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फागुन की उदासी और मुद्रास्फीति | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
मैं एक पखवाड़े से उदास हूँ. अलबत्ता यह मेरे लिए यह कोई नई बात नहीं है. मुझे लगता है, वसंत की यह उदासी मेरा स्वभाव बन गई है. इसके विपरीत वसंत की हवा चलते ही पत्नी का तन-मन पलास के फूल की तरह खिलने लगता है. उसके दिल में कुछ-कुछ होने लगता है. वह खिले पलास सा दिल लेकर कुछ-कुछ के साथ मेरे पास आई. मेरी उदासी देखकर मुस्कुराई और बोली यह क्या, अभी तक उदास. वह गुनगुनायी, ‘सजन भए उदास रे,फागुन यूँ ही बीता जाए.’ उसका वसंत, उसका फागुन मेरी उदासी में कॉमर्शियल ब्रेक नहीं ला पाया. वह समझाती है, देखो जी यह तुम्हें क्या हो गया है. फागुन में गधे उदास रहते हैं, आदमी तो नहीं, आदमी मस्ती में झूमते हैं. उदासी तोड़ो, फागुन आया है. फागुन का नाम सुन मेरी उदासी मुद्रास्फीति की तरह और बढ़ जाती है. मैं पत्नी से कहता हूँ, तुम्हें बताया तो था, इस महीने तनख़्वाह नहीं मिली है, सारी इनकम टैक्स में कट गई है. अरे कह दो ना साहब टूर पर गए हैं, अगले महीने इकट्ठे ले जाना. फागुन हमारा दूधिया है. मेरी बात सुन कर पत्नी रजनीगंधा की तरह खिलखिला कर कहती है, अरे फगुने नहीं फागुन आया है, फागुन. चार दिन बाद होली है. मुझे लगा कि पत्नी आतंकित कर रही है. होरी परचून का दुकानदार है, सात तारीख होते ही वह भी आ धमकता है. मेरी उदासी महँगाई की तरह जाने का नाम नहीं ले रही है. पत्नी को लगता है कि इस ब्रांड में अब जान नहीं रही. गधा कम से कम बैसाख में तो उदासी उतारकर फेंक देता है, इनके लिए तो यह बारहमासी ओढ़ना हो गया है. लगता है, अब तो बारहों मास पतझड़ मास की तरह गुजरेंगे. पत्नी ताना मारती है, ‘हरी घास देख कर भी दो जीवों के ही मुंह से लार नहीं टपकती है, एक तुम और दूसरा गधा.’ कथन पर चिंतन पत्नी झुंझलाती हुई मुन्ना को सुलाने चली गई. जाते-जाते वह मेरे लिए एक सवाल छोड़ गई, ‘गधे फागुन में उदास क्यों रहते हैं.’ मैं उसके कथन पर चिंतन करने लगता हूँ. चिंतन स्वाभाविक है, क्योंकि आदमी जब कभी उदास होता है, चिंता के साथ-साथ उसकी चिंतन शक्ति भी जाग्रत हो जाती है. मैं सोचता हूँ, घास सूखी हो या हरी गधे को प्रभावित नहीं करती. गधा दोनों ही स्थिति में तटस्थ रहता है. फिर गधे की उदासी का कारण कहीं फागुन की मदमाती बहार तो नहीं. नहीं यह भी नहीं, जब हवा की मादकता अब आदमी को भी प्रभावित नहीं कर पाती, तब फिर गधे जैसे संत जीव को क्या फुसलाएगी. आदमी और गधे के चरित्र में बोझ ही एक कॉमन फैक्टर बचता है. आदमी बजट के बोझ से उदास है और गधा आदमी के बोझ से. कितने वसंत, कितने बजट आता होगा वसंत, कभी बचपन में आया होगा. अब मै नहीं जानता कि वसंत किधर रखा जाता है. मुझे अब यह भी याद नहीं कि मैं कितने वसंत देख चुका हूँ. मैं उम्र का हिसाब अब वसंत से नहीं बजट से लगता हूँ. मेरा बॉस भी जब कभी बाँस चलाता है, वह मेरी योग्यता पर प्रश्न चिन्ह लगाते हुए बस यही कहता है, 'अभी तो तीस बजट भी नहीं देख पाए हो, बरखुरदार'. 'मैं पचपन बजट देख चुका हूँ.' मुझे आश्चर्य होता है, पचपन देखने के बाद भी बॉस जिंदा हैं. कर लंबे कर-कर सरकार यदि इसी प्रकार कर लगाती रही तो हम पचपनवाँ बजट देख पाएंगे नामुमकिन लगता है. | इससे जुड़ी ख़बरें जेब में ज़ंग कहाँ से आए रंग24 मार्च, 2005 | पत्रिका राजस्थान में तमाशे से मनती है होली24 मार्च, 2005 | पत्रिका होली के रंग कृष्ण-राधा से अकबर-जोधाबाई तक24 मार्च, 2005 | पत्रिका बॉलीवुड में रची-बसी है होली24 मार्च, 2005 | पत्रिका होली, 'आरके' से 'प्रतीक्षा' तक24 मार्च, 2005 | पत्रिका नंदगाँव और बरसाने की लठमार होली24 मार्च, 2005 | पत्रिका होली के रंग नज़ीर अकबराबादी के संग23 मार्च, 2005 | पत्रिका बॉलीवुड में रची-बसी है होली05 मार्च, 2004 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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