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बुधवार, 09 अगस्त, 2006 को 12:47 GMT तक के समाचार
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आइस हॉकी का 'तेंदुलकर'

गुलनवाज़
गुलनवाज़ को इस बात का मलाल है कि सरकार आईस हॉकी के प्रति संजीदा नहीं है
कश्मीर का नाम आते ही आँखों के सामने घूम जाते हैं गुलमर्ग में स्की पर फ़िसलते हुए लोग और इसी से जुड़ा बर्फ़ीले देशों का लोकप्रिय खेल आइस हॉकी.

सिर पर हेलमेट लगाए, सर से पाँव तक गर्म कपड़े की लाल-काली पोशाक, जैकेट, स्केट्स से लैस जूते और हाथ में हॉकी स्टिक के साथ गुलनवाज़ की तस्वीर लगी है श्रीनगर से गुलमर्ग जाने वाले सबसे सुंदर रास्ते के एक मोड़ पर.

गुलमर्ग विकास प्राधिकरण ने यह तस्वीर पर्यटकों को गुलमर्ग की बर्फ़ीली वादियों में आकर्षित करने के लिए लगाई है. लेकिन इस स्टार का हाल बेहाल है.

उन्हें अपना और अपने परिवार का पेट पालने के लिए हर दिन 80 किलोमीटर की यात्रा करनी पड़ती है तब जाकर एक दिन के 152 रुपए मिलते हैं.

20 वर्षीय गुलनवाज़ रोज़ाना सुबह साढ़े बजे श्रीनगर के लिए तंगमर्ग में अपना घर छोड़ देते हैं और रात साढे आठ बजे घर वापस आ पाते हैं. .

वो इतनी जल्दी घर से इसलिए निकलते हैं कि कम किराए वाली बस पकड़ सकें, नहीं तो जितनी दिहाड़ी मिलेगी उससे कहीं अधिक किराए में चली जाएगी.

बारहवीं पास गुलनवाज़ इंदिरा गाँधी राष्ट्रीय मुक्त विश्वविद्यालय में रोज़ाना दिहाड़ी पर सहायक के तौर पर काम करते हैं.

बड़ी ज़िम्मेदारी

गुलनवाज़ का बड़ा भाई गुल-ए-ख़लाक़ गुलमर्ग की एक पहाड़ी की चोटी पर पर्यटकों को स्की करना बताते हैं और उससे जो थोड़ी बहुत कमाई होती है. छोटा भाई गुल ताहिर अभी स्कूल में पढ़ रहा है. दो बहनें हैं और माँ है. सारी ज़िम्मेदारी इस युवक के कंधे पर.

गुलनवाज़ का कहना है कि इस खेल (आइस हॉकी) के बारे में सरकार अधिक उत्साहित नहीं है. वो कहते हैं, एक बार एक कैंप में उन्हें शिमला ले जाया गया था लेकिन इसके बाद से फिर ऐसा कभी न हुआ.

वो कहते हैं 'किसी प्रकार की कोई सहायता नहीं मिली. बस वार्षिक टूर्नामेंट में खेलता हूँ. आते-जाते अपनी इस तस्वीर को देखता हूँ. '

गुलनवाज़
गुलनवाज़ को मदद का इंतजार है

गुलनवाज़ का मानना है कि शिमला और लद्दाख़ की टीमें अच्छी हैं लेकिन सबसे अच्छा और प्राकृतिक स्थान गुलमर्ग ही है.

उनका कहना है कि गुलमर्ग प्राकृतिक रुप से बर्फीला होने के बावजूद यहां शिमला के मुक़ाबले आइस हॉकी का अच्छा इंतज़ाम नहीं है. अगर सरकार ध्यान दे तो यह देश का सबसे अच्छा मैदान बन सकता है.

गुलनवाज़ को आईस हॉकी का शौक़ इसलिए पैदा हुआ क्योंकि स्की में बहुत भीड़ हो चुकी थी और पर्याप्त अवसर भी नहीं मिल पा रहे थे.

उन्होंने यह भी बताया कि गुलमर्ग से तंगमर्ग की दूरी सड़क से 10 किलोमीटर है लेकिन वो पहाड़ों के रास्ते अपनी स्की पर सिर्फ़ दस मिनट में घने जंगलों से गुज़रते हुए, पेड़ों से बचते बचाते अपने घर पहुंच जाते हैं. यही उनका सबसे पसंदीदा ऐडवेंचर है.

बर्फ़ का यह परिंदा क्रिकेट का भी उतना ही शौक़ीन है. आम कश्मीरियों की तरह पाकिस्तान का तूफ़ानी बल्लेबाज़ शाहिद अफ़्रीदी उन्हें अच्छा लगता है. मगर वो तेंदुलकर को अधिक पसंद करते हैं.

वो श्रीनगर के आसपास के इलाक़े में अपनी अच्छी बल्लेबाज़ी के लिए भी चर्चित हैं और जगह जगह खेलने के लिए उन्हें बुलाया भी जाता है.

हम दिन भर गुलनवाज़ के साथ रहे और जब उनसे विदा होने लगे तो मेरी तरफ़ उन्हें देखा नहीं गया. भावुकता के आँसू उनकी आँखों में थे और मैं इस सोच में गुम था कि इस बर्फ़ीले तेंदुलकर की ऐसी स्थिति क्यों है...? आख़िर वह भी तो एक खेल का लिटिल चैंपियन है....

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