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गुरुवार, 24 मार्च, 2005 को 08:28 GMT तक के समाचार
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जेब में ज़ंग कहाँ से आए रंग

मोबाइल
मोबाइल फ़ोन का विज्ञापन लुभाता है कि आपने ख़रीदा नहीं कि ख़ूबसूरत बालाएँ घेर लेंगी
होली के रंग अब ठेलागाड़ियों में सजी तश्तरियों और लोगों के चेहरों पर भले ही न हो पर जेबों में रंग भरने का दावा आजकल बाज़ार में नया रंग भर रहा है.

मैंने सुबह-सुबह टीवी खोला तो सामने एक रंगभरे विज्ञापन से मेरा स्वागत हुआ. स्वागत के रंग अपने श्रोत से निकलकर पूरे टीवी पर फैल गए. वहीं तक नहीं रुके, टीवी के मार्फ़त मेरे कमरे, पलंग की सफ़ेद चादर, पुराने चश्मे के लैंस, पुश्तैनी पलंग और उससे लगे धुँधले शीशे तक सबकुछ रंगारंग हो गया.

इस रंगारंग विज्ञापन को देखकर मेरे छोटे भाई की आँखें चुँधियाने लगीं. वो सपनों के आकाश में उड़ चला. छोटे पर्दे पर रंग बिखेरता मोबाइल और मोबाइल के इर्द-गिर्द मँडराती बालाएँ उसे होली की सबसे बड़ी ज़रूरत समझ आए और मुझसे उसने इनकी माँग कर डाली.

बोला, “भइया, आप इस होली पर मेरी जेब रंगों से क्यों नहीं भर देते.” मैंने कहा, “तुम्हारा इशारा किस तरफ़ है. इस मोबाइल या फिर इसके इर्द-गिर्द मटकती बालाओं की ओर. लगता है कुछ ज़्यादा ही बड़े हो गए हो.”

बोला, “नहीं समझे, मुझे तो केवल मोबाइल दिला दो, बाकी सब मोबाइल ख़ुद ही दिला देगा.”

आँखों पर चढ़ा रंग, जो आँखों के रास्ते दिल में उतर रहा था, इस तोहफ़े की माँग के साथ एकदम फ़ीका हो गया. मुझे लगा कि होली का यह लाल, हरा, तिरंगा, सतरंगा रंग अब मुझे नहीं छोड़ेगा.

मैंने उसे समझाया, “भाई, ये रंग केवल देखने के लिए हैं. इन्हें देखो और खुश रहो, लगाने के चक्कर में पड़े तो पीछा छुटाना मुश्किल हो जाएगा. यह रंग बजट के बाद और गर्मियों से पहले का है. ज़्यादा खेलने से आदत ख़राब हो सकती है.”

उसने मुझे पलट कर जवाब दिया, “आप भी भइया, कभी सोचा है कि अगर मैं यह मोबाइल लेकर अपनी नौकरी के इंटरव्यू में जाउँगा तो सामने बैठे पैनल पर कितना अच्छा प्रभाव पड़ेगा. इससे मेरा स्टैंडर्ड भी हाई रहेगा.”

भाई के इस तर्क ने मेरा ब्लड प्रेशर लो कर दिया. मुझे डर लगने लगा कि अगर घर में और टिका तो शायद ख़ून का रंग भी फीका हो जाएगा.

बाहर निकला तो देखा कि कॉलोनी के लोग किसी बाबा के यहाँ योगा करने जा रहे हैं. मैंने पड़ोस वाले सक्सेना साहब से पूछा, “आप होली के दिनों में भी योगा..” वो बोले, “जीवन में रंग भरना है तो योगा कीजिए.”

 पंडित जी खीस निपोरकर बोले, “यही तो ग़लती करते हो तुम लोग, ग़लत हाथों में धन सौंप दिया. मुझसे कहते तो ए-ब्लाक वाले कमिश्नर से बात करा देता. तुम्हें राहत मिल जाती और मुझे दक्षिणा. तुम जैसों का तो अमंगल ही होगा.”

आगे बढ़ा तो देखा कि मोहल्ले भर के घरों में पूजा करानेवाला पुरोहित आ रहा है, बोला, “यजमान, इसबार तो होली शनिवार की है. यह आपके लिए अनिष्टकारी है. दान करो और उऋण हो जाओ.”

मैंने कहा, “प्रभु, सब तो आयकर विभाग को दे चुका हूँ, अब आपको कहाँ से दूँ.”

पंडित जी खीस निपोरकर बोले, “यही तो ग़लती करते हो तुम लोग, ग़लत हाथों में धन सौंप दिया. मुझसे कहते तो ए-ब्लाक वाले कमिश्नर से बात करा देता. तुम्हें राहत मिल जाती और मुझे दक्षिणा. तुम जैसों का तो अमंगल ही होगा.”

मैंने देखा कि धोबी, कूड़ेवाला, टेलीफ़ोनवाला, दूधवाला, मोहल्ले का चौकीदार, डाकिया, सब के सब मोहल्लेभर में घर-घर जाकर होली का हिस्सा माँग रहे हैं.

मुझे लगा कि मेरे जेब में महीने के आख़िर में बचे कुछ पैसे अब मेरे नहीं रह गए हैं. उनपर शनि की दृष्टि साफ़ दिखाई दे रही है. अभी सब आएँगे और मेरे इन पैसों का नोच-नोच कर मुझसे छीन लेंगे.

मैं घर की तरफ़ लपका. तेजी से दरवाज़ा खोला और अंदर घुसकर बंद कर लिया. पीछे मुड़ा तो देखा कमेटी के कोई दर्जनभर लड़के मेरे टूटे सोफ़े पर बुरी तरह से लदे हैं. मुझे देखते ही बोले, “अंकल, पिछली बार आप बच गए थे. इसबार दोनों सालों की रसीद काट दी है. केवल एक हज़ार दो रूपए दे दें.”

मुझे लगा, होली की आग जल रही है पर उसमें महँगाई की होलिका नहीं, मैं जल रहा हूँ.

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