अपने आप में एक अच्छी शुरुआत है जहाँ हर जगह के प्रवासियों को अपनी बात कहने का मौक़ा मिलता है.”
वह कहते हैं कि इस साल तो खाड़ी देशों के नागरिकों के बारे में एक सत्र भी रखा गया है. बक्सानी का कहना है कि वह इस सत्र में खाड़ी देशों के प्रवासी भारतीयों की समस्याएँ उठाएँगे. बक्सानी के अनुसार इस क्षेत्र के लोगों की तीन सबसे बड़ी समस्याएँ हैं. इनमें सबसे बड़ा मसला बच्चों की शिक्षा से जुड़ा है. खाड़ी के शिक्षा के केंद्रों को भारत के विश्वविद्यालय से संबद्धता दिलाने की ज़रूरत है. बक्सानी के लिए दूसरा मुद्दा कम आमदनी वाले मज़दूरों को सस्ते दर पर फ़्लाइट मुहैया कराना है. ऐसे मज़दूरों की संख्या खाड़ी क्षेत्र में आधे से भी ज़्यादा है. उनके अनुसार, “चार्टर फ़्लाइट की इजाज़त देकर और ट्रांसपोर्ट शिप शुरू करके ऐसा कर पाना संभव है.” एक अन्य मुद्दा जो बक्सानी उठाना चाहते हैं वो है भारत के चुनाव में हिस्सेदारी का है. वह कहते हैं कि मतदान के अधिकार के बिना ख़ुद को भारत से जुड़ा महसूस करना कठिन हो जाता है. वह चाहते हैं कि खाड़ी देशों के भारतीयों के लिए पहचान पत्र का मुद्दा भी उठाना चाहिए. बक्सानी ने अपनी किताब ‘टेकिंग द हाई रोड’ में संयुक्त अरब अमीरात और आस-पास के देशों में भारतीय मूल के लोगों की सफलताओं के बारे में लिखा है. |
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