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बुधवार, 17 दिसंबर, 2003 को 19:06 GMT तक के समाचार
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सत्ता पक्ष को मिला बिखरे विपक्ष का फ़ायदा

चुनावी रैली
भारत में विधानसभा चुनाव ने केंद्रीय राजनीति को प्रभावित किया है

देश की राजनीति ने इस साल काफ़ी उतार-चढ़ाव देखे और दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टियों ने अगले साल होने वाले आम चुनाव पर अभी से ही ध्यान केंद्रित करना शुरू कर दिया है.

देश की राजनीति इस साल शुरू हुई तो भारतीय जनता पार्टी गुजरात में दो तिहाई से भी अधिक सीटों पर जीत की खुशी में थी और कांग्रेस फ़रवरी में चार राज्यों के विधानसभा चुनाव पर नज़र लगाए थी.

यूँ तो इनमें से तीन पूर्वोत्तर के राज्य थे और एक हिमाचल प्रदेश था मगर फिर भी गुजरात में भाजपा की जीत के बाद इन्हें भी काफ़ी अहमियत दी जा रही थी.

चुनाव में कांग्रेस ने मिला-जुला प्रदर्शन किया मगर भाजपा को बुरी तरह हार का सामना करना पड़ा.

इससे कांग्रेस में उत्साह की नई लहर दौड़ गई और हिमाचल प्रदेश भी हाथ से निकल जाने के बाद भाजपा एक के बाद एक करके देश के कई राज्यों में सत्ता गँवा चुकी थी.

कहा जाने लगा कि भाजपा का पतन शुरू हो गया है और अब केंद्र में भी उसके सहयोगी दल धीरे-धीरे उससे किनारा कर सकते हैं.

मगर इन सब अटकलों के बीच राष्ट्रीय जनतांत्रिक गठबंधन एकजुट रहा.

अविश्वास प्रस्ताव

प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने बीच में अगला आम चुनाव लालकृष्ण आडवाणी के नेतृत्त्व में लड़ने का बयान भी दे डाला और इसके बाद फिर पार्टी से लेकर राजग तक उनके पीछे खड़ा नज़र आया.

जीत से ख़ुश भाजपा
विधानसभा चुनाव में जीत मिलने से भाजपा में नई जान आ गई

कांग्रेस ने इस साल सरकार के विरुद्ध एक बार अविश्वास प्रस्ताव भी पेश किया जिसका अर्थ लोगों की समझ में नहीं आया और ये भी कहा गया कि इससे सरकार को ही अपना पक्ष रखने में मदद मिली.

विपक्षी दल एक बार फिर किसी एक सशक्त नेतृत्व के अभाव में दिखे और बिखरा विपक्ष सत्ता पक्ष के लिए कोई बड़ी चुनौती पेश नहीं कर सका.

यूँ तो छोटे-छोटे कई मुद्दे उठे मगर सरकार के विभिन्न घटकों ने उनका सामना एकजुट होकर किया.

वाजपेयी ने तो अविश्वास प्रस्ताव के दौरान ये भी कह दिया था कि कुछ राज्यों के आगामी विधानसभा चुनाव में हो जाएँगे दो-दो हाथ.

इस तरह वाजपेयी सरकार ने सत्ता में चार साल पूरे कर लिए और वर्ष के अंत में हुए पाँच राज्यों के विधानसभा चुनाव ने एक बार फिर सत्ता पक्ष में नई जान फूँक दी है.

उत्साहित भाजपा

दिल्ली को छोड़कर हर जगह सत्ता पक्ष ने प्रभावी तरीक़े से झंडे गाड़ दिए हैं और पार्टी के साथ ही नेता भी आम चुनाव को लेकर अब उत्साहित नज़र आ रहे हैं.

सोनिया गाँधी
काँग्रेस के लिए सोनिया गाँधी ही स्टार प्रचारक और नेता हैं

इन चुनाव की सकारात्मक तस्वीर ये दिख रही है कि इस बार विकास को मुद्दा बनाया गया और सांप्रदायिकता से दूर रहकर भी भाजपा ने अकेल दम पर अच्छे बहुमत से सत्ता पाई है.

इसके बाद कांग्रेस और अन्य विपक्षी दल चिंतित नज़र आ रहे हैं.

इसके साथ ही ये भी अटकलें लगाई जा रही हैं कि इन चुनाव से उत्साहित केंद्र सरकार आम चुनाव जल्दी कराने का फ़ैसला भी कर सकती है.

प्रधानमंत्री ने ऐसे ही कुछ संकेत भी दे दिए हैं. मगर अंतिम तौर पर अब भी सब कुछ अनिश्चित सा ही है.

भ्रष्टाचार

वैसे भ्रष्टाचार का मसला देश की राजनीति को किस तरह शिकंजे में लिए है इसके उदाहरण भी इस साल दिखे जबकि महाराष्ट्र में स्टांप पेपर घोटाला, उत्तर प्रदेश में ताज प्रकरण और छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी का टेप कांड सामने आया. केंद्रीय मंत्री दिलीप सिंह जूदेव को रिश्वत देने का मामला तो लोगों ने तहलका प्रकरण की तरह साक्षात देखा.



इनके अलावा पंजाब में प्रकाश सिंह बादल के विरुद्ध आय से अधिक संपत्ति का मामला भी वर्ष के अंत तक काफ़ी गर्मा चुका है.

अब ऐसे में विपक्ष को जूदेव कांड के रूप में जब एक मसाला मिला तो भाजपा ने जोगी कांड के ज़रिए उसका तोड़ निकालकर विपक्ष से एक बार फिर हिसाब बराबर करने की कोशिश की है.

वैसे देश में अब पाँच महिला मुख्यमंत्री राज कर रही हैं और इसे देश की राजनीति में कुछ सुखद संकेत के रूप में देखा जा रहा है.

मगर महिला आरक्षण विधेयक पर कोई फ़ैसला इस साल भी नहीं हो सका.

इधर देश के प्रमुख विपक्षी दल की कमान भी एक महिला के ही हाथ में है मगर इन विधानसभा चुनाव में कांग्रेस की हार के बाद इसे लेकर आमलोगों में बहस का बाज़ार गर्म है, भले ही पार्टी उनके साथ एकजुट क्यों न हो.

कुल मिलाकर साल भर में सत्ता पक्ष की नींद उड़ाने वाला कोई मसला विपक्ष नहीं उठा सका और सत्ता पक्ष सत्ता सुख के अंतिम वर्ष में अब चुनावी रणनीति बनाने में व्यस्त दिख रहा है.

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