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एक विकलाँग लड़की का कारनामा | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
पूर्वोत्तर भारत के राज्य मिज़ोरम की राजधानी आइजल की लालरेमाई ने मात्र 26 दिनों में 202 पृष्ठों का उपन्यास लिखकर लोगों को हैरत में डाल दिया है. अपने हाथों से एक चम्मच भी ठीक से नहीं पकड़ पाने वाली 24 वर्षीय इस लड़की ने यह उपन्यास अपने टाइपराइटर के की-बोर्ड को अपनी कलम से ठोंक-ठोंक कर लिखा है. लालरेमाई दो वर्ष की ही थीं जब वह अपने जन्मदिन के मौके पर एक कुर्सी से नीचे गिर पड़ी थी. उसके बाद से उसकी हड्डियों के जोड़ों में दर्द रहने लगा जो धीरे-धीरे उसे अपाहिज बनाता गया. मिज़ो भाषा के जाने-माने लेखक पीएल लियानडिंगा ने उम्र से कम दिखनेवाली लालरेमाई को टाइपराइटर उपहार के रूप में दिया था. आइजल में लालरेमाई को जानने वाले उसे प्यार से मेफ़ली कहकर बुलाते हैं. मिज़ो भाषा में लिखे गए इस उपन्यास के नाम का हिंदी अनुवाद "स्वीकारोक्तियाँ" हो सकता है. इसमें एक माँ की व्यक्तिगत डायरी का वर्णन है जो उसकी लड़की के हाथ में पड़ जाती है. डायरी से लड़की को पता चलता है कि उसका असली पिता कौन है. प्रेरणा मेफ़ली बताती है कि अपाहिज होने के कारण वह दिनभर घर में ही रहती है. घर में वह पत्र-पत्रिकाएँ और किताबें पढ़ती रहती हैं. मेफ़ली की मॉं और उसके मित्रों ने उसे लिखना शुरू करने की प्रेरणा दी. मेफ़ली की माँ लालवुआनी बताती हैं कि मेफ़ली बचपन से ही मेधावी रही है. अपाहिजों के लिए बने स्पास्टिक सोसाइटी ऑफ़ मिज़ोरम के विशेष स्कूल में मेफ़ली की विशेष पढ़ाई का इंतज़ाम किया गया था लेकिन स्कूल जाने से पहले ही वह लिखना-पढ़ना जान गई थी. अपने चार भाई-बहनों में सबसे छोटी मेफ़ली को सीधे कक्षा दो में दाखिला मिला था. वहाँ से सीधे कक्षा चार में भेज दिया गया और कक्षा चार के बाद सीधे कक्षा सात में. हालांकि बाद में उसकी औपचारिक शिक्षा और ज़्यादा आगे नहीं बढ़ पाई. मेफ़ली यह याद नहीं पर पाती कि उसने सबसे पहले कैसे लिखना और पढ़ना सीखा था. चुनौती काफी समय अस्पतालों में बिताने के बाद मेफ़ली और उसके परिवार ने अपने भाग्य को स्वीकार कर लिया. इसके बाद से मेफ़ली चल फिर नहीं पाती है और न ही किसी वस्तु को सामान्य लोगों की तरह पकड़ पाती है. सिर्फ़ 26 दिनों में उपन्यास पूरा करने के बारे में मेफ़ली कहती है कि उसे डर था कि उपन्यास पूरा न होने की सूरत में वह कहीं आधी लिखी पांडुलिपि को फाड़ न दे. इससे पहले भी उसने एक अधलिखे उपन्यास के 40 पृष्ठ फाड़ डाले थे इसलिए उसने रात-दिन एक करके उपन्यास को पूरा किया. मेफ़ली की एक बड़ी बहन बताती है कि मेफ़ली को गुस्सा बहुत आता है और कोई चीज़ उसे आसानी से पसंद नहीं आती. मिज़ोरम के लोग पढ़ने-लिखने में काफ़ी रुचि रखते हैं और इसलिए मेफ़ली और उसकी मॉं को भरोसा है कि 80 रुपए की कीमत वाला यह उपन्यास जल्दी ही बिक जाएगा. हालांकि उन्हें सरकारी पुस्तकालयों के लिए इस किताब के खरीदे जाने की भी उम्मीद है. पुस्तक की छपाई पर हुए खर्च के एक हिस्से का भुगतान करना अभी बाकी है जो मेफली की माँ के अनुसार पुस्तक की बिक्री से आने वाली रकम से कर दिया जाएगा. | इससे जुड़ी ख़बरें हारमोनियम बजाने का एक अलग अंदाज़21 मई, 2006 | मनोरंजन विश्वनाथन का उपन्यास दुकानों से हटा29 अप्रैल, 2006 | मनोरंजन झाड़ू-पोंछे से लेखिका बनने का सफ़र29 अगस्त, 2004 | मनोरंजन | |||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
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