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हास्य सहज था काका हाथरसी के लिए | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
सफल राजनीतिज्ञ वह, जो जन-गण में व्याप्त, जिस पद को वह पकड़ ले, कभी न होय समाप्त. कभी न होय समाप्त, धुमाए पहिया ऐसा, पैसा से पद मिले, मिले फिर पद से पैसा. कह काका, यह क्रम न कभी जीवन भर टूटे, वह नेता है सफल और सब नेता झूठे. ये है काका हाथरसी की फुलझड़ी. जिन्होंने कोई 50 वर्षों तक हिंदी कवि सम्मेलनों के मंचों पर राज किया.
अगर वे आज हमारे बीच होते तो 18 सितंबर को पूरे सौ बरस के हो गए होते. यानी यह उनकी जन्म शताब्दी है. लाखों लोग उनकी फुलझड़ियाँ और छक्के सुन कर हँसी से लोट-पोट हो जाया करते थे. ठहाके और वाह-वाह उनके आगे-पीछे चलते थे. कहा जाता है कि जो हँस नहीं सकता, हँसा नहीं सकता, वह शुद्ध हृदय का व्यक्ति नहीं हो सकता और उस पर भरोसा भी नहीं किया जा सकता. और यह बात काका हाथरसी पर पूरी तरह से लागू होती थी. वह बहुत सरल, उदार और जीवंत थे. बहुत कम लोग जानते हैं कि वे एक अच्छे संगीतज्ञ और चित्रकार भी थे. मन होता तो बंसी बजाते. हारमोनियम पर कोई सरगम सुनाते. तानपुरे के तार खींचते. कभी मस्ती में आकर ठुमके भी लगाते. अच्छे नर्तक जो थे. हास्य व्यंग्य का सृजन जितना सरल समझा जाता है, उतना ही मुश्किल काम है. पर हर चींज उन्हें हँसती-किलकती नज़र आती थी. 'कहॅ काका कविराय नाम दुनिया में कर जा या फिर 'अस्पताल के वासते डॉक्टर वह अनुकूल, उन्होंने जीवन के आस-पास बिखरी समस्याओं और पात्रों से हास्य की रचना की. 'काका बस में चढ़े हो गए नर से नारी डॉक्टर हो या नर्स, मंत्री हो या संतरी, दुल्हा हो या बाराती, पत्नी हो या प्रेमिका, लेखक हो या लेखिका, कुछ भी उनकी कलम से नहीं छूटा. हिंदी-हिंदू-हिंद का, जिनकी रग में रक्त, हास्य के नाम पर फूहड़पन और चुटकुलेबाज़ी को देखकर काका हाथरसी के शालीन हास्य को लोग आज भी याद करते हैं. बकौल गोपाल प्रसाद व्यास, "हिंदी-हास्य को काका ने जितनी लोकप्रियता प्रदान की है, उतनी हिंदी व्यंग्य-विनोद के अन्य किसी कवि ने नहीं की. वे हास्यरस के अनुभाव भी हैं और विभाव भी. संचारी भी हैं और व्यभिचारी भी." काका हाथरसी की एक बड़ी ख़ासियत थी अपने आप पर हँस लेना. उनका कहना था, ‘‘सिद्ध तो दूसरे लोग हैं, हम तो प्रसिद्ध हो गए.’’ लेकिन इस समय के चर्चित हास्य कवि अशोक चक्रधर कहते हैं, "मैं मानता हूँ कि प्रसिद्धि यूँ ही नहीं मिलती. उनके व्यक्तिगत गुण ही थे जिनके कारण काका अपने समय में देश के सर्वाधिक लोकप्रिय कवि बने." काका हाथरसी हास्य कवि कैसे बने. इस सवाल पर उन्होंने जवाब दिया था, "एक बार मैंने एक महात्मा से पाप-पुण्य की व्याख्या जाननी चाही तो उनका संक्षिप्त सा उत्तर था कि 'प्राणी को प्रसन्न करना पुण्य और उसे दुखी करना पाप है’ और तभी से मैंने पाठकों एवं श्रोताओं को प्रसन्न करने के लिए, हँसाने के लिए हास्यरस का पल्ला पकड़ लिया." | इससे जुड़ी ख़बरें डॉ रामकुमार वर्मा की जन्मशताब्दी08 सितंबर, 2006 | पत्रिका पाब्लो नेरुदा की जन्मशती पर समारोह12 जुलाई, 2004 | पत्रिका पाकिस्तानी हास्य अभिनेता का निधन24 मई, 2005 | पत्रिका सबको हँसाने वाले महमूद नहीं रहे23 जुलाई, 2004 | पत्रिका हास्य अभिनेत्री टुनटुन का निधन24 नवंबर, 2003 | पत्रिका | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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