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राज्यों के चुनाव बनाम लोकसभा चुनाव
उत्तर भारत में चार राज्यों में विधानसभा चुनाव के लिए मतदान एक दिसंबर को होना है. काँग्रेस और भारतीय जनता पार्टी दोनो ही प्रमुख राजनीतिक दलों में इस समय तलख़ी भी बढ़ गई है. आरोप, प्रत्यारोप जमकर लग रहे हैं. आख़िर इन चुनावों में क्या कुछ है दांव पर? शायद बहुत कुछ. एक तरह से ये चुनाव चार प्रमुख हिंदी-भाषी राज्यों में यानी उत्तर और मध्य भारत के बड़े हिस्से में राजनीतिक मूड भाँपने का मौक़ा और 600 से ज़्यादा विधानसभा क्षेत्रों में लोगों का रुझान जानने का मौक़ा देंगे. लेकिन इससे भी बड़ी यह बात है कि क्या पर्यवेक्षक इसे सोनिया बनाम वाजपेयी की लड़ाई के रुप में देख रहे हैं? वैसे चार राज्यों का यदि विश्लेषण किया जाए तो स्थिति कुछ और ही लगती है. क्या हैं मुद्दे आख़िर किन मुद्दों पर लड़े जा रहे हैं ये चुनाव?
क्या वाजपेयी या सोनिया के व्यक्तित्व आख़िरकार निर्णायक साबित होंगे? अब राजधानी दिल्ली का ही हाल देखें. यहाँ की 70 सीटों के लिए चुनाव हो रहे हैं और मतदाताओं में सोनिया और वाजपेयी दोनों ही शामिल हैं. लेकिन चुनावी मुद्दा देखें तो दोनों ही नेताओं का नेतृत्व और उनका व्यक्तित्व यहाँ कोई चुनावी मुद्दा नहीं है. यहाँ दोनो पार्टियों द्वारा सामने रखे गए मुख्यमंत्री पद के लिए दावेदार, उनकी साख़, उनके मुद्दों पर ही चर्चा सुनेंगे आजकल. काँग्रेस ने सीधे-सीधे मैट्रो का गुब्बारा उतार दिया है और भारतीय जनता पार्टी ने पानी और बिजली के अभाव का मुद्दा उछाला है. उधर मध्य प्रदेश में भले ही भारतीय जनता पार्टी ने सन्यासिन को उतार हो, शायद इस बात का एहसास भाजपा को हो चुका है कि यदि दिग्गी राजा से सत्ता हथियानी है तो वहाँ की सड़कों पर ही उनसे बहस करनी होगी. वहाँ के कई इलाकों में बिजली की किल्लत को बार-बार दोहराना होगा. भोजशाला की बातें राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ या विश्व हिंदू परिषद पर ही छोड़नी होंगी. इन विधानसभा चुनावों में यदि बढ़त हासिल करनी है तो 'विकास के अभाव' ही दोहराना पड़ेगा. छत्तीसगढ़ की 90 सीटों में भी चुनाव का सबसे बड़ा मुद्दा वहाँ के मुख्यमंत्री हैं. सोनिया और वाजपेयी से कोसों दूर का वो क्षेत्र जोगी पर अपनी राय व्यक्त करने की तैयारी में है. जोगी की फ़सल चक्र बदलने की योजना हो या फिर उनकी सुझाई गई पानी के लिए डाबरियों (छोटे तालाबों) पर चर्चा आम है. यहाँ तक कि छत्तीसगढ़ में डाबरियों को जोगी डाबरी कहा जाता है. सोनिया या वाजपेयी को भूल जाइए. राजस्थान में 200 सीटों के लिए एक राजपूत और एक 'माली' में लड़ाई है. कहा जा रहा है कि विकास राजस्थान में सबसे बड़ा मुद्दा है. लेकिन जैसा एक राजनीतिक विश्लेषक ने कहा - राजस्थान में ब्राह्मण जीत सकेंगे, जाट जीत सकेंग, एमएलए नहीं जीतेगा! यानी जाति के आधार पर मतों का विभाजन इस बार और स्पष्ट नज़र आएगा. सवर्ण यानी अगड़ी जातियों के आरक्षण के मामले में स्थिति स्पष्ट न होने कारण भी वोट दोनों प्रमुख पार्टियों में बँटा हुआ है. ऐसे में सोनिया बनाम वाजपेयी का सवाल कुछ कमज़ोर पड़ ही जाता है. जनमत संग्रह का सवाल ऐसा कहना भी ग़लत होगा कि सोनिया और वाजपेयी को सुनने आ रहे लोगों की संख्या या बातों से कुछ अनुमान नहीं लगाया जा सकता.
वह भी हो रहा है लेकिन इसे उन लोगों पर या फिर राष्ट्रीय स्तर पर भी इन दलों पर 'रेफरेंडम' या जनमत संग्रह के रूप में देखना पूरी तरह से सही नहीं होगा. अक्सर चर्चा होती है कि इन चुनावों के बाद देश का मूड जानकर ही केंद्र सरकार ये फ़ैसला करेगी कि लोकसभा चुनाव कब करवाए जाएँ. लेकिन भला क्यों? जिन चार राज्यों में चुनाव हो रहे हैं संयोग से शायद उन कुल छह राज्यों में से हैं चहाँ काँग्रेस और भाजपा में सीधी टक्कर है. बाक़ी राज्यों में स्थिति बिलकुल विपरीत है. उत्तर प्रदेश, बिहार के अलावा पश्चिम बंगाल, तमिलनाडु और आँध्र प्रदेश जैसे बड़े राज्यों में भी स्थिति ऐसी नहीं है कि ये कहा जा सके कि ये दोनो दल सीधे आमने सामने टक्कर की स्थिति में हैं. सच यह है कि ये दोनों ही दल इन राज्यों में अकेले चुनाव लड़ने की स्थिति में भी नहीं हैं और वहाँ इन्हें राजनीतिक बैसाखियों की ज़रुरत पड़ती है. अगले लोकसभा चुनाव में इन राज्यों के ये कई 'अन्य' दल और उनके मुद्दे ही तय करेंगे कि अगली सरकार किसकी होगी. इसमें यदि भाजपा और काँग्रेस के ही रूप में बाक़ी भारत को देखा जाए तो बहुत बड़ी ग़लती होगी. यदि इन चुनावों में परीक्षा है तो पार्टी संगठनों की है और उनकी तैयारी एक बहुत बड़ा 'फ़ैक्टर' साबित होगा. ये चुनाव सिर्फ़ इस बात के सूचक हैं कि इन दलों की चुनाव 'मशीनरी' कितनी तैयार है. |
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