|
ब्रिटेन में 'सुडोकू' का नशा | ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||
लंदन की रेलगाड़ियों में जब आप सफ़र करते हैं तो कलपुर्ज़ों की आवाज़ आपको भले ही सुनाई दे जाए लेकिन इनसानी बोली सुनने को आप कई बार तरस जाते हैं. न तो राजनीति पर लंबी-लंबी बहस हो रही होती है, न मूंगफली के छिलके कड़क रहे होते हैं और न ही चायवाला आवाज़ें लगा रहा होता है. लोगों के सिर अख़बारों या किताबों के पन्नों में डूबे होते हैं या फिर मोबाइल पर एसएमएस के लिए उंगलियाँ चल रही होती हैं, कई बार तो लोग अपने मोबाइल पर गेम ही खेल रहे होते हैं. और इन दिनों ये चुप्पी कुछ और ही बढ़ गई है क्योंकि लोगों को एक नया रोग लगा है जिसका नाम है सुडोकू. यह एक वर्ग पहेली है जिसमें वर्णमाला की जगह एक से नौ तक की संख्याओं का इस्तेमाल होता है और ब्रिटेन का हर अख़बार इन्हें छाप रहा है. सुडोकू के रोग में जकड़े एक सज्जन कहते हैं, "अख़बार में सुडोकू के तीन चार खेल होते हैं ... एक - दो मैं आफ़िस आते समय खेलता हूँ, बाक़ी लौटते समय. और यदि कुछ बच गया तो घर पर भी लगा रहता हूँ.’’ सुडोकू पर किताबें भी इसका नशा ऐसा है कि यहाँ के बड़े-बड़े सुपरस्टोर भी सुडोकू पर किताबों के ढेर लगा रहे हैं. पति और पत्नी के बीच तनाव बढ़ रहे हैं, रातों की नींद हराम हो रही है. वैसे है तो ये जापानी शब्द है लेकिन इसका आविष्कार हुआ चीन में. लंदन के 'द टेलीग्राफ़' अख़बार में सुडोकू के इंचार्ज माइकल मेफ़म कहते हैं, "सू का मतलब होता है नंबर और डोकू का मतलब हुआ एक या इकलौता. तो सुडोकू हो गया इकलौता नंबर.’’ यहाँ ब्रिटेन में सुडोकू के कई रूप देखने को मिल रहे हैं लेकिन सबसे प्रचलित है 81 खानों वाला वर्ग. सुडोकू में नौ खानों के नौ वर्गों को एक साथ रखा जाता है और इस तरह बनता है एक बड़ा वर्ग जिसमें 81 खाने होते हैं. यानी बाएं से दाएं और उपर से नीचे हर जगह नौ खाने. चुनौती ये होती है कि हर छोटे वर्ग में एक से नौ तक के अंक इस तरह भरे जाएँ कि बड़े वर्ग की हर पंक्ति में एक से नौ तक के अंक मौजूद हों और वे दोहराए नहीं जाएँ. इक्यासी में से पच्चीस-तीस खानों में अंक पहले से भरे होते हैं, बाक़ी खानों में आपको अपने दिमाग़ से अंक भरने होते हैं. अब तो इनामी सुडोकू भी शुरू हो गए हैं. हाल ही में जापान में इंटरनेट पर आयोजित एक सुडोकू मुक़ाबले में ब्रिटेन के एक व्यक्ति ने केवल तीन मिनट में ये पहली सुलझा ली. वैसे ब्रिटेन के बाहर के लोग भी इससे ज़्यादा दिन नहीं बचेंगे इस रोग से. कम से कम भारत के एक अंग्रेज़ी अख़बार ने तो इसे छापना शुरू कर ही दिया है. |
| ||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||||