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बॉलीवुड के लिए खट्टी-मीठी यादों वाला रहा साल
बॉलीवुड के लिए साल 2003 काफ़ी दिलचस्प रहा. साल की शुरुआत इतनी ख़राब थी कि सबने इसको फ़िल्म उद्योग के लिए काफ़ी बुरा साल तक कह दिया. मगर फिर पासा पलटा, तक़दीर चमकी और बॉलीवुड के दिन सुधरे. इस साल 100 से ज़्यादा हिंदी फ़िल्में रिलीज़ हुईं और उद्योग का व्यापार क़रीब 750 करोड़ रुपए का रहा. मगर व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि फिर भी उद्योग को क़रीब 75 करोड़ रुपए का घाटा उठाना पड़ेगा. एक बार फिर इस साल के हिट्स और फ़्लॉप्स की सूची ने ये साबित कर दिया कि फ़िल्म वही चलती है जिसकी कहानी में दम हो. इस साल की ख़ास बात ये थी कि कोई एक फॉर्मूला फ़िल्म या एक ट्रेंड फ़िल्म उद्योग पर हावी नहीं हुआ. साल की दो ज़बरदस्त हिट फ़िल्मों में एक 'साइंस फ़िक्शन' फ़िल्म 'कोई मिल गया' थी तो दूसरी फ़िल्म भावना प्रधान फ़िल्म 'कल हो न हो' रही और दोनों ने ही कुछ अलग करने की कोशिश की. दरअसल इस साल काफ़ी फ़िल्में आईं जिनमें काफ़ी प्रयोग किए गए. ऐसी फ़िल्में जिसमें घिसे-पिटे फ़िल्मों से कुछ अलग दिखाने की कोशिश की गई. प्रयोग किए गए फ़िल्मों के कारोबार पर नज़र रखने वाले तरण आदर्श इस बारे में कहते हैं, "अब फ़िल्में अंतरराष्ट्रीय बाज़ार को ध्यान में रखकर बनाई जा रही हैं."
हर साल की तरह ही इस साल भी कई ऐसी फ़िल्में हिट हुईं जिनमसे ख़ास उम्मीद नहीं थी और कुछ नए लोगों ने कमाल दिखाया. इनमें निर्देशक सुजॉय घोष की पहली फ़िल्म 'झंकार बीट्स'. मगर हलचल मचाई बड़े बजट वाली फ़िल्मों ने जो बॉक्स ऑफ़िस पर बुरी तरह पिट गईं. इस सूची में सबसे ऊपर नाम आता है साल की सबसे बुरी तरह औंधे मुँह गिरी फ़िल्म 'बूम' का. इतनी महँगी फ़िल्म, नामी निर्देशक और बड़े-बड़े सितारों के होने के बावजूद बूम से लोग ख़ासा नाराज़ रहे. इसी तरह दो और बड़े बजट की फ़िल्में नहीं चलीं. इनमें सूरज बड़जात्या की मैं प्रेम की दीवानी हूँ और अनिल शर्मा की द हीरो. उधर बच्चों के लिए भी इस साल एक फ़िल्म आई मकड़ी. इसमें शबाना आज़मी ने एक चुड़ैल का किरदार निभाया. इस फ़िल्म ने काफ़ी अच्छा व्यापार किया. सही मायने में अंतरराष्ट्रीय? फ़िल्म आलोचक इंदु मीरानी के अनुसार सिनेमा देखने जाने वाले दर्शक अब काफ़ी 'मेच्योर' हो गए हैं.
उनका कहना है, "अब निर्देशकों को समझ आ रहा है कि घर पर भेजा छोड़कर देखने जाने वाली फ़िल्में नहीं चलेंगी. मल्टीप्लेक्सेज़ के खुल जाने के बाद हर किस्म की फ़िल्म को अपना अलग बाज़ार, अपने दर्शक मिल रहे हैं." मीरानी के अनुसार "फिर वह चाहे भूत जैसी थ्रिलर फ़िल्म हो, साइंस फ़िक्शन हो, रोमाँटिक और सेक्सी ख़्वाहिश हो या फिर प्यार मोहब्बत और रोने-धोने से भरपूर फ़िल्म कल हो न हो." उनका कहना था कि अब उद्योग के लोग अपनी ग़लतियों से सीख रहे हैं. अब तक फ़िल्में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर प्रवासी भारतीयों को ही लक्ष्य बनाकर चलती थीं मगर सही मायने में फ़िल्में अंतरराष्ट्रीय तब होंगी जब मुख्य धारा के पश्चिमी दर्शकों को ये फ़िल्में अपील करें. उनके अनुसार, "इसका मतलब ये नहीं है कि हमें अपने नाच गाने को बंद करना होगा. कुछ फ़िल्में ऐसा करने में क़ामयाब हुई हैं लेकिन कुछ वर्षों में ये संख्या काफ़ी बढ़ जाएगी." अगली उम्मीदें साल के हीरो रहे अमिताभ बच्चन, शाहरुख़ ख़ान और हृतिक रोशन. वहीं अभिनेत्रियों में प्रीति ज़िंटा ने बाज़ी मारी. साल की दोनों बड़ी हिट फ़िल्मों में प्रमुख भूमिका ज़िटा ने ही निभाई और उन्हें अब शीर्ष की अभिनेत्रियों में गिना जाने लगा है. इस बीच कम उम्र की और स्कूल जाने वाली लड़कियों को एक नया 'बबलगम हीरो' मिला इश्क़ विश्क़ के शाहिद कपूर के रूप में. भारत और पाकिस्तान के रिश्तों पर साल के आख़िर में आने वाली जेपी दत्ता की फ़िल्म एलओसी करगिल से लोगों को काफ़ी उम्मीदें हैं, जिसमें नामी अदाकार काम कर रहे हैं. इस हफ़्ते रिलीज़ हुई विधू विनोद चोपड़ा की मुन्नाभाई एमबीबीएस भी काफ़ी चर्चा में है. इसी तरह अगले साल भी कुछ बड़ी फ़िल्में आने वाली हैं जिनमें अमिताभ और अक्षय कुमार की ख़ाकी और यश चोपड़ा की नई फ़िल्म होगी. इस बीच आशुतोष गोवारिकर के अलावा फ़रहान अख़्तर की अगली फ़िल्में भी जल्दी ही तैयार हो जाएँगी और वर्ष 2004 में रिलीज़ होंगी. |
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